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परंपरागत प्रकृति प्रेम से ही बचेगी पृथ्वी

दुनिया में जब भी ग्लोबल वार्मिंग की बात होती है तो जीवाश्म ईंधन की भी बात शुरू होती है। यह तय बात है कि हम प्रकृति से जितना ही दूर होते जाएंगे हमारे जीवन में जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता भी उसी के अनुरूप बढ़ती जाएगी। — अनिल तिवारी

 

ग्लासगों में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप 26 से जाते हुए यूएनओ के प्रमुख अंतानियो गूतारेस ने टवीट किया कि ‘रोम से अधूरी उम्मीदों के साथ जा रहे हैं लेकिन आशाएं पूरी तरीके से दफन नहीं हुई है’। मतलब साफ है कि कहीं न कहीं सभी राष्ट्रों के बीच साझा समाधान निकालना मुश्किल हो रहा है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो कोई जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर कोई सटीक राह अभी नहीं दिख रही है। ऐसे में प्रकृति प्रेमी, पर्यावरणविदों व दुनिया के जागरूक लोगों को गांधी बरबस याद आ रहे हैं। महात्मा गांधी ने कहा था कि प्रकृति आवश्यकता तो हर मनुष्य की पूरी कर सकती है लेकिन लोभ एक व्यक्ति का भी पूरा नहीं कर सकती। व्यक्ति के लालच के सामने कुदरत भी बेबस है। बापू कोई पर्यावरणविद नहीं थे, लेकिन वे आजीवन पर्यावरण संरक्षण के हितैषी जीवन पद्धति के पैरोकार भी रहे और व्यवहारकर्त्ता भी।

ग्लासगो में संपन्न संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने 2070 तक कार्बन उत्सर्जन यानी नेटजीरो के लक्ष्य को हासिल कर लेने का वादा किया है। लेकिन हालात ऐसे हैं कि हमारे पास न तो प्रदूषण का सटीक आकलन है और न ही इतने संसाधन और उपकरण कि प्रभावी तरीके से हम प्रदूषण को नियंत्रित कर सके। इस बार दिल्ली के लोग यमुना नदी की जहरीली झाग में खड़े होकर छठ का व्रत करने को मजबूर हुए हैं। देश की राजधानी दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में प्रदूषण का स्तर इतना ऊंचा है कि अधिकांश लोगों को सांस लेने में तकलीफ हो रही है तथा सीने में जलन की शिकायत लेकर लोग अस्पताल पहुंच रहे हैं।

साल दर साल सर्दियों का आगमन देश के शहरों खासकर राजधानी दिल्ली सहित पूरे एनसीआर को धुआं और धुंध के जहरीले काकटेल में बदल देता है। पराली का धुआं, धूल भरी धुंध की मोटी चादर और त्योहारों के दौरान होने वाली आतिशबाजी, इस इलाके को जहर का चेंबर बना देती है, जहां सांस लेना भी दूभर हो जाता है। एक रिसर्च के मुताबिक उत्तर भारत की 48 करोड़ आबादी जिस हवा में सांस ले रही है वह दुनिया के किसी भी हिस्से से 10 गुना ज्यादा जहरीली है। दुनिया के 10 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में भारत के 5 शहर शामिल हैं। ऐसे में बापू के विचार एक बार फिर रुककर सोचने और प्रकृति की ओर लौटने के लिए प्रेरित करते हैं। बापू का मानना था कि तकनीक का विकास भले ही मानव की सृजनशीलता के अनुरूप हो, लेकिन उसे प्रकृति संगत भी होना ही चाहिए।

प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली मुख्यतः 4 ग्रीन हाउस गैस हैं- कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस एक्साइड, मीथेन और जल तथा वाष्प। नाइट्रस ऑक्साइड का ग्लोबल वार्मिंग पोटेशियल कार्बन डाइऑक्साइड के ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल से लगभग 300 गुना अधिक है, वही मिथेन का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल कार्बन डाइऑक्साइड से ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल से लगभग 50 गुना अधिक है। कृत्रिम उर्वरक नाइट्रस ऑक्साइड का एकमात्र स्रोत है। औद्योगिक खेती और औद्योगिक पशुपालन के कारण कृत्रिम उर्वरकों की मांग बढ़ी है, इन्हीं के चलते ग्लोबल वार्मिंग भी बढ़ रही है।

70-80 के दशक तक हमारे पूर्वज गेहूं का सेवन न के बराबर या बहुत ही कम मात्रा में करते थे यहां तक कि गेहूं के प्रति पारंपरिक समझ भी गेहूंअन सांप के समतुल्य थी। लोग मानते थे कि जिस प्रकार गेहूअन कोबरा सांप मनुष्य के लिए खतरनाक है, उसी तरह गेहूं भी एक खतरनाक अनाज है। लेकिन आज की तारीख में मल्टीनेशनल कंपनियों के दबाव और गेहूं के अधिकाधिक उत्पादन को ध्यान में रखते हुए दुनिया के प्रचार-प्रसार तंत्र ने गेहूं को हेल्दी होल ह्वीट  घोषित कर दिया है, और प्रचार तंत्र का जादू हम पर इस कदर चढ़ा हुआ है कि हम गेहूं को लेकर कोई सवाल करने की बजाय सुबह से लेकर और रात तक खाने के हर प्रकार में अधिकाधिक गेहूं का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन हम यह नहीं समझ पा रहे हैं इसका प्रभाव हमारे स्वास्थ्य प्रसन्नता और यूनिटी पर ही केवल नहीं होता बल्कि हमारे जो अनेक स्थानीय पारंपरिक एवं प्राकृतिक मोटे अनाज जैसे सांवा, कोदो शम्मी, कांगनी, मडुवा, ज्वार, बाजरा, जौ आदि है उनका भी विलोप हो रहा है। 

