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पर्यावरण संरक्षणः अतीत से लेना होगा सबक

Admin August 18, 2021

मध्यकालीन शासकों ने मानव निर्मित जल निकायों और प्राकृतिक रूप से ठंडी और हवादार इमारतों का निर्माण किया, लेकिन अब प्रौद्योगिकी ने हमें आलसी अभिमानी और पर्यावरण की जरूरतों के प्रति बेपरवाह बना दिया है। हमारे पास देखने के लिए गौरवषाली अतीत है लेकिन हम प्रेरणा लेने के लिए पष्चिम की ओर दौड़ रहे हैं। — डॉ. जया कक्कर

 

बहुमूल्य पर्यावरण संसाधन आज वास्तव में एक खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है, लेकिन हमारे देष के नकली पर्यावरणविद अब भी आंखें बंद किए हुए हैं। वर्ष 2008 में बनी बॉन्ड सीरीज की फिल्म ‘क्वांटम आफ सोलेस’ के निहितार्थों को या तो भूल गए हैं या फिर जानबूझकर विस्मृत कर रहे हैं। ऐसे लोग यह भी भूल गए हैं कि लगातार बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। हर सांस के साथ लोग जहरीली हवा पीने के लिए मजबूर हो रहे हैं, जिससे उनका जीवनकाल कम तो हो ही रहा है। इनमें से अधिकांष अकाल काल के गाल में समाते जा रहे हैं। बदलते समय के साथ हर नई पीढ़ी पुरानी की तुलना में कुछ और नई और खतरनाक बीमारियों का दंष झेलने के लिए अभिषप्त है। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक आबादी में वायु प्रदूषण का जोखिम कारक 76 प्रतिशत से अधिक हो गया है। संभव है कि दुनिया पेरिस समझौते के तहत किए गए उत्सर्जन में कटौती के वादों का सम्मान करें, (हालांकि चाल चलन से ऐसा दिखता नहीं है) फिर भी दुनिया 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म होगी।

कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन तथा उससे होने वाले नुकसान के भय को अदृष्य दुष्मन के तौर पर लेते हुए एक अनियमित बाजार की अनियमितताओं के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है, क्योंकि यह अत्यधिक हानिकारक गैसों का उत्पादन करेगा। ग्लोबल वार्मिंग एक विषेष रूप से डरावनी है इसलिए हमें इसके खिलाफ दंडात्मक प्रावधान करने की जरूरत है। लेकिन दंड के प्रावधान किए जाने से भी महत्वपूर्ण यह है कि हमें टिकाऊ जीवन पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के लिए लोगों को तैयार करना चाहिए। इसके लिए नागरिक व्यवसायिक उपभोक्ता प्रबंधक के साथ-साथ सत्तारूढ़ व्यवस्था सभी को इसमें अपना-अपना योगदान करने की जरूरत है। एक सुखद बात यह है कि एक प्रतिस्पर्धी और वैश्विक सेटिंग में व्यवसायों ने प्रतिस्पर्धात्मक लाभ की खोज में एक अभिन्न अंग के रूप में पर्यावरणीय देखभाल को शामिल करने की आवष्यकता महसूस करना शुरू कर दी है। प्रबुद्ध व्यवसायियों ने महसूस किया है कि व्यवसायिक लाभ के लक्ष्य को प्राप्त करने और पृथ्वी ग्रह की जरूरतों को पूरा करने के बीच कोई संघर्ष नहीं है। उन्हें यह समझ में आ रहