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कोरोना से उबरती दुनिया पर रूस-यूक्रेन युद्ध का साया: सिर मुड़ाते ही ओले पड़े

वैश्विक अर्थव्यवस्था पिछले 2 वर्षों से युद्धरत है। जिसमें पहले दुनिया को कोरोना जैसी महामारी से आई आर्थिक मंदी से जूझ रही थी, फिर व्यापक टीकाकरण का अभियान शुरू हुआ और अब दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध की चपेट में आती जा रही है। कोरोना जनित आर्थिक मंदी की तरह यह युद्ध भी दुनिया के देशों पर आर्थिक कुप्रभाव डालेगा और इसका अधिकाधिक दुष्परिणाम देशों के आर्थिक विकास के साथ-साथ सामान मानविकी के विकास पर भी पड़ेगा। — अनिल तिवारी

 

कोरोना महामारी के चलाचली का दौर जहां संपूर्ण मानव समाज में नई ऊर्जा और स्फूर्ति का संचार कर रहा है, वहीं रूस-यूक्रेन संघर्ष कई प्रश्न भी सभी के समक्ष खड़े कर रहा है। करोना के घटते मामलों के बाद दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगी है। भारत में भी आर्थिक संकेतक उम्मीद जगाने वाले हैं, लेकिन सिर मुंडाते ही ओले पड़ने की तरह पिछले दो हफ्ते से रूस यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध ने एक बार फिर खतरे की घंटी बजा दी है। युद्ध लंबा खींचता है तो कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के दाम न केवल बढ़ेंगे, बल्कि आपूर्ति श्रंखला भी बाधित हो सकती है। बीते दिनों पेश आम बजट से उम्मीद जगी थी कि भारत सरकार ने अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए जो प्रावधान और आवंटन किए है उसके नतीजे सकारात्मक होंगे। लेकिन आपस में आर्थिक जरूरतों के लिए जुड़ी हुई दुनिया को युद्ध की विभीषिका के बीच नई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे भारत भी अछूता नहीं रह सकता। आर्थिक क्षेत्रों में नकारात्मक प्रभाव की आशंका गहरा रही है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022-23 के आम बजट में आयोजित कार्यक्रम श्आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्थाश् में कहा था कि कोरोना का कालखंड पूरी दुनिया के लिए एक तरह से क्रांतिकारी परिवर्तन का है। कोरोना के आगे जो दुनिया हम देखने वाले हैं, वह वैसी नहीं होगी, जैसे पहले थी। आज के बदलते परिवेश में जो संकेत मिल रहे हैं उससे लग रहा है कि विश्व व्यवस्था बहुआयामी और बहुपक्षीय होगी। भूमंडलीकरण के चश्मे से हम जिस अमेरिकी व्यवस्था की झांकी देख रही थे, अमेरिका ने खुद उसकी जड़े खोद दी है। रूस और यूक्रेन के हालिया युद्ध के बहाने चीन और अमेरिका वैश्विक कूटनीति में अपने लिए रास्ते बनाने में जुटे हैं, लेकिन सवाल है कि क्या नई व्यवस्था में बीजिंग या वाशिंगटन से हटकर किसी अन्य देश की राजधानी से कोई ऐसा समाधान निकलने की गुंजाइश है जिससे की महामारी से उत्पन्न मुद्रास्फीति, गरीबी, बेरोजगारी, आतंकवाद, साइबर संकट आदि से मुक्ति मिल सके।

इन परिस्थितियों में यदि भारत नेतृत्व का जिम्मा उठाना चाहे तो एक अच्छा मौका है, क्योंकि चीन और अमेरिका के बीच खींचतान के कारण विश्व के ढेर सारे देश एक नई राह की तलाश में है। अधिकांश देश भारत की ओर ललचाई नजर से देख रहे हैं कि 140 करोड के भारत ने किस तरह से इस करोना विपदा का सामना किया और अब लगभग इससे जीतकर बाहर भी आ गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि महामारी के दौरान भारत अपनी अलग छाप छोड़ने में सफल रहा है। आबादी की बड़ी तादाद के बावजूद कोविड के प्रबंधन में मिसाल कायम की, वहीं आर्थिक मोर्चे पर भी कमोबेश खुद को संभाले रहा, अब तो अर्थ तंत्र का पहिया सकारात्मक दिशा में घूमने लगा है।

