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मुफ्त पैसा बांटने की राजनीति

अगले लगभग डेढ़ महीनों में भारत के पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, जिसमें जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश भी शामिल है। चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को लुभाना एक सामान्य बात होती है और उसके लिए इन दलों द्वारा मतदाताओं को कई वादे किए जाते हैं। सामान्यतौर पर सरकारों (राज्य सरकारों) के जिम्मे कानून व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सुविधाएं, सड़क (स्थानीय से राज्य मुख्य मार्ग), उद्योग, कृषि आदि विषय रहते हैं। एक बेहतर शासन व्यवस्था के वादे तक तो ठीक है लेकिन आजकल राजनीतिक दल अलग प्रकार के लालच देकर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो 300 यूनिट तक बिजली हर गृहस्थ को मुफ्त दी जाएगी। अन्य राज्यों में भी राजनीतिक दल इसी प्रकार के लालच मतदाताओं को दे रहे हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने अपने चुनावी वादे में पहले दो सौ यूनिट तक बिजली उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं को और इसी प्रकार पानी के बिलों को भी कुछ सीमा तक शून्य करने का वादा किया था। इसके साथ ही साथ महिलाओं को स्थानीय परिवहन में मुफ्त यात्रा की भी घोषणा की गई थी। माना जाता है कि उसके कारण आम आदमी पार्टी को चुनावों में खासी बढ़त मिली थी।

आज हर राजनीतिक दल इस प्रकार मुफ्त की राजनीति का आसरा लेकर लोकतंत्र का मजाक बनाता दिख रहा है। पंजाब में भी चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 18 वर्ष से ऊपर हर महिला को 1,000 रूपया प्रतिमाह देने का वायदा किया है और अकाली दल ने प्रत्येक ब्लू कार्ड होल्डर महिलाओं को 2,000 रूपया प्रतिमाह देने का वायदा किया है। इसी प्रकार कांग्रेस पार्टी ने 2017 के चुनाव घोषणा पत्र में किसानों के ऋण माफी के अलावा हर बेरोजगार युवक को 2,500 रूपए देने का वायदा भी किया था। उधर आंध्र प्रदेश में चुनावों से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री ने किसानों के लिए 15,000 करोड़ रूपए की राशि बांटने का वायदा किया था और स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के लिए 10,000 रूपए देने का वायदा भी किया था। चुनाव के बाद 2021-22 के बजट में वर्तमान मुख्यमंत्री जगन रेड्डी ने 48 हजार करोड़ रूपए आवंटित किए हैं जिसके माध्यम से महिलाओं और अन्य वर्गों को मुफ्त में राशि बांटे जाने का प्रावधान है।

गौरतलब है कि वे सभी राज्य जिनमें राजनीतिक दल इस प्रकार की मुफ्त की राशियां बांट रहे हैं अथवा चुनावों में इस प्रकार के वायदे कर रहे हैं, वे सभी भारी कर्ज में पहले से ही डूबे हुए हैं। स्वभाविक है अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करने और मुफ्त में राशियां बांटने के कारण इन राज्यों की आर्थिक हालत और अधिक बिगड़ने की आशंका है, जिससे इन राज्यों में नागरिक एवं सामाजिक सुविधाओं के स्तर में गिरावट आ सकती है, यानि यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, स्वच्छता, कृषि विकास, औद्योगिक विकास समेत सभी प्रकार की सेवाओं के स्तर में गिरावट आ सकती है। उदाहरण के लिए पंजाब पर कुल कर्ज लगभग 2.83 लाख करोड़ रूपए का है, जबकि उत्तर प्रदेश पर यह कर्ज 6.53 लाख करोड़ रूपए का है। उसी प्रकार से आंध्र प्रदेश का कर्ज 3.99 लाख करोड़ रूपए का है। यानि इन सभी राज्यों के राजनीतिक दल चुनावों में मुफ्त पैसा बांटने की होड़ में लगे हुए हैं, उन राज्यों की हालत पहले से ज्यादा खराब हो सकती है।

कहा जा सकता है कि चुनाव जीतने के उद्देश्य से मुफ्त में पैसा बांटने की होड़ वास्तव में राज्यों में नागरिक एवं सामाजिक सुविधाओं को प्रभावित कर रही है, जिसे किसी भी हालत में औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता। मुफ्त में पैसा बांटने और उस नीति को प्रचारित करते हुए भारी खर्च करने में पहल करने में अरविंद केजरीवाल की दिल्ली सरकार सबसे आगे रही है। लेकिन यह बात भी सत्य है कि अपने शासन काल में अरविंद केजरीवाल सरकार ने कोई नया इन्फ्रास्ट्रक्चर, अस्पताल, कालेज अथवा विद्यालय का निर्माण नहीं किया है। माना जाता है कि उनकी सरकार का पूरा ध्यान मुफ्त बांटकर वोट बटोरने पर ही है। यह प्रवृत्ति हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी घातक है। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों एवं प्रत्याशियों को उनके गुण-दोषों के आधार पर चुना जाना अपेक्षित है। लेकिन मतदाताओं को लालच देकर उनके वोट को प्रभावित करना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है।

इतिहास गवाह है कि कई मुल्कों में मु़फ्त की राजनीति ने उन देशों को बर्बाद ही किया है। कहीं समाजवाद के नाम पर तो कहीं वोटों को लुभाने के लिए इस प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते रहे हैं। हाल ही के वर्षों में वेनेज़ुएला का उदाहरण हमारे सामने हैं। वर्ष 2013 में जो देश विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा था आज दाने-दाने के लिए मोहताज दिखाई दे रहा है। उसकी इस हालत के लिए मु़फ्त की राजनीति ही मूलरूप से ज़िम्मेदार है। यूरोपीय देश भी सामाजिक सुरक्षा के नाम पर भारी मात्रा में ख़र्च करते हैं इसके चलते उनकी वित्तीय स्थिति गड़बड़ा रही है आज अधिकांश यूरोपीय देश जो पूर्व में खासे धनाढ्य देश माने जाते थे, कर्ज़ के बोझ में डूबे हुए हैं।

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