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भारतीय वाङ्मय में पर्यावरण शिक्षा

पेड़ लगाओ-पर्यावरण बचाओ, शिक्षा पाओ-पेड़ लगाओ, शादी रचाओ- पेड़ लगाओ, जन्मदिन मनाओ-पेड़ लगाओ, जैसे कार्यक्रम चलाकर पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्द्धन किया जा सकता है। —प्रो. विजय वशिष्ठ

 

आज ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से पूरा विश्व जूझ रहा है। हमारे शहर पर्यावरण प्रदूषण की भयंकर समस्या से ग्रस्त हैं। विश्व के 31 प्रदूषित शहरों में भारत के 20 शहर हैं। हमें शुद्ध हवा, पानी, अनाज, सब्जी-फल आदि उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। पर्यावरण प्रदूषण की भयावहता यू.एन. की एक रिपोर्ट से साफ होती है जिसमें कहा गया है कि दुनिया भर के 10 लोगों में से 9 लोग जहरीली हवा लेने को मजबूर हैं। प्रतिवर्ष 70 लाख मौतें वायु प्रदूषण की वजह से होती हैं, जिसमें सर्वाधिक संख्या भारत से है। 

भारतीय वाङ्मय में पर्यावरण शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। हमारे ऋषियों ने कहाः- सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत।। सब सुखी हो, सब निरोगी हों, कोई दुःखी न हो, यह उद्देश्य केवल पर्यावरण शुद्धता से ही संभव हो सकता है। 

वैदिक शांति मंत्र कहता हैः- ऊँ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः, पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वं शान्तिः, शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्तिरेधि।। ऊं शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

इस शांति पाठ में पृथ्वी, अन्तरिक्ष, औषधी, हवा, जल, अग्नि, आकाश सभी को शांत रखने की ईश्वर से प्रार्थना की गयी है। जिन पांच तत्वों - मिट्टी, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश से मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि आदि का निर्माण हुआ है, उन सबको शांत रखने की अपेक्षा की गई है। हमारा गायत्री मंत्र भी ऊं भू र्भुवः से शुरू होता है - जो विश्व के कल्याण की कामना करता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारतीय वाङ्मय में पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्द्धन को बहुत महत्व दिया गया है।   

आधुनिक युग में पर्यावरण प्रदूषण एक भयावह समस्या है। देश में वनों का विनाश हो रहा है, वन्य प्राणी प्रायः लुप्त होते जा रहे हैं फलस्वरूप पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ रहा है हम विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों के शिकार होते जा रहे हैं मानवता का विनाश हो रहा है, प्राकृतिक असन्तुलन का कारण हमारी बिगड़ती हुई मानसिकता है यदि यही स्थिति रही तो शीघ्र ही यह पृथ्वी वन एवं वन्य जीवों से विहीन हो जाएगी तथा मानव विनाश भी सम्भावी हो जाएगा।

वैदिक संहिताओं में ऋग्वेद प्राचीनतम् है, जिसमें मुख्य रूप से प्रकृति को ही देवी मान कर स्तुति की गई है, वैदिक ऋषियों ने प्रकृति को माता माना है, इसीलिए कहा ‘माता भूमि अहं पुत्रोपृथ्वीया’। भूमि ही प्रकृति का प्रथम तत्व है, पृथ्वी ही सम्पूर्ण भोगों की उत्पादकता है-इसीलिए इसे ‘श्री’ कहा गया है, वेदों में वृक्षों के महत्व का सर्वाधिक प्रतिपादन किया गया है, इसीलिए वृक्षो में देवता का निवास माना गया है तथा इनको न काटने पर बल दिया गया है। भारतीय संस्कृति में वट, पीपल, ऑंवला, तुलसी आदि का पूजन करने का भी यही अभिप्राय है कि ये मानव जीवन की सुरक्षा करते हैं। हिन्दू धर्म में प्रत्येक घर में तुलसी का पौधा लगाने की सलाह दी गई है, जिसका वैज्ञानिक कारण है तुलसी का पौधा ही संसार का एकमात्र पौधा जो दिन तथा रात दोनों समय ऑक्सीजन छोड़ता है तथा उसकी पत्तियॉं प्रकाश संश्लेषण द्वारा सर्वाधिक मात्रा में सौर ऊर्जा शोषित करती हैं, फलतः ऋषियों ने जनमानस में इस धारणा को बल दिया कि तुलसी में लक्ष्मी व विष्णु दोनों का निवास है। 

वामन पुराण में तो प्रातः काल उठते ही पांचां तत्वों का स्मरण करने की परम्परा पर जोर दिया गया है, पृथ्वी अपनी सुगन्ध, जल अपने बहाव, अग्नि अपने तेज, अन्तरिक्ष (आकाश) अपने शब्द, ध्वनि और वायु अपने स्पर्श गुण के साथ हमारे प्रातः काल को अपना आशीर्वाद दे, यही हमारी कामना है।

गीता में भगवान ने प्रकृति को अष्टकोणी बताया है पॉंच तत्वों के अलावा मन, बुद्धि एवं अहंकार की भी गणना की गई है, ये पांचां तत्व मिलकर मन और बुद्धि को निर्मल रखें तथा अहंकार को संयमित रखें, स्कन्ध पुराणा के अनुसार जिस घर में प्रति दिन तुलसी की पूजा होती है उसमें यमदूत प्रवेश नहीं कर सकते (स्कन्ध पुराण 21.66)

