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युद्ध की कूटनीति और अर्थशास्त्र

भारत समेत दुनिया के सभी देशों को एक सीख लेनी होगी कि विस्तारवादी ताकतें अपनी सोच से बाज नहीं आ सकती। अपनी स्वतंत्रता अक्षुण्य रखने के लिए जरूरी है कि देश आर्थिकी, प्रौद्योगिकी और सैन्य, सभी दृष्टि से मजबूत हो। — डाॅ. अश्वनी महाजन

 

रूसी राष्ट्रपति पुतिन के द्वारा पूर्वी युक्रेन में विशेष सैनिक कार्यवाही के लिए अनुमति देने के बाद, 24 फरवरी 2022 को युक्रेन के कई शहरों पर रूस ने मिसाइलों से आक्रमण के चलते दुनिया भर में चिंता व्याप्त हो गई है, क्योंकि इससे दुनिया की शांति भंग हो सकती है। गौरतलब है कि 1991 में सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य के विघटन के साथ एक स्वतंत्र देश यूक्रेन का जन्मजनमत संग्रह और राष्ट्रपति चुनाव के साथ हुआ था।

युक्रेन को पूरी उम्मीद थी कि रूसी आक्रमण के बाद अमरीका उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाएगा, लेकिन अमरीका द्वारा सैन्य मदद से इंकार के बाद युक्रेन के राष्ट्रपति ने अमरीका की भी आलोचना की है। ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में कहीं से भी मदद न मिलने के कारण ताकतवर रूस के साथ युक्रेन की सेनाएं आत्मसमर्पण कर देंगी।

वर्तमान संकट के बारे में यदि निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो ऊपरी तौर पर ऐसा लग सकता है कि यह किसी देश के ऊपर आक्रमण है। जैसा कि भारत ने कहा भी है कि सभी विवादों को बातचीत के माध्यम से हल किया जा सकता है, और ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन यदि रूस के नजरिए से इस पर विचार किया जाए तो ध्यान में आता है कि शीतयुद्ध के समय से लेकर अभी तक एक ओर रूस और दूसरी ओर अमरीका एवं उसके मित्र अन्य नाटो देशों के बीच लगातार एक तनातनी बनी हुई है। कोई संदेह नहीं, युक्रेन द्वारा नाटो समूह में शामिल होने से रूस की सीमाओं पर नाटो उपस्थित हो जाएगा। ऐसे में रूस कभी भी नहीं चाहेगा कि किसी भी हालत में युक्रेन नाटो का सदस्य बने। साथ ही साथ यह पहली बार नहीं है कि युक्रेन के साथ रूस के संबंधों में टकराव की स्थिति आई है। जब-जब युक्रेन ने नाटो के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ाने का प्रयास किया है, तब-तब रूस ने उसका प्रतिकार किया है।

यूं तो किसी भी मुल्क को किसी भी समूह में शामिल होने की स्वतंत्रता होती है, लेकिन रूस की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में अमरीका और यूरोपीय समुदाय और इंग्लैंड द्वारा रूस पर प्रतिबंध इत्यादि की कार्यवाही से भी युक्रेन को कोई लाभ होने वाला नहीं है। अमरीका या नाटो देशों द्वारा किसी भौतिक मदद के बिना, युक्रेन रूस के खिलाफ इस लड़ाई में अकेला पड़ चुका है। ऐसे में भारत समेत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा आपसी बातचीत के माध्यम से शांति के प्रयास उपयोगी हो सकते है।

कुछ अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों का यह मानना है कि आने वाले समय में रूस के राष्ट्रपति सोवियत संघ की पुर्नस्थापना हेतु सोवियत संघ के विघटन के बाद नवोदित देशों पर भी सैन्य आक्रमण कर उन्हें अपने अधीन कर सकते हैं। लेकिन इस विचार का कोई आधार दिखाई नहीं देता है। सर्वप्रथम रूस ने स्वयं कहा है कि युक्रेन पर कब्जा करने का उसका कोई इरादा नहीं है। साथ ही साथ, कुछ समय पूर्व जब रूसी राष्ट्रपति से यह प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने कहा कि दुनिया में केवल एक ही महाशक्ति अमरीका है और रूस को पुनः एक महाशक्ति बनाने का कोई कारण भी नहीं और अपेक्षा भी नहीं। उन्होंने कहा कि महाशक्ति बने रहने की होड़ में उन्होंने काफी आर्थिक नुकसान सहा है। गौरतलब है कि सोवियत संघ के दिनों में शीतयुद्ध के चलते, रूस के राजकोष का एक बड़ा हिस्सा सैन्य खर्च में जाता था, जिसके कारण रूस के लोगों का जीवन स्तर अन्य बराबर देशों की तुलना में बहुत कम रह गया और मानव विकास की दौड़ में कहीं ज्यादा पिछड़ गया।

गौरतलब है कि एक महाशक्ति बने रहने की कवायद में अमरीका ने भी काफी नुकसान सहा है। सामान्यतः अमरीका अपनी दादागिरी के प्रदर्शन हेतु, अपनी रणनीति के अंतर्गत विभिन्न देशों में सैन्य हस्तक्षेप करता रहा है। अफगानिस्तान, समेत कई मुल्कों में अमरीकी हस्तक्षेप, हाल ही के कुछ उदाहरण हैं।