हम सभी जानते हैं कि कोरोना संकट के आने के पहले मास्क, पीपी किट और अन्य वस्तुओं के उत्पादन की भारत में स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन अर्थव्यवस्था के नियम ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है’ को चरितार्थ करते हुए भारत ने इन वस्तुओं के उत्पादन में महारत हासिल कर सारी दुनिया को अपनी क्षमता से अवगत कराया। वैश्विक संकट के दौरान भारत स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों के अग्रणी आपूर्तिकर्ता के रूप में सामने आया। भारत की वैक्सीन कूटनीति अफ्रीकी देशों सहित पूरी दुनिया में सराही गई। भारत ने यह साबित किया है कि यहां संसाधनों की कमी के बावजूद इच्छाशक्ति दृढ़ है। संसाधन का समुचित उपयोग, व्यवहारिक दृष्टिकोण और उचित रणनीति ने दो वर्ष में ही इतनी बड़ी महामारी के खिलाफ भारत की सफलता की कहानी लिख दी है।

मौजूद आंकड़ों के हिसाब से वर्तमान में अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत मिलने लगे थे। तेज रिकवरी के साथ भारत कोरोना पूर्व की स्थिति की तरफ बढ़ने लगा है, लेकिन बदलते घटनाक्रम और बढ़ती वैश्विक गुटबंदी के कारण आशंका के बादल छाए हैं। विकास के उत्साहजनक आंकड़ों के बीच महंगाई बड़ी चुनौती बनी हुई है। अगर युद्ध के कारण तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में कठिनाई आती है तो यह महंगाई और बढ़ेगी तथा कच्चे तेल के दाम बढ़ने से पेट्रोलियम उत्पादों में करो पर कटौती का दबाव बढ़ सकता है जिसका असर सरकार के राजस्व संग्रह पर भी पड़ेगा। पहले से ही राजकोषीय घाटे के बढ़े हुए स्तर पर राजस्व संग्रह में कमी का असर विकासात्मक खर्च पर नकारात्मक हो सकता है। जहां तक कोरोना संकट के दौरान राजकोषीय स्थिति की बात है तो पिछले 2 साल के अनुभव बताते हैं कि तमाम दबाव के बावजूद केंद्र की मोदी सरकार ने संकट के दौर में काफी सूझबूझ के साथ अपने खर्चे का रणनीतिक प्रबंधन किया है। हाल ही में 5 राज्यों से आए चुनाव परिणाम से यह साबित हुआ है कि देश की जनता ने मोदी सरकार के सही प्रबंधन पर अपनी मोहर लगा दी है।

वित्त मंत्रालय की ताजा मासिक आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट एमआईआर बताती है कि कोरोना की पहली दो लहरों के मुकाबले अब देश की आर्थिक गतिविधियां कम प्रभावित हो रही है। भारत की अर्थव्यवस्था 9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकती है, जो अन्य देशों के लिए अभी दूर की कौड़ी है।

कोरोना के दौरान अर्थव्यवस्था को कृषि क्षेत्र से मजबूती मिली थी। एमआईआर का आकलन है कि रबी की बुवाई में साल दर साल ऊंचाई प्राप्त की है और 5 साल के औसत रकबे में भी 15 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इसी तरह रेल और हवाई माल यातायात में बढ़त मिली है जो कि व्यवसायिक गतिविधियों के सामान्य होने का सूचक है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआईई) के मुताबिक बेरोजगारी की दर भी गिरावट पर है। यह दिसंबर 2021 के 7.9 प्रतिशत से घटकर जनवरी 2022 में 6.6 प्रतिशत पर आ गई है। 

