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कोविड-19 का जैविक आक्रमण एवं चीन

Admin June 20, 2021

चीन द्धारा इस वायरस को जैविक हथियार के रूप में विकसित किये जाने के षड़यंत्रा की चर्चाओं को एक बार निराधार मान लेने के बाद भी यह निर्विवादतः सत्य है कि चीन में इस वायरस का उद्गम हुआ और चीन ने इस संबंध में अपने वैधानिक कर्त्तव्यों की अवहेलना की, जिससे यह संकट विश्व भर में फैला। — प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा

 

विगत 16 माह में विष्व में 17.5 करोड़ व भारत में 2.85 करोड़ से अधिक लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं। इनमें से 37 लाख से अधिक पूरे विष्व में व 3.4 लाख से अधिक लोग भारत में कोविड-19 से अकाल मृत्यु के षिकार हुए हैं। मृतकों की दस गुनी संख्या में कोरोना संक्रमण से मुक्ति के बाद भी कोविड-19 के उत्तरवर्ती प्रभावों के कारण संक्रमण युक्त होने के बाद भी विकलांगता अर्द्ध-विकलांगता, व कई अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हैं। कोरोना व लॉकडाउन आदि से 2020 में वैष्विक अर्थव्यवस्था को 42 खरब डालर की प्रत्यक्ष क्षति हो चुकी है और वर्ष 2021 में 65 खरब डालर की प्रत्यक्ष क्षति सम्भावित है। परोक्ष क्षति इससे कहीं अधिक है। विष्व की अधिकांष शेष जनता भी आज कोविड-19 से संभावित संक्रमण के भय से त्रस्त्त है।

चीन में उद्गम व उनकी उत्तरदेयताः

चीन द्धारा इस वायरस को जैविक हथियार के रूप में विकसित किये जाने के षड़यंत्र की चर्चाओं को एक बार निराधार मान लेने के बाद भी यह निर्विवादतः सत्य है कि चीन में इस वायरस का उद्गम हुआ और चीन ने इस संबंध में अपने वैधानिक कर्त्तव्यों की अवहेलना की जिससे यह संकट विष्व भर में फैला। चीन में यह वायरस 17 नवम्बर 2019 को ही चिन्हित हो गया था। दिसंबर के अंत में इससे मानव मृत्यु भी घट चुकी थी और मध्य दिसम्बर तक हुनान के सामुद्रिक खाद्य बाजार के अनेक ग्राहकों व कर्मचारियों में इस वायरस का प्रकोप भी प्रकट हो चुका था। लेकिन, चीन इन सभी बातों को छिपाता रहा। फरवरी 14 तक उसके 1700 स्वास्थ्यकर्मी भी संक्रमित भी हो गये थे। चीन द्वारा अपने विधिक दायित्व का उल्लंघन करते हुए इन जानकारियों को षडयंत्र-पूर्वक छिपाए रखने से ही यह महामारी विष्व भर में फैली है। विष्व स्वास्थ्य संगठन के ‘‘अन्तर्राष्टीय स्वास्थ्य नियमनों’’ के अधीन ऐसे संक्रामक रोग की जानकारी विष्व स्वास्थ्य संगठन को अनिवार्यतः देने के लिए चीन विधानतः बाध्य था। इसलिए, सारी जानकारियों को छिपाने के लिए अन्तर्राष्टीय कानूनों के अधीन चीन, विष्व स्वास्थ्य संगठन और कोरोना प्रभावित 200 से अधिक देषों के प्रति उत्तरदायी व उनका दोषी है। 

अंतर्राष्ट्रीय विधि के अधीन, इसकी क्षतिपूर्ति उससे कराया जाना विधि सम्मत है। अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमनों (इंटरनेषनल हेल्थ रेगुलेषन्स) के अनुच्छेद 6 के अधीन, किसी देष की सीमाओं में उपजे जन स्वास्थ्य संबंधी प्रत्येक जोखिम की सूचना 24 घण्टे की अवधि में विष्व स्वास्थ्य संगठन को देनी होती है। इन्हीं नियमनों के अनुच्छेद-7 के अधीन, स्वास्थ्य संबंधी उस जोखिम का कारण व उद्गम कुछ भी हो, उसके उद्गम वाले देष को, उसकी सीमा में वैष्विक जनस्वास्थ्य के प्रति संकट की द्योतक प्रत्येक छोटी-बड़ी घटना के संबंध में, जो भी तथ्य उपलब्ध हैं उन्हें अनिवार्य रूप से विष्व स्वास्थ्य संगठन को उपलब्ध कराने होते हैं। चीन ने अपने इन दोनों ही वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है। इसलिए विष्व समुदाय द्धारा इसकी क्षतिपूर्ति के लिए चीन को बाध्य किया जाना विधि सम्मत है। वैष्विक चित्ति उस दिषा में अग्रसर होती भी दिखलाई देती है। लन्दन स्थित इण्टरनेषनल काउन्सिल ऑफ़ ज्यूरिस्ट्स के अनुसार भी चीन पर इस प्रकार की क्षतिपूर्ति का असन्दिग्ध दायित्व है। 

