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विश्व खाद्य सुरक्षा दिवसः सुरक्षित भोजन-बेहतर स्वास्थ्य

वर्ष 2030 तक भुखमरी मिटाना और सभी लोगों विशेषकर गरीब और लाचारी की स्थिति में जी रहे लोगों को भोजन सुलभ कराना कुपोषण के हर रूप को मिटाना जिसमें 5 वर्ष से छोटे बच्चों में बौनेपन पर और क्षीणता के बारे में भी अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करना शामिल है। — शिवनंदन लाल

 

विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस। जुलाई 2017 में खाद्य एवं कृषि संगठन के 40वें सत्र में इसका प्रस्ताव आया था, जिस पर संयुक्त राष्ट्र संगठन के 73वें सम्मेलन में समीक्षा के बाद प्रत्येक वर्ष 7 जून को विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाने की घोषणा की गई थी । विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य और सतत विकास के योगदान से हर हाथ को काम तथा हर पेट को सुरक्षित भोजन का लक्ष्य हासिल करना है। इस लक्ष्य के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए हर साल एक थीम जारी की जाती है। इस बार विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस 2022 की थीम “सुरक्षित भोजन-बेहतर स्वास्थ्य“, है जो मानव सेहत को सुनिश्चित करने में सुरक्षित और पौष्टिक भोजन की भूमिका पर प्रकाश डालती है।

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी का प्रसिद्ध वक्तव्य है, ‘भूख के खिलाफ मानवता की जंग आजादी का असली जंग है।’ तो ऐसे में सवाल है कि क्या हम मानवता की इस आजादी को हासिल कर चुके हैं?

दुनिया के हर व्यक्ति का पेट भरने लायक पर्याप्त भोजन मौजूद होने के बावजूद आज हर 9 में से एक व्यक्ति भूखा रहता है। इन लाचार लोगों में से दो तिहाई लोग एशिया में रहते हैं। अगर हमने दुनिया की आहार और कृषि व्यवस्थाओं के बारे में गहराई से नए सिरे से नहीं सोचा तो अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में भूख के शिकार लोगों की संख्या 2 अरब के पार पहुंच जाएगी। हालांकि विकासशील देशों में कुपोषित लोगों की संख्या में कमी आई है। सन 1990-92 के दौरान यह 23.3 प्रतिशत थी जो 2018-20 के दौरान घटकर 12 प्रतिशत पर आ गई है। लेकिन लगभग 100 करोड़ लोग आज भी अल्प पोषित हैं।

दक्षिण एशिया में भुखमरी का बोझ अभी सबसे अधिक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 साल होने पर भी भारत में महिलाओं बच्चों में भूख और पोषण का स्तर चिंताजनक है। वैश्विक भूख सूचकांक, वैश्विक पोषण रिपोर्ट, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण आदि स्त्रोतों के आंकड़े भारत में भूख और कुपोषण में लिपटी बहुजन की बदहाली को बयान करते हैं जो अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के मुताबिक आजादी के वक्त से अब तक जस की तस कायम है।

साल 2011 की जनगणना में भारत की आबादी लगभग 120 करोड़ थी जो कि वर्ष 2030 तक 160 करोड़ हो जाने का अनुमान है। तब भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश होगा। ऐसे में पेट का पहाड़ हो जाना लाजमी होगा।

मानव इतिहास के वर्तमान दौर में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सभी स्तरों पर राज्य की सर्वमान्य अवधारणा एक कल्याणकारी राज्य की है। लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता राज्य की स्थापना करती है और राज्य का यह दायित्व है कि वह जनता के कल्याण का पूरा ध्यान रखें। संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को समाज का मुख्य आधार माना जाता है जो राज्य की संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को इंगित करता है तथा यहां स्थापित करता है कि खाद्य सुरक्षा की गारंटी प्रदान करना राज्य का पहला कर्त्तव्य है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। जीवन के अधिकार से भोजन का अधिकार संपृक्त है क्योंकि जिस तरह जीने के लिए सांस जरूरी है उसी तरह जीने के लिए भोजन भी आवश्यक है। संविधान का अनुच्छेद 47 कहता है कि लोगों के पोषण और जीवन स्तर को उठाने के साथ-साथ जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की प्रस्तावना में लिखा है कि खाद्य सुरक्षा कानून मानव जीवन चक्र पर आधारित है इसका उद्देश्य लोगों को जीवन जीने के लिए उस कीमत पर जो उनके सामर्थ में हो पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण भोजन व पोषण सुरक्षा देना है, ताकि लोग सम्मान एवं गरिमा के साथ जीवनयापन कर सकें। इस कानून के तहत प्राथमिकता वाले परिवारों को प्रति व्यक्ति के हिसाब से हर महीने राशन उपलब्ध कराया जाता है। कोरोना काल के दौरान सरकार ने देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मुहैया कराया। बढ़ती खाद्य जरूरतों को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान के तहत खाद्य फसलों का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए पहल की है। खेती के रकबे का विस्तार चावल गेहूं और दालों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए वर्ष 2007 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान के तहत रोजगार के अवसर पैदा करने मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार करने तथा कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कार्य योजना तैयार की गई थी। वर्ष 2014-15 से वाणिज्य फसलों पोषक तत्वों वाले अनाज तथा मोटे अनाज को भी इसमें शामिल कर लिया गया। यह अभियान 25 मिलियन टन अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्य के साथ 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान जारी रखा गया था। इसके तहत 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक 10 मिलियन टन चावल, 8 मिलियन टन गेहूं, 4 मिलियन टन दलहन और तीन मिलियन टन  मोटे अनाज का अतिरिक्त उत्पादन लक्ष्य हासिल करना था। 12वीं योजना के बाद इस अभियान को 13 मिलियन टर्न खदान के नए अतिरिक्त लक्ष्य के साथ जारी रखा गया था इसके अंतर्गत वर्ष 2017-18 से वर्ष 2020 तक 5 मिलीयन टन चावल, 3 मिलीलीटर गेहूं, 3 मिलीयन टन दालें और 2 मिलियन टन पोषक तत्वों वाले मोटे अनाज का अतिरिक्त उत्पादन का लक्ष्य रखा गया। इस अभियान के तहत अधिक उपज देने वाली किस्मों के बुआई के बीज वितरण, कृषि मशीनरी संसाधन संरक्षण, मशीनरी उपकरण, कुशल जल अनुप्रयोग, उपकरण, पौधा संरक्षण पोषक तत्व प्रबंधन और किसानों को फसल प्रणाली आधारित प्रशिक्षण आज प्रदान किए गए। वर्ष 2020 में किस से किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से प्राथमिक प्रसंस्करण इकाइयों छोटे भंडारण केंद्र लचीले हस्तक्षेप को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार इस अभियान में जोड़ा गया है। इस अभियान में बीज प्रतिस्थापन दर और प्रजातीय प्रतिस्थापन में सुधार के लिए ध्यान केंद्रित किया गया है तथा नवीनतम किस्मों की छोटी कीट को केंद्रीय बीज एजेंसियों के माध्यम से किसानों के घर पर मुफ्त में वितरित किया जा रहा है। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 2020 तक हाइब्रिड किस्मों के लगभग 74 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित किए गए थे। हर खेत को पानी और प्रति बूंद अधिक फसल के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए 2020 तक के एन.एफ.एस.एम. के तहत किसानों के बीच 274600 पंपसेट और 126967 पानी का छिड़काव करने वाले यंत्र तथा पानी ले जाने वाले लगभग 764 लाख मीटर पाइप वितरित किए गए।

भारत सरकार द्वारा किए गए ठोस प्रयासों के परिणाम स्वरुप 2014-15 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 252 मिलियन टन से बढ़कर 2020 के दौरान 297 मिलियन टन हो गया है जो कि 17.80 प्रतिशत की वृद्धि दिखाता है। खाद्यान्नों की उत्पादकता 2014-15 में 2028 किलोग्राम हेक्टेयर थी जो 2020 के दौरान बढ़कर 2325 किलोग्राम प्रति हेक्टर हो गई है जो कि 14.70 प्रतिशत की वृद्धि है। दलहन के क्षेत्र में लगभग 35 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

तमाम प्रयास के बावजूद वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की स्थिति चिंताजनक है। देशभर में 5 साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे ठिगनापन के शिकार हैं वहीं 21 प्रतिशत बच्चे अति कमजोर की श्रेणी में है जिनका वजन बहुत ही कम है जो कि इनके कुपोषण का इशारा करती है । संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत में 40 प्रतिशत खाना बर्बाद हो जाता है। एक अन्य आंकड़े के मुताबिक आस्ट्रेलिया एक साल में जितना गेहूं पैदा करता है उतना गेहूं भारत में समुचित भंडारण के अभाव में हर साल बर्बाद हो जाता है। यानि कि भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी और करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है।

एक कहावत है कि भूखे भजन न होय गोपाला। मतलब भूखे पेट भगवान का भजन भी नहीं हो सकता फिर सबसे बड़ी भूखी और कुपोषित आबादी वाला यह देश अपनी आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक तरक्की कैसे सुरक्षित रहेगा। इसलिए अगर हम खुद को विश्व महाशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें मिलजुलकर भूख और कुपोषण की विकराल समस्याओं से निजात पाना होगा, वरना वक्त बिता चला जाएगा और बदहाली बदस्तूर कायम रहेगी। 

प्रधानमंत्री का मानना है कि पुराने रास्तों पर चलते हुए आप कभी भी नई मंजिलें तय नहीं कर सकते इसलिए वर्तमान सरकार नए एप्रोच के साथ काम कर रही है। सरकार का दर्शन है ‘सबका साथ, सबका विकास, सबमें विश्वास’ इसके जरिए प्रयास है कि समाज के इस अंतिम व्यक्ति तक वह हर सुविधा पहुंचाई जाए जो आजादी के 75 साल होने पर भी ठीक से नहीं पहुंच पाई है। 

हर हाथ को काम तथा हर पेट को भोजन मुहैया कराने की गरज से सरकार ने वित्तीय समावेशीकरण की प्रक्रिया चालू की है। जनधन खाते खोले गए लोगों को सीधे अकाउंट में पैसा भेजा गया मुद्रा योजना के तहत लाखों लोगों को ऋण देकर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया मेक इन इंडिया स्टार्ट अप स्टैंड अप स्वच्छता उद्यमी योजना से लेकर वह कल फलों कल तक का अभियान चलाया गया है। ईज आफ लिविंग की तरह ईज आफ डूइंग बिजनेस का माहौल बनाकर समतामूलक समाज की कल्पना की गई है। एक बेहतर उधमिता का वातावरण तैयार किया जा रहा है जिसमें लोग खुद तो काम शुरू करें ही समाज के दूसरे लोगों को भी काम से जोड़ सकें। 

2030 सतत विकास एजेंडा के लक्ष्य 2 का उद्देश्य अगले 15 वर्ष में भूख और हर तरह के कुपोषण को मिटाना और खेती की उत्पादकता को बढ़ाना है। सबके लिए पौष्टिक आहार सुलभ कराना चुनौतीपूर्ण है। हम अपना आहार कैसे उगाते हैं और कैसे खाते हैं इन सबका भूख के स्तर पर गहरा असर पड़ता है। खेती दुनिया में रोजगार देने वाला अकेला सबसे बड़ा क्षेत्र है। दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी वहीं भारत में कुल श्रमशक्ति के लगभग 55 प्रतिशत हिस्से को खेती में रोजगार मिलता है। देश की आधी से अधिक आबादी को रोजगार देने के बावजूद भारत के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान मात्र 15 प्रतिशत है। भारत सरकार ने सिंचाई फसल बीमा और बेहतर किस्मों के मामले में कदम उठाकर खेती को मजबूत करने को प्राथमिकता दी है। सरकार ने खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिनमें राष्ट्रव्यापी लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राष्ट्रीय पोषाहार मिशन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून शामिल है। 

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना टिकाऊ खेती के बारे में राष्ट्रीय मिशन और बागवानी कृषि टेक्नोलॉजी तथा मवेशियों के बारे में अनेक योजनाएं भारत में खेती की स्थिति सुधारने में अग्रणी भूमिका निभा रही है। वर्ष 2030 तक भुखमरी मिटाना और सभी लोगों विशेषकर गरीब और लाचारी की स्थिति में जी रहे लोगों को भोजन सुलभ कराना कुपोषण के हर रूप को मिटाना जिसमें 5 वर्ष से छोटे बच्चों में बौनेपन पर और क्षीणता के बारे में भी अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करना शामिल है। खेती की उत्पादकता खासकर महिलाओं, मूल निवासियों, पारिवारिक किसानों, चरवाहों और मछुआरों सहित लघु आहार उत्पादकों की आमदनी बढ़ाने  के साथ-साथ बाजार तक पक्की पहुंच कच्चे माल की जानकारी वित्तीय सेवाएं बाजार और मूल्य संवर्धन के लिए अवसर तथा गैर कृषि रोजगार सुलभ कराने के लिए प्रयास किया जाना है। ग्रामीण बुनियादी ढांचागत सुविधाओं कृषि अनुसंधान और विस्तार सेवाओं टेक्नोलॉजी विकास और पौधे एवं महेशी मवेशी जिन बैंकों में निवेश बढ़ाना प्राथमिकता में शामिल है।            

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