चीन के खिलाफ कड़े कदम उठाने होंगे

भारत और चीन की अर्थव्यवस्था के बीच अक्सर तुलना की जाती है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के मुकाबले चीन की अर्थव्यवस्था कई गुना बड़ी है। चीन ने पिछले कुछ समय में ढांचागत सुविधाओं में बहुत काम किया है। वह विश्व के बाजार में पूरी तरह से छाया हुआ है। भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका और विश्व के कई देश इस समय चीन के इस आर्थिक दबदबे से परेशान हैं। भारतीय बाजार पर बढ़ते चीन के दबदबे को कम करने के लिए कई मोर्चो पर काम करना होगा। हमें औद्योगिक ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ नीतिगत रूप से भी कई कड़े फैसले लेने होंगे। ‘चीन के आर्थिक दबदबे का सामना कैसे करे भारत? ’ विषय पर दैनिक जागरण कार्यालय में आयोजित संगोष्ठी में स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक अश्वनी महाजन ने सोमवार को कुछ इसी अंदाज में अपने विचार रखे।

बिलिंग से चार गुना अधिक सामान आयात हो रहा : अश्वनी महाजन ने कहा कि एक जनवरी 1995 को जब विश्व व्यापार संगठन बना तो चीन इसका सदस्य तक नहीं था। 1998 में चीन ने इसमें शामिल होने की इच्छा जताई और वर्ष 2001 में वह इसका सदस्य बना। इसके बाद उसने अपना खेल खेलना शुरू कर दिया। चीन ने डायरेक्ट एक्सपोर्ट की पद्धति को अपनाया और फिर दूसरे देशों के बाजारों में अपना सामान डंप करना शुरू कर दिया।

कुछ ही साल में विश्व के बाजारों में चीन के उत्पादों ने कब्जा जमा लिया। लोगों को इसे कम कीमत पर खरीदने में मजा आया और फिर धीरे- धीरे चीन की चाल कामयाब होती चली गई।

चीनी चाल समझ आई तो खुली आंखें : ड्रैगन की चाल समझ में आने के बाद अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों ने भी अब अपने यहां चीन के उत्पादों पर टैक्स दरें बढ़ाना शुरू कर दिया है। पिछले दो तीन साल में भारत में लगभग 140 चीनी उत्पादों पर एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाई गई है। फरवरी 2018 से अब तक भारत सरकार चीनी उत्पादों पर चार बार टैक्स टैरिफ बढ़ा चुकी है। जिसके परिणाम स्वरूप पिछले साल अप्रैल से दिसंबर की अवधि में चीन से तीन बिलियन डॉलर का आयात कम हुआ है।

महाजन ने बताया कि विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्धारित टैक्स टैरिफ के अनुपात में अभी एक चौथाई दर ही भारत सरकार ने चीनी उत्पाद पर बढ़ाई है, इसे उच्चतम स्तर तक ले जाना जरूरी है। इसके अलावा सरकार को भारतीय उद्योग जगत को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके हित यहां सुरक्षित हैं। उद्योगों को सहूलियत मिलेगी तो यहां कम लागत में उत्पाद तैयार होंगे। जब स्वदेशी सामान सस्ते में मिलेगा तो चीनी उत्पाद की ओर रुझान स्वत: कम हो जाएगा।

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