चीन का विष्व स्वास्थ्य संगठन के नियमनों के उलंघन का अपराध व दायित्व अत्यन्त गंभीर है क्योंकि, आज तक भी चीन इस वायरस संबंधी, कई उपलब्ध जानकारियाँ छिपाए हुये है। इसकी जाँच हेतु अन्य देषों के बहुपक्षीय निरीक्षकों को प्रवेष की अनुमति देने को भी तैयार नहीं है। वस्तुतः नवम्बर 17, 2019 को चीन में इस नवीन वायरस के उपजने के साथ ही इसकी सूचना चीन को 24 घण्टे में विष्व स्वास्थ्य संगठन को दे देनी थी। दिसम्बर 26, 2019 को तो चीनी संचार माध्यमों में एक अनाम लैब टेक्नीषियन के संदर्भ से सार्स रोग से 87 प्रतिषत समानता रखने वाले लक्षणयुक्त इस नवीन कोरोना वायरस के समाचार तक प्रसारित हो गये थे। तब भी चीन उन समाचारों को रोकने में ही लगा रहा। दिसंबर 30 को तो चीनी ‘वुहान सेण्ट्रल हास्पीटल’ के वैज्ञानिक ‘ली वेनलियांग’ ने इस कोरोना वायरस के संकट की स्पष्ट शब्दों में चेतावनी ही दे दी थी। उसे व ऐसी सूचनायें देने वाले अन्य वैज्ञानिकों को तत्काल ही गिरफ्तार कर लिया था या बलात चुप कर दिया गया। चार दिनों के उत्पीड़न के बाद ‘ली’ को तो स्वयं अपने को झूठा स्वीकार करने तक को बाध्य कर लिया था। इण्टरनेट पर भी इस वायरस की कोई सूचनाएँ साझा करने के विरुद्ध जनवरी एक को सिन्हुआ समाचार ऐजेन्सी के माध्यम से सभी नेटीजन्स (नेट पर सूचना साझा करने वालों तक) कड़ी चेतावनी भी दे डाली। 

दिसम्बर 31 को विष्व को और भी गुमराह करने के लिए वुहान म्यूनिसिपल कमीषन तक ने जानबूझ कर यह झूठ भी प्रसारित कर दिया कि इस रोग का ‘‘मानव से मानव’’में संक्रमण ही नहीं होता है। चीन के ही अनुचित प्रभाव में विष्व स्वास्थ्य संगठन तक ने 21 जनवरी को यह तक कह दिया कि इस वायरस का प्रभाव अत्यन्त हल्का (माइल्ड) है व यह पूर्ण रूप से नियंत्रण में है। इसके लिये तो विष्व स्वास्थ्य संगठन का भी गंभीर लापरवाही-जन्य दायित्व उपजता है जिसे षडयंत्रपूर्ण दुष्प्रचार ही कहा जायेगा।

वुहान लैब से लीक हुआ कोरोना वाइरसः

विष्व के कुछ अलग शोधकर्त्ताओं के एक स्वतंत्र समूह, ‘‘डीसेंट्रलाइज्ड रेडिकल ऑटोनॉमस सर्च टीम इनवेस्टिगेटिंग कोविड-19’’ (डै्रस्टिक) के विषेषज्ञों के अनुसार तो कोरोना वायरस चीन के मछली बाजार से नहीं वरन, वुहान की लैब से निकला है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी इस मामले की जांच के आदेष दे दिए हैं। चीनी शोधपत्रों व दस्तावेजों का अनुवाद कर अपने स्तर पर किए डै्रस्टिक के संघन अन्वेषणों के अनुसार इसका उद्गम साल 2012 से ही हो गया था। तब छह खदान श्रमिकों को यन्नान के मोजियांग में उस माइनषाफ्ट को साफ करने भेजा गया था जहां चमगादड़ों का आतंक था। उन श्रमिकों की वहां मौत हो गई। साल 2013 में वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. शी झेंगली और उनकी टीम माइनषाफ्ट से सैंपल अपने लैब में लाई।  