शुद्ध और सात्विक भोजन के बारे में अपनी समझ को विकसित करने की बजाए विज्ञापनों की आभा में आकर हमने अपने खान-पान में ही बदलाव कर लिया यहां तक कि हमने अपने कृषकों को भी इस बात के लिए विवश कर दिया कि वह भी औद्योगिक खेती को अपनाएं और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या को अपने लिए ही खुद खड़ा कर ले। गेहूं जैसे अनाज जो हमारे पारंपरिक भोजन का हिस्सा कभी नहीं थे। मोटे अनाज की तुलना में अत्यधिक पानी लेते हैं। इस कारण से भूजल लगातार कम होता हुआ दिखाई दे रहा है और पानी की समस्या केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के समक्ष एक चुनौती के रूप में खड़ी है।

आज की तारीख में दुनिया में मिथेन गैस का एक बड़ा स्रोत औद्योगिक पशुपालन हो गया है। धरती पर 6400 प्रकार के स्तनपाई जीव पाए जाते हैं। इस कोटि में मनुष्य भी एक स्तनपाई जीव है। स्तनपाई जीव वे होते हैं जो अपने बच्चों को स्तनपान करवाते हैं। दुर्भाग्यवश हम प्रकृति से दूर हो गए और अपने ही बनाए तथाकथित विकास के मापदंडों में इतना उलझते गए कि हमने ऐसे समाज की संरचना कर डाली जहां माताओं के लिए आज स्तनपान कराना बहुत ही कठिन काम हो गया है प्रसव से पूर्व ही एलोपैथ विधा के डॉक्टर माता-पिता दोनों को ऐसे मायावी शब्द जाल में लपेट लेते हैं कि माताएं खुद के जने बच्चे को दूध पिलाने से दूर हो जाती है। किसी बच्चे का स्तनपान करना केवल उसके जीवन जीने का आधार ही नहीं बल्कि अधिकार भी है। इससे भी दुखद पहलू यह है कि भौतिकवादी सोच की पराकाष्ठा के कारण हम खुद अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करवा रहे हैं और दूसरे स्तनपाई जीवो की लगातार तलाश करते हैं, जिनका दूध अपने बच्चों को दे सके। 

हमारे पूर्वज प्रकृति से जुड़े थे और दूध को बहुत बारीकी से समझते थे। स्तनपान को समझते थे। एक शिशु के लिए स्तनपान कितना महत्वपूर्ण है वह भली भांति जानते थे। इसीलिए देसी गाय को वह हर तरह के विधि विधान से जोड़ करके रखे थे। गाय की महत्ता को समझते थे। देसी गाय के दूध को वह दूध नहीं, बल्कि अमृत मानते थे। दूध का सेवन भी अमृत की तरह ही पंचामृत, छाछ, घी आदि के रूप में अक्सर किया करते थे। देसी गायों को हाइब्रिड कर उसका शोषण नहीं करते थे। उन्होंने गायों को उद्योग का भाग कभी नहीं बनाया। हमारे पूर्वजों ने गाय के दूध से प्रत्येक दिन केक, आइसक्रीम, मिठाई, चाय, काफी आदि कभी नहीं बनाई। उन्हें मालूम था कि दूध हार्मोन से बनता है, न कि कारखाने में। इसलिए स्तनपान करवाने वाले जीव को केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ रखा जाता था ताकि उनका दूध स्वास्थ्यवर्धक हो और पीने वाले नवजात बच्चे में बल और बुद्धि का विकास कर सके। लेकिन हमने क्या किया पशुपालन को ही उद्योग बना डाला।

आज हम प्रकृति से इतने दूर हो गए हैं और प्रचार-प्रसार तंत्र के बहकावे में इस तरह उलझ गए हैं कि जो चीजें टीवी पर बताई जाती है उसे ब्रह्म ज्ञान मानते हुए हूबहू अपने जीवन में अपना लेते हैं। प्रकृति द्वारा बने दूध की समझ नहीं है।  यही  कारण है कि हम सुबह से शाम तक दूध और उस से बनी चीजों का सेवन करते रहते हैं, पर डॉक्टर के पास जाने के बाद पता चलता है कि शरीर में कैल्शियम की भी कमी है प्रोटीन की भी कमी है। हमने अपने रोज-रोज के जीवन में अन्य स्तनपाई पशुओं के दूध की मांग इस कदर बढ़ा ली है कि केवल अपना ही नहीं बल्कि सबके स्वास्थ्य को लगातार खोते जा रहे हैं और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या को खुलेआम निमंत्रण देने पर आमादा है।

दुनिया में जब भी ग्लोबल वार्मिंग की बात होती है तो जीवाश्म ईंधन की भी बात शुरू होती है। यह तय बात है कि हम प्रकृति से जितना ही दूर होते जाएंगे हमारे जीवन में जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता भी उसी के अनुरूप बढ़ती जाएगी। प्रकृत से इस दूरी के मूल में हमारा भोजन प्रमुख है। हमारा भोजन जितना स्थानीय पारंपरिक और प्राकृतिक होगा, हम न केवल शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ रहेंगे बल्कि उतना ही हम आर्थिक पारिवारिक और वैश्विक रूप से भी स्वस्थ होंगे। जंगल के जानवर को भी अपना भोजन स्वतः ही पता होता है। कोई भी जानवर कभी भी किसी खराब गुणवत्ता वाले भोजन को स्वीकार नहीं करता है, लेकिन हम विवेकवान मनुष्य होकर भी पश्चिमी दुनिया की चकाचौंध में अपनी भोजन प्रथा को ही भूल बैठे हैं।              

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