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सर्वसुलभ टीकाकरण की बाधाएं

Admin June 20, 2021

दुर्भाग्य का विषय है कि भारत और साउथ अफ्रीका के मानवता हेतु ‘ट्रिप्स वेवर’ के प्रयासों के मार्ग में कुछ यूरोपीय देश और कुछ अन्य विकसित देश बाधाएं खड़ी कर रहे हैं। — डॉ. अश्वनी महाजन

 

आज पूरी दुनिया जिस महामारी से बार-बार जूझ रही है, उसने पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया है। बीमारी का प्रमाण इतना अधिक हो जाता है कि बड़े-बड़े अमीर मुल्क भी अपनी अपार आर्थिक शक्ति और सुदृढ़ स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था के बावजूद अत्यंत असहाय दिखाई देते हैं। भारत ने स्वयं अप्रैल-मई के माह में ऐसी स्थिति का सामना किया, जब हमें ऑक्सीजन, अस्पताल बेड और यहां तक कि दवाइयों की भारी किल्लत से जूझना पड़ा।

आज दुनिया में वैक्सीन इस समस्या के समाधान का रामबाण बताया जा रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका और इजरायल सहित 6 मुल्कों ने अपनी अधिकांश वयस्क जनसंख्या को वैक्सीनयुक्त करते हुए अपनी जनता को मास्क लगाने की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया है। इसलिए माना जाता है कि यदि हम अपनी समस्त जनसंख्या को टीकाकृत कर देंगे तो हम भी इस महामारी से होने वाले स्वास्थ्य और आर्थिक नुकसान को न्यूनतम कर सकेंगे।

वैक्सीन का असमान वितरण

अगर दुनिया में वैक्सीन की उपलब्धता और वितरण पर नजर डालें तो पता चलता है कि वैक्सीन की अलग-अलग मुल्कों में अत्याधिक असमानता है। ऐसे में यदि दुनिया से इस महामारी को समाप्त करना उद्देश्य हो तो सारे विश्व का टीकाकरण करना जरूरी है। पोलियो उन्मूलन अभियान में ध्येय वाक्य रखा गया कि ‘यदि एक भी बच्चा छूट गया - सुरक्षा चक्र टूट गया’। कोरोना महामारी में भी वही बात लागू होती है। समझना होगा कि दुनिया के सभी देश किसी न किसी प्रकार से दूसरों से जुड़े हुए हैं। यदि कोई भी देश पूरी तरह या आंशिक रूप से छूट गया तो यह महामारी फिर से सिर उठा सकती है।

गौरतलब है कि जब यह महामारी का प्रकोप दुनिया में हुआ और यह लगा कि टीकाकरण इसकी रोकथाम का उपाय हो सकता है, तभी से भारत में स्वदेशी और विदेशी दोनों प्रकार के प्रयासों से वैक्सीन विकास हेतु काम शुरू हो गया था। भारत में दो स्वदेशी प्रयास फलीभूत हो चुके हैं, जिसमें से एक भारत बायोटेक कंपनी द्वारा कोवैक्सीन के निर्माण को लेकर है, जिसके द्वारा अगस्त से दिसंबर के बीच 35 करोड़ वैक्सीन निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। और दूसरा स्वदेशी प्रयास हैदराबाद की बायलॉजिकल-ई नाम की कम्पनी की वैक्सीन का था, इसके द्वारा भी इस वर्ष अगस्त और दिसंबर के बीच 30 करोड़ वैक्सीन भारत सरकार को उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अतिरिक्त सिरेम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा ऑक्स्फर्ड यूनिवर्सिटी के सहयोग से भारत में वैक्सीन विकास का एक बड़ा प्रयास हुआ। भारत सरकार के अनुमान के अनुसार अगस्त और दिसंबर के बीच सिरेम इंस्टीट्यूट 75 करोड़ वैक्सीन डोज निर्माण करके उपलब्ध करवा देगी। भारत सरकार ने घोषणा की है कि मौजूदा वर्ष के अंत तक संपूर्ण जनसंख्या को टीकाकृत कर दिया जाएगा।