शी का कहना है कि श्रमिकों की मौत गुफा में मौजूद फंगस से हो गई। इसके विपरीत ड्रैस्टिक के अनुसार शी को एक अज्ञात कोरोना स्ट्रेन मिला जिसे उन लोगों ने आरएसबीटीकोव/4491 का नाम दिया। रिपोर्ट के अनुसार वुहान वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट के साल 2015-17 के पेपर में इसका विस्तार से विवेचन है। विवादित प्रयोगों से इस वायरस को बहुत अधिक संक्रामक बना दिया। यह थ्यौरी बताती है कि एक लैब की गलती कोविड-19 के विस्फोट का कारण बनी। इस बात को भारतीय वैज्ञानिक दंपत्ति डा. राहुल व डा. मोनाली ने खुलासा किया। 

चीनी वायरोलॉजिस्ट ने कहा-फाउची के इमेल से लीक की बात सच साबित हुई

एक चीनी वायरोलॉजिस्ट ने कहा है कि अमेरिका के शीर्ष कोरोना वायरस सलाहकार एंथनी फाउची के ई-मेल साबित करते हैं कि कोरोना की उत्पत्ति वुहान के लैब से ही हुई थी।  डॉक्टर ली-मेंग यान जो उन लोगों में से थीं, जिन्होंने सबसे पहले कोरोना के वुहान की लैब से लीक हुए होने की बात कही थी। डॉक्टर ली-मेंग यान कोरोना पर शोध करने वाले पहले लोगों में से एक थीं और उन्होंने खुलासा किया था कि बीजिंग पर इस मामले को छुपाने का आरोप लगाने के बाद उन्हें छिपने के लिए मजबूर किया गया।

सुनियोजित जैविक हथियार?

इन दस्तावेजों में एक ऐसा वैज्ञानिक रिसर्च पेपर भी मिलने का दावा किया गया है, जिसे वर्ष 2015 में चीन के 18 सैन्य वैज्ञानिकों और हथियारों के विषेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया था। इसका शीर्षक है, ‘अननेचुरल ओरिजिन ऑफ़ सार्स ऐंड न्यू स्पीषीज ऑफ़ मैन मेड वायरसेज ऐस जेनेटिक बायोवेपंस’ या दूसरे शब्दों में कहें तो इस शीर्षक का मतलब है कि ये पेपर सार्स और कोरोना वायरस की अप्राकृतिक तरीक़े से उपजी नई प्रजातियां और उनकी मदद से जैविक हथियार बनाने की संभावनाओं पर तैयार किया गया था। इन वैज्ञानिकों ने लिखा था कि कोरोना वायरस नाम के वायरस परिवार में, ‘कृत्रिम रूप से बदलाव करके इंसानों की बीमारी वाले वायरस तैयार किए जा सकते हैं और फिर इन्हें हथियार बनाकर इनका इस तरह से इस्तेमाल हो सकता है, जैसा कभी पहले देखा नहीं गया।’ 

विचारणीय बात यह है कि कोविड-19 महामारी के लिए ज़िम्मेदार वायरस भी एक कोरोना वायरस ही है, जो सबसे पहले चीन के वुहान शहर में सामने आया था और इसका नाम ै।त्ै.ब्वट.2 रखा गया था। इस दस्तावेज़ में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया था कि, लैब में तैयार कोरोना वायरस की नई प्रजातियां, ‘जैनिटक हथियारों के नए युग’ की शुरुआत करेंगे। ये लेख लिखने वालों ने ऐसे जैविक हथियारों की कल्पना की थी, जिससे ‘दुष्मन की स्वास्थ्य व्यवस्था को ध्वस्त किया जा सकता है।’

इस दस्तावेज़ और अन्य ख़ुफिया जानकारियों के आधार पर ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपनी ख़ुफिया एजेंसियों को निर्देष दिया है कि वो कोरोना वायरस की उत्पत्ति के बारे में जांच करके 90 दिनों में अपनी रिपोर्ट दें।

