011 2618 4595

शिक्षा के भारतीयकरण की अनिवार्यता

जरूरत है कि हम अपने विशाल ज्ञान भंडार के जरिए पिछले मैकाले पद्धति को चुनौती दें। हमें भक्ति के साथ-साथ सूफी आंदोलनों के अध्ययन को भी प्रोत्साहित करना होगा। शिक्षा के भारतीकरण की संकीर्ण रूप से व्याख्या नहीं की जानी चाहिए इसे एक विशिष्ट विचारधारा रंग या विचार प्रक्रिया के साथ नहीं पहचाना जाना चाहिए, बल्कि यह सही मायने में राष्ट्रवादी होना चाहिए। — डॉ. जया कक्कड़

 

चिकित्सा शिक्षा के छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद दिलाई जाने वाली शपथ को लेकर चली आ रही बरसों पुरानी परंपरा में बड़ा बदलाव हो रहा है। भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हाल ही में भारत के शीर्ष चिकित्सा नियामक राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने सुझाव दिया है कि डाक्टरों के स्नातक समारोह के दौरान उन्हें हिप्पोक्रेटिक (पाखंडी) शपथ की जगह चरक शपथ दिलाई जाए। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के दिशा निर्देशों के तहत डॉक्टर अब चरक शपथ लेंगे। चरक शपथ लेते समय वह वचन देंगे कि ‘‘न अपने लिए न ही दुनिया में मौजूद किसी वस्तु या आर्थिक फायदा पाने के लिए, बल्कि सिर्फ इंसानियत की पीड़ा को खत्म करने के लिए मैं अपने मरीजों का इलाज करूंगा।’’ चिकित्सा आयोग ने अपने दिशानिर्देश में 10 दिन के लिए योग पाठ्यक्रम शामिल किए जाने की भी अनुशंसा की है। आयोग की इस पहल को चिकित्सा शिक्षा विभाग के भारतीयकरण के नजरिए से देखा जा रहा है।

मालूम हो कि अब तक डॉक्टर जो शपथ लेते थे उसकी उत्पत्ति कभी ग्रीस से हुई थी जो समय के साथ दुनिया भर में फैली। हिप्पोक्रेटिक शपथ में डॉक्टर शपथ लेते हैं कि ‘‘वह अपनी गरिमा और चेतना के अनुरूप मरीज के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे तथा उनकी निजता का सम्मान करेंगे।’’ जबकि चरक शपथ में अब वचन देना होगा कि ‘‘वह अपनी पूरी योग्यता के साथ सही निर्णय लेते हुए मरीज का उपचार करेंगे। मरीज का परीक्षण करते समय भी वह इलाज पर ध्यान केंद्रित करेंगे। आर्थिकी का ध्यान दिए बगैर मरीजों और उनके परिवारों की निजता कायम रखेंगे।’’ यह नई शपथ महर्षि चरक की लिखी पुस्तक चरक संहिता से ली गई है। महर्षि चरक दुनिया की सबसे प्राचीन कही जाने वाली आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के शीर्ष विशेषज्ञ माने जाते हैं।

इन दिनों बदलते परिवेश के नए इतिहासकार इतिहास को पहले से स्थापित तरीकों से अलग पेश करना चाहते हैं। आज के इतिहास लेखकों में देवत्व का पुट डालने में भी कोई गुरेज नहीं होती। इस बारे में अगर कोई सवाल खड़े करें तो ऐसे लोगों का मानना है कि यह अब तक की हुई चूक को ठीक करने का प्रयास है। प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार डीडी कोसांबी भी मानते हैं कि भारतीय इतिहास वह नहीं था जो हमें बताया गया। उन्होंने लिखा है कि यूरोपीय मत मूल रूप से गलत है, क्योंकि यूरोपियन लोगों द्वारा लिखा गया इतिहास भारत का समग्र प्रस्तुत नहीं करता है। यूरोपीय इतिहासकारों में दरअसल भारतीय अतीत का अध्ययन करने की समझ कम थी। उन्होंने अपने इतिहास लेखन में कुछ राजवंशों व उनसे जुड़े युद्धों और उन युद्धों की कहानियों पर आख्यानों के साथ चर्चा की है। ऐसे में इतिहास लेखन का काम विदेशी विद्वानों और उनके भारतीय अनुचरों पर नहीं छोड़ा जा सकता है। जब हम इतिहास का भारतीयकरण करने का प्रयास कर रहे हैं तो यह उन्हीं की तरह उपाख्यान और पौराणिक कथाओं पर आधारित नहीं होना चाहिए। इतिहास सिर्फ तर्कपूर्ण ही नहीं, बल्कि साक्ष्य आधारित और प्रमाणित होना चाहिए, ताकि भविष्य में इस इतिहास को झुठलाना, इसका खंडन करना कठिन हो।

हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने शिक्षा की मैकाले प्रणाली में बड़े बदलाव के पक्ष में मतदान किया। उन्होंने कहा कि मैंकाले की पद्धति प्रभावी तो है लेकिन हानिकारक बहुत है। इस पद्धति से भारतीयों में हीन भावना पैदा होती है। इसने भारत की पारंपरिक शिक्षा को अंग्रेजी के अपरिचित पाठ्यक्रम में बदल दिया है। यह हमें औपनिवेशिक मानसिकता की ओर ले जाता है। इसने हमें अपनी विरासत से दूर कर दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली के प्रभाव में हम जानबूझकर उपयोगी और उत्पादक विचारों और दर्शन से दूर हो गए हैं जो कि हमारी प्राचीन सभ्यता का मूल है।

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने विश्व भारती में राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन शुरू किया था। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा के विरोध में एक अभिनव राष्ट्रवादी पाठ्यक्रम तैयार किया था। आजादी से पहले भी भारतीय दिमागों को गुलामी  की ओर ले जाने वाली पश्चिमी शिक्षा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए थे। सन 1888 में अबू मौलवी द्वारा यह सुझाव दिया गया था कि साहित्य और विज्ञान को स्थानीय और भारतीय भाषाओं में पढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार शिक्षा के भारतीयकरण के बारे में शुरू हुई बहस कोई नई नहीं है और न ही इसे आज के दौर के दक्षिणपंथी विद्वानों द्वारा शुरू किया गया है।

शिक्षा की मैकाले प्रणाली ने विदेशी अवधारणाओं को अनजाने में स्वीकार करने और अपनाने का नेतृत्व किया है, लेकिन अब वास्तव में शिक्षा के भारतीयकरण को आगे कर मैकाले की हानिकारक विरासत को खत्म करने और अपनी प्राचीन और पारंपरिक विरासत के साथ फिर से जुड़ने का समय आ गया है। मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से देश में भूरे साहब और उनके उत्पादनों की कल्पना की। अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम के जरिए हमारे पाठशालाआें, गुरुकुलां और मदरसों में दखलअंदाजी करते हुए संस्कृत, फारसी को बेकार बताते हुए इन्हें व्यवस्थित रूप से हटाने की कोशिश की गई। इसका एकमात्र उद्देश्य हमारे प्राचीन ज्ञान को नष्ट करने का एक संगठित प्रयास था। मैकाले पद्धति के जरिए बौद्धयान, पिंगला, आर्यभट्ट, भास्कर आचार्य के इतिहास को मिटाने की कोशिश हुई तथा उनकी जगह यूक्लिड और पाइथागोरस को दे दी गई। मैकाले पद्धति के जरिए हमारे विशाल ज्ञान भंडार को कम किया गया। आमतौर पर भारतीय छात्र छः ऋतु के बारे में परिचित थे, लेकिन अंग्रेजी शिक्षा के दबाव में भारतीय छात्र भी केवल यूरोप के चार मौसमों के बारे में ही जान पाए। मैकाले की पद्धति के जरिए भारत की प्राचीनता और संस्कृति को भी केवल एक औपनिवेशिक व्याख्या के जरिए कमतर कर बच्चों के दिमाग में डाला गया। आजादी के बाद भी इस पर ध्यान नहीं दिया गया। देश का नेतृत्व कर रहे लोगों ने सात समंदर पार बैठे अपने आकाओं को खुश करने के लिए उन्हीं की विरासत को आगे बढ़ाने का काम किया गया। यहां तक कि चोलों और ललितादित्य जैसे स्वदेशी नायकों को भी लगभग भुला दिया गया। हमारे समृद्ध इतिहास को साजिश के तहत धीरे-धीरे गायब किया गया और हमें इतिहास के नाम पर आक्रमणकारियों की यात्राएं थमा दी गई। शेक्सपियर के नाटकों की धूम मची, लेकिन हमारे कालिदास को विस्मृत कर दिया गया।

जहां तक धर्म की शिक्षा और  कट्टरता का सवाल है तो हिंदू धर्म आज भी पश्चिमी और मध्य पूर्वी धार्मिक दृष्टिकोणों की तुलना में अनिवार्य रूप से अधिक उदार है। भारत के दो विशल महाकाव्य महाभारत और रामायण अंग्रेजों के आगमन से पहले तक मदरसों में भी पढ़ाए जाते थे। भारतीय मुस्लिम और भारतीय ईसाई सभी हिंदुओं के साथ रहते आए थे तथा अपने-अपने धर्म कर्म में विश्वास करते थे। यह बात हाल के प्यू सर्वेक्षण में भी सामने आई है। हमारा समाज भारतीय संतों, दार्शनिकों, लेखकों की शिक्षा की वकालत करता रहा हैं, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। हम ज्ञान के लेनदेन वाले समाज के लोग हैं। हमारे यहां के छात्रों को नैतिक विज्ञान में बाइबल से ली गई कहानियां जरूर पढ़ाई जानी चाहिए, लेकिन भारतीय स्रोतों की कहानियों की कीमत पर नहीं। हमारे यहां के सभी छात्रों को मिर्जा गालिब, व्यास, अमीर खुसरो और बाल्मिकी को जरूर पढ़ना चाहिए। काबा और काशी दोनों को हमें प्रबुद्ध करना है। अब समय आ गया है कि हम अपनी प्राचीन और मध्यकालीन संस्कृति से अपने तिरस्कार को त्यागे और अपनी स्थानीय ज्ञान की विरासत को फिर से आगे बढ़ाएं। इस बात की वकालत हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन ने भी की थी। उन्होंने कहा था कि एक विशिष्ट कक्षा दिवस की शुरुआत कुछ मिनटों के मौन ध्यान से होनी चाहिए और इसके बाद कबीर, नानक, जीसस, रामानुज, बुद्ध सहित महान विचारकों की शिक्षाओं के बारे में ज्ञान प्रदान करना चाहिए। इसलिए हम पुष्टि करते हैं कि श्री नायडू के भगवाकरण की उदारतापूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए ताकि महान विचारकों की एक सर्व समावेशी सूची तैयार हो और आलोचनात्मक सोच क्षमता को विकसित किया जा सके। लेकिन ऐसा करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस प्रकार की सोच का उद्देश्य किसी का उपदेश नहीं होना चाहिए। दरअसल भारत की सांस्कृतिक विविधता के बारे में सीखते समय समावेशी होना बहुत महत्वपूर्ण है।

निसंदेह भारत की प्राचीन संस्कृति को पुनः प्राप्त करने, उसका पुनर्निर्माण करने और गौरवशाली भारतीय बनने के लिए इसकी पुष्टि करने की आवश्यकता है। लेकिन सांस्कृतिक गौरव को हासिल करते समय साजिश के तहत चलाए जाने वाले जहरीले एजेंडों से भी बचके रहना होगा। जरूरत है कि हम अपने विशाल ज्ञान भंडार के जरिए पिछले मैकाले पद्धति को चुनौती दें। हमें भक्ति के साथ-साथ सूफी आंदोलनों के अध्ययन को भी प्रोत्साहित करना होगा। शिक्षा के भारतीकरण की संकीर्ण रूप से व्याख्या नहीं की जानी चाहिए इसे एक विशिष्ट विचारधारा रंग या विचार प्रक्रिया के साथ नहीं पहचाना जाना चाहिए, बल्कि यह सही मायने में राष्ट्रवादी होना चाहिए। जिसमें प्राच्य और पाश्चात्य दोनों दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शामिल हो, ज्ञान न तो पूरब का है न ही पश्चिम का। ज्ञान पर सबका अधिकार है यह सार्वभौमिक है।      

लेखिका एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और प्रबंधन विचारक हैं।

Share This