लेकिन विश्व में है चिंता व्याप्त

भारत में वैक्सीन निर्माण की भरपूर क्षमता और सरकार के प्रारंभ से ही किए गए प्रयासों के कारण भारत में टीकाकरण की गति अन्य देशों की तुलना में अधिक रही है, लेकिन देश की जनसंख्या अधिक होने के कारण संपूर्ण जनसंख्या का टीकाकरण का लक्ष्य थोड़ा दूर है। लेकिन यह सही भी है कि इस वर्ष के अंत तक हम अपना लक्ष्य पूर्ण कर लेंगे, लेकिन यदि शेष दुनिया की बात करें तो ध्यान में आता है कि भारत समेत दुनिया के कुछ देशों को छोड़कर उनमें वैक्सीन निर्माण की क्षमता ही नहीं है। भारत तो दुनिया भर के लिए वैक्सीन का प्रमुख स्रोत रहा है। लेकिन दूसरे मुल्कों में चिंता व्याप्त होना स्वभाविक ही है, क्योंकि वे वैक्सीन निर्माण तो कर नहीं सकते लेकिन वैक्सीन खरीदने के लिए दुनिया की चुनिंदा कंपनियों पर उन्हें आश्रित होना पड़ेगा। दुनिया में चल रही पेटेंट व्यवस्था और अन्य प्रकार के बौद्धिक संपदा अधिकारों के चलते कंपनियां अत्यंत महंगी कीमत पर वैक्सीन बेच रही है। गौरतलब है कि जहां भारत में प्रारंभिक दौर में सरकार द्वारा अधिकांशतः मुफ्त और प्राइवेट सेक्टर में 250 रू. की दर से वैक्सीन की डोज लगाई गई। अभी भी वैक्सीन सरकार द्वारा रुपए 150 रुपए प्रति डोज की दर से ख़रीदी जा रही है फाइजर और मोडरेना सरीखी कंपनियां 20 से 50 डॉलर (यानी 1500 से 3750 रुपए) प्रति डोज की दर से वैक्सीन बेच रही हैं। गरीब देशों की सरकारें अथवा लोग इतनी महंगी वैक्सीन खरीदने में सक्षम नहीं है। सर्वसुलभ वैक्सीन के लिए कीमत सबसे बड़ी बाधा है। समझ सकते है कि वैक्सीन की ऊंची कीमत के पीछे पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा को पार करने के लिए भारत और साउथ अफ्रीका ने विश्व व्यापार संगठन में यह गुहार लगाई है कि इस महामारी के दौरान इस पेटेंट व्यवस्था से मुक्ति दी जाए। इस गुहार का नाम है ’ट्रिप्स वेवर’ यानी ट्रिप्स से मुक्ति।

क्या है ट्रिप्स वेवर?

अक्टूबर 2020 में भारत और साउथ अफ्रीका ने संयुक्त रूप से विश्व व्यापार संगठन में प्रस्ताव रखा कि कोरोना महामारी के मद्देनजर इसके लिए वैक्सीन और आवश्यक दवाओं पर एक निश्चित समय (जिसका निर्धारण किया जाए) के लिए ट्रिप्स के प्रावधानों से छूट दी जाए ताकि इन वैक्सीन और दवाइयों का पर्याप्त उत्पादन और उसकी उचित कीमत पर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। इस हेतु इस प्रयास को 120 से अधिक सदस्य देशों का समर्थन पहले से ही मिल चुका है। मई माह के अंत में इस हेतु प्रस्तावक देशों की एक बैठक आयोजित हुई जिसमें इन देशों ने एक प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया और इस प्रस्ताव में मांग की गई कि कम से कम 3 वर्षों के लिए वैक्सीन और कोविड की दवाइयों हेतु ट्रिप्स के प्रावधानों से छूट दी जाए और इसके साथ ही वैक्सीन और दवाओं के उत्पादन हेतु आवश्यक कच्चे माल प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यापार रहस्य यानी ट्रेड सीक्रेट से मुक्ति भी सुनिश्चित हो।

समझना होगा कि ट्रिप्स समझौता जहां बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण का प्रावधान देता है वही उसमें यह प्रावधान भी रखा गया था कि स्वास्थ्य संकट, महामारी आदि की स्थिति में ट्रिप्स के प्रावधानों में ढ़ील देकर मानवता के उद्देश से काम किया जा सकता है। साथ ही विश्व व्यापार संगठन के दोहा मंत्रीस्तरीय सम्मेलन में ट्रिप्स और जन स्वास्थ्य संबंधी घोषणा पत्र में इस विषय पर और अधिक स्पष्टीकरण दिया गया था। दोहा घोषणा में यह स्पष्ट किया गया है कि जन स्वास्थ्य संकट, महामारी, भीषण बीमारियों की स्थिति में सदस्य देशों की संप्रभु सरकारों के पास यह अधिकार होगा कि दवाइयों हेतु अनिवार्य लाइसेंस जारी कर सस्ती दरों पर दवाइयां अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करवाएं।

यानी कहा जा सकता है कि पेटेंट और अन्य बौद्धिक संपदा अधिकार, प्रौद्योगिकी और कच्चे माल पर एकाधिकार, ट्रेड सीक्रेट जैसे विषयों के कारण गरीब मुल्कों के लिए वैक्सीन और दवाओं की सुलभता में बाधाएं आ रही है। दुर्भाग्य का विषय यह है कि भारत और साउथ अफ्रीका के मानवता हेतु ट्रिप्स वेवर के इन प्रयासों के मार्ग में कुछ यूरोपीय देश और कुछ अन्य विकसित देश बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।

लेकिन संतोष का विषय यह है कि अमरीकी प्रशासन ने अपना पहले का रुख बदला है और अब उन्होंने वैक्सीन के लिए भारत वह साउथ अफ्रीका के ट्रिप्स वेवर के प्रस्ताव को समर्थन दे दिया है। आगे आने वाले कुछ महीनों में स्पष्ट हो जाएगा कि क्या कंपनियों के लाभों के सामने मानवता जीतेगी या नहीं। क्या पेटेंट मुक्त वैक्सीन और दवाएं वास्तव में बनाई जा सकेंगी या गरीब मुल्कों को इन कंपनियों से महंगी दवाएं ही खरीदनी पड़ेगी। समय की मांग है कि समाज की सज्जन शक्तियां पेटेंट मुक्त वैक्सीन और दवाइयों को सुनिश्चित करने हेतु जन दबाव बनाकर मानवता की जीत सुनिश्चित करें।

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