वाराह पुराण (172.39) में तो पेड़ पौधो और वनस्पतियों के रोपण-पोषण और संवर्द्धन को पुण्य कार्य माना गया है, मन्त्र में व्यवस्था है कि जो व्यक्ति अपने जीवनकाल में एक पीपल, एक नीम और एक बड़ (बरगद का वृक्ष) का पेड़ लगाएं, 10 फूलों वाले वृक्षों और लताओं का रोपण करें, अनार, नारंगी और आम के दो-दो वृक्ष लगाए, वह कभी नरक में नहीं जाता प्रकृति को धर्म से जोड़कर यह व्यवस्था की गई है कि व्यक्ति प्रकृति का विनाश न करे।

भारतीय जीवन दर्शन में प्रकृति और संस्कृति को अलग-अलग करके देखना असम्भव-सा है। जहॉं तुलसी, वट एवं पीपल की पूजा, गाय का सम्मान, गंगा की स्तुति, सूर्य, चन्द्र, मरूत, जल और पृथ्वी में देवत्व की कल्पना की गई हो, वहॉं प्रकृति के अपमान की बात सोची भी नहीं जा सकती।

भारतीय, संस्कृति में अनेक पर्व एवं त्यौहार पर हम वन्य जीवों की पूजा अर्चना करते है, मोर सरस्वती के साथ, सिंह महाकाली के साथ, बैल शिव के साथ, हाथी इन्द्र के साथ, चूहा गणेश के साथ सदैव पूजनीय रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र में भी बारह राशियों में से कई पशुओं के नाम पर है। भारतीय संस्कृति में वन्य प्राणियों का प्रमुख स्थान देकर प्रतिष्ठित ही नहीं किया, बल्कि समय-समय पर लोगों ने अपने प्राणो की आहुति देकर वनों एवं वन्य प्राणियों की रक्षा भी की है। राजस्थान में ऐसे भी उदाहरण हैं जहॉं शासनादेश के बावजूद भी जनता ने एक भी पेड़ नहीं कटने दिया। जोधपुर जिले के गांव खेजड़ली में 363 बलिदानियों ने स्वयं के प्राणों की आहुति देकर पेड़ो की रक्षा की ऐसा उदाहरण विश्व में अन्यत्र कहीं भी नहीं हैं।

भारतीय संस्कृति में प्रकृति के दोहन की छूट तो दी है, लेकिन उसके शोषण की नहीं वनों के विनाश को तो दण्डनीय अपराध माना है, स्कन्द पुराण के अनुसार ‘‘सभी प्रकार के पेड़ों को काटना निन्दनीय है, यज्ञ आदि कारण के अलावा ऐसा कभी नहीं किया जाना चाहिए। पदम पुराण में ‘‘उन व्यक्तियों को निश्चित रूप से नरक का अधिकारी माना है, जो जीव हिंसा करते हों या कुओं तालाबों और उद्यानों को प्रदूषित करते हों।

प्राणी मात्र की रक्षा एवं उसका कल्याण हमारी सांस्कृतिक विरासत है, हमारी संस्कृति का मूल मन्त्र है ‘‘अहिंसा परमोधर्म’’। मनुस्मुति के अनुसार पशुओं की हत्या करने वाला केवल हिंसक नहीं कहलाता-जो व्यक्ति पशु हत्या की आज्ञा देता है, जो पशु को काटता है, जो उसे मारता है, जो मांस बेचता है या खरीदता है, जो उसे परोसता है एवं जो उसे खाता है-वे सब हत्या के दोषी हैं। विष्णु पुराण में कहा गया है कि हे दुष्टात्मा! यदि तुमने किसी पक्षी को भून कर खाया, तो समझ लो, तुम्हारे सारे यज्ञ, पूजा पाठ, तीर्थ यात्राएं और पवित्र नदियों में स्नान आदि व्यर्थ है, जैन ग्रन्थों में यही भावना प्रतिपादित की गई कि किसी भी प्राणी को मत मारो, यह धर्म का नित्य शाश्वत नियम है। जैन मत में केवल शारीरिक हिंसा ही वर्जित नहीं है, प्रत्युत वह बौद्धिक अहिंसा को भी अनिवार्य बताता है। चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में वन्य प्राणियों की हत्या को रोकने के लिए दण्ड की व्यवस्था की। उन्होनें लिखा कि ‘‘अधिकारी को चाहिए कि वन उन सभी अपराधियों पर एक हजार पण (उस समय की मुद्रा का नाम) का दण्ड प्रतिरोपित करें जो राज्य द्वारा हत्या के लिए वर्जित हिरणों अथवा अन्य पशु-पक्षियों और मछलियों के शिकार के दोषी हों’’।

उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति ही हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य पूर्ण जीवन जीना सिखाती है, आज की पर्यावरण प्रदूषण की भयावह समस्या का एकमात्र समाधान है कि भारतीय जीवन आदर्शो को मानते हुए प्रकृति के साथ सामंजस्य पूर्ण जीवन जीना सीखे।

इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए यह आवश्यक है कि विद्यालयों से छात्रों को पर्यावरण शिक्षा तथा इसके संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए कार्य करने का संकल्प करावें। केवल सरकारी अभियान से यह कार्य नहीं हो सकता इसके लिए जन अभियान चलाना होगा। पेड़ लगाओ-पर्यावरण बचाओ, शिक्षा पाओ-पेड़ लगाओ, शादी रचाओ- पेड़ लगाओ, जन्मदिन मनाओ-पेड़ लगाओ, जैसे कार्यक्रम चलाकर पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्द्धन किया जा सकता है।   

लखेक सेवानिवृत्त, प्राचार्य - कॉलेज शिक्षा (राज.)

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