इन सभी प्रकार के हस्तक्षेपों का आर्थिक नुकसान के रूप में खासा खामियाजा अमरीका को भुगतना पड़ा है। इसीलिए अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति ने अलग-अलग मुल्कों में अमरीकी हस्तक्षेप के नुकसानों से सबक लेते हुए भविष्य में इनसे बचने का आह्वान किया। हाल ही में वैश्विक आलोचना के बावजूद अमरीका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापिस बुला लिया था। यह निर्णय आर्थिक कारणों से ही लिया गया था।

इसीलिए युक्रेन पर रूसी आक्रमण को साम्राज्यवादी विस्तार के नाते नहीं, रूस की अपनी सीमाओं की रक्षा हेतु संवदेना के रूप में देखा जाना चाहिए। इस संबंध में युक्रेन के घटनाक्रमों पर रूस की पहली प्रतिक्रिया नहीं है। इससे पूर्व भी कई बार रूस ने युक्रेन पर सशस्त्र और अन्य प्रकार से हस्तक्षेप किया है। वो नहीं चाहता कि ‘नाटो’ के कारण उसकी सीमाओं पर कोई संकट आए।

2004 के चुनावों में रूस समर्थक उम्मीदवार विक्टर यनुकोविच के चुनाव के संबंध में धांधली के आरोप के बाद पुर्नचुनाव हुए और 2005 के चुनावों में यूस्चैनो द्वारा सत्ता प्राप्त करने के बाद युक्रेन को रूस के प्रभुत्व से बाहर करते हुए नाटो एवं यूरोपीय समुदाय की तरफ ले जाने का वादा किया गया। 2008 में नाटो ने युक्रेन को अपने गठजोड़ में लेने हेतु वादा किया। लेकिन 2010 में पुनः रूस समर्थक यनुकोविच राष्ट्रपति पद के लिए विजयी हुए और युक्रेन के ब्लैक सी बंदरगाह के रूसी जलसेना को लीज को आगे बढ़ा दिया गया। 2017 में फिर युक्रेन के यूरोपीय समुदाय के साथ आर्थिक संबंध बढ़ने लगे। कई उतारों-चढ़ावों के बाद युक्रेन के राष्ट्रपति जैलेन्सकी ने अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडन को गुहार लगाई कि वो युक्रेन को नाटो का सदस्य बनने दें। 2021 के मध्य में रूसी सेनाएं युक्रेन की सीमाओं तक पहुंच गई, लेकिन युक्रेन फिर भी रूस के लिए नापसंद कार्य करता रहा। दिसंबर 7, 2021 को बाइडन ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी। उसके बाद से नाटो और अमरीका लगातार रूस के प्रति आक्रामक रूख अपनाए रहा। यूरोपीय समुदाय के देशों, इंग्लैंड और अमरीका द्वारा लगातार रूस को धमकियां दी जाती रहीं। इन धमकियों को दरकिनार कर इस युद्ध में सैन्य दृष्टि से ही नहीं, कूटनीतिक तौर पर भी रूस विजयी होता दिखाई दे रहा है। जहां अमरीका ही नहीं नाटो की ओर से भी युक्रेन को कोई सहायता नहीं मिली बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी भारत और चीन समेत तीन देशों ने उस प्रस्ताव से तटस्थ रहकर पश्चिमी देशों के रूख से किनारा कर लिया है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से रूस और चीन के बीच परस्पर सहयोग बढ़ा है और अंतर्राष्ट्रीय मुददों पर उनकी साझेदारी बढ़ रही है। अमरीका को ज्ञात है कि रूस और चीन के बीच अभी तक जो समझ बनी है, वो राजनयिक और आर्थिक मुद्दों तक ही सीमित है। अमरीका कभी नहीं चाहेगा कि यह सैन्य सहयोग की तरफ भी आगे बढ़ जाए। इसलिए अमरीका द्वारा युक्रेन को सहयोग नहीं दिया जाना अमरीका की समझ दिखाता है। जहां तक अमरीका, यूरोपीय समुदाय और इंग्लैंड द्वारा युक्रेन पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की बात है, उससे रूस को खास फर्क पड़ने वाला नहीं है, लेकिन संभव है कि प्रतिबंध लगाने वाले देशों पर ही इसका दुष्प्रभाव पड़े।

कई अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषक इस बात से सशंकित हैं कि इस उदाहरण का लाभ उठाते हुए चीन ताईवान पर कब्जा न कर लें। हालांकि चीन के मंसूबों के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, चाहे पिछले काफी समय से चीन ताईवान पर अपना दावा ठोकता रहा है, लेकिन समझना होगा कि चीन के इन मंसूबों से निपटने के लिए अमरीका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया ‘क्वाड’ के अंतर्गत समुद्र में सैन्य अभ्यास के माध्यम से चीन पर अंकुश लगाए हुए हैं। इसलिए बिना उनसे निपटे चीन के मंसूबे सफल नहीं हो सकते।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव से किनारा करते हुए बातचीत के सहारे इस मुद्दे के समाधान की बात कही है। इस बातचीत में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

भारत समेत दुनिया के सभी देशों को एक सीख लेनी होगी कि विस्तारवादी ताकतें अपनी सोच से बाज नहीं आ सकती। अपनी स्वतंत्रता अक्षुण्य रखने के लिए जरूरी है कि देश आर्थिकी, प्रौद्योगिकी और सैन्य, सभी दृष्टि से मजबूत हो। ऐसे में अपने आर्थिक तंत्र और प्रौद्योगिकी को मजबूत बनाते हुए भारत को अपने देश को सैन्य दृष्टि से मजबूत बनाने के लिए रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना होगा, तभी विस्तारवादी ताकतों के कुत्सित प्रयासों से हम बच सकते हैं।

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