प्रधानमंत्री की महत्वकांक्षी योजना है, गति शक्ति योजना। इसके सात इंजनों से बुनियादी ढांचे में बढ़ोतरी के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। लेकिन रूस यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध का कितना प्रभावित करता है यह समझने वाली बात होगी। वैसे तो भारत का रूस और यूक्रेन से आयात निर्यात सीमित ही होता है लेकिन असल चिंता पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति से जुड़ी है। प्राकृतिक गैस के अलावा रूस कच्चे तेल का भी बड़ा उत्पादक है और वैश्विक आपूर्ति के हर 10 बैरल में उसका एक बैरल का योगदान होता है। यूक्रेन पर उसके हमले का असर है कि आपूर्ति बाधित होने की आशंका में कच्चे तेल का दाम 124 डालर के स्तर पर पहुंच गया है।

इस युद्ध से रूस के साथ आयात- निर्यात पर नकारात्मक असर होगा। हालांकि वाणिज्य मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021-22 में भारत के निर्यात और आयात में रूस की हिस्सेदारी मात्र 0.84 प्रशित और 1.5 प्रतिशत है, परंतु भारत-रूस को 2.5 प्रतिशत बिलियन डालर का निर्यात करता है, जिसमें इलेक्ट्रिकल मशीनरी औषधीय रासायनिक एवं कृषि उत्पाद, आणविक क्षेत्र, लौह एवं स्टील शामिल है क्योंकि भारत इन क्षेत्रों में मेक इन इंडिया योजना के माध्यम से अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर बल दे रहा है इसलिए रूस पर प्रतिबंध हमारे इन क्षेत्रों के उत्पादों के लिए बाजार को सीमित करने जैसा है। निर्यात पर नकारात्मक असर हमारी विदेशी मुद्रा भंडार को और कम करेगा। यूक्रेन से हमारे व्यापारिक संबंध सीमित है, क्योंकि यूक्रेन के साथ निर्यात और आयात की हिस्सेदारी हमारी कुल निर्यात और आयात की क्रमशः 0.12 प्रतिशत और 0.45 प्रतिशत ही है। हम यूक्रेन से 1.4 बिलियन डालर का खाद्य तेल आयात करते हैं। विपरीत परिस्थितियों में इसे हमें महंगे दामों पर खरीदना पड़ेगा जो महंगाई दर में और वृद्धि करेगा।

भारत की मुश्किल यह है कि देश अपनी पेट्रोलियम जरूरत का 85 प्रतिशत आयात करता है जिसका बड़ा हिस्सा रूस से ही आता है। एक बदली परिस्थिति में भारत का आयात पर बढ़ने का अनुमान है जो निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। अगर युद्ध लंबा खींचा तो इसका असर दूसरे सेक्टरों में भी दिखाई पड़ सकता है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पिछले 2 वर्षों से युद्धरत है। जिसमें पहले दुनिया को कोरोना जैसी महामारी से आई आर्थिक मंदी से जूझ रही थी, फिर व्यापक टीकाकरण का अभियान शुरू हुआ और अब दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध की चपेट में आती जा रही है। कोरोना जनित आर्थिक मंदी की तरह यह युद्ध भी दुनिया के देशों पर आर्थिक कुप्रभाव डालेगा और इसका अधिकाधिक दुष्परिणाम देशों के आर्थिक विकास के साथ-साथ सामान मानविकी के विकास पर भी पड़ेगा। हर बार की तरह भारत को अपने कुशल नेतृत्व पर भरोसा है, भारत ने मौजूदा युद्ध पर तटस्था प्रस्तुत की है। आशा की जानी चाहिए समूची मानवता की भलाई के लिए खून से लाल हो चुकी को पूर्वी और पश्चिमी में बांटने वाली नीपर नदी शीघ्र ही शांति की शीतल धारा में रूपांतरित हो जाये। 

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