वर्ष 1993 में ही चीन ने स्वयं से यह घोषणा भी की थी कि, उसके आठ अनुसंधान केंद्रों में, ‘जैविक हथियार संबंधी राष्ट्रीय आत्मरक्षात्मक अनुसंधान एवं विकास के कार्यक्रम’ चल रहे हैं। इनमें वैक्सीन बनाने वाले केंद्र जैसे कि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ बायोलॉजिकल प्रोडक्ट भी शामिल है। चीन की सिनोफार्म कंपनी अपनी कोरोना वैक्सीन बनाने के लिए इसी केंद्र की सुविधाओं का प्रयोग करती है। उसके बाद से वर्ष 2015 के एक अध्ययन में पाया गया है कि चीन की सरकार के रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े 12 केंद्र और पीपुल्स लिबरेषन आर्मी से जुड़े 30 सुविधाएं ऐसीं हैं जो जैविक हथियारों पर रिसर्च, उनके विकास, उत्पादन, परीक्षण या भंडारण के काम से जुड़ी हुई हैं। इनमें वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी शामिल नहीं था। हालांकि, अमेरिका ने हाल ही में ये पता लगाया है कि, ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी ने चीन की सेना के साथ मिलकर गोपनीय प्रोजेक्ट पर काम किया है, और उनकी रिपोर्ट का प्रकाषन भी किया है।’ यही नहीं, चीन का ये संस्थान, ‘उसकी सेना की ओर से 2017 से ही ऐसे गोपनीय रिसर्च में भी शामिल रहा है, जिसमें जानवरों पर प्रयोग किए गए हैं।’

कोरोना वायरस मानव निर्मितः

एचआईवी वैक्सीन पर काम कर चुके ब्रिटिष प्रोफेसर एंगस डल्गलिष और नार्वे के वैज्ञानिक डॉ बिर्गर सोरेनसेन ने साथ मिलकर कोरोना वायरस के टीकों पर अध्ययन के लिए जब कोरोना के सैंपल्स का अध्ययन कर रहे थे, तब उन्हें वायरस में एक यूनिक फिंगरप्रिंट मिला, जो किसी भी वायरस में बिना लैब छेड़छाड़ के नहीं मिलता। नार्वे के वैज्ञानिक डॉ बिर्गर सोरेनसेन के मतानुसार, कोरोना वायरस के स्पाइक में 4 अमीनो एसिड हैं, जो पॉजिटिव चार्ज रखते हैं। इससे वायरस के स्पाइक मानव कोषिकाओं के नेगेटिव चार्ज वाली हिस्सों को मजबूती से जकड़कर संक्रमण फैलाते हैं। प्राकृतिक रूप से तीन अमीनो एसिड एक स्पाइक पर मिलना बहुत दुर्लभ है। मौजूदा वायरस में यह चार हैं, जो उनके अनुसार कृत्रिम रूप से बनाए जाने पर ही संभव है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कोरोना एक प्राकृतिक नहीं वरन कृत्रिम वायरस है।

कोविड-19 टीके का 2020 का पेटेण्ट आवेदन-एक बड़ा प्रमाणः

दी वीकेण्ड आस्ट्रेलियन पत्रिका के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेषन आर्मी के एक वैज्ञानिक झाऊ यूसेन ने 24 फरवरी, 2020 को ही अमेरिकी विषेषज्ञों के साथ मिलकर कोविड-19 के टीके के पेटेण्ट के लिए आवेदन कर दिया था। यूसेन की मई 2020 में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी। ऐसे में लगता है कि चीन ने अपनी जनसंख्या को इस जैविक हथियार से सुरक्षित रखने का टीका आरंभ में ही विकसित कर लिया।  

चीन से क्षतिपूर्त्ति की मांग आवष्यकः

इन परिस्थतियों को देखते हुए जहाँ कोरोना के कारण विष्व अर्थव्यवस्था को 100 खरब (10 ट्रिलियन) डालर की प्रत्यक्ष आर्थिक क्षति हुयी है। उसकी सीमा में उपजे इस वायरस व इसकी सूचनाएँ छिपाने के कारण इस क्षति की पूर्ति चीन से कराई जानी चाहिए अन्यथा चीन पर सभी देषों को मिल कर सामूहिक रूप से आर्थिक प्रतिबंध लगाये जाने का निर्णय लेना चाहिये। अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमों की अवहेलना जनित संकट के लिए चीन स्पष्ट रूप से दोषी है। यह उसकी घोर विकृति विष्व-द्रोह कही जाने योग्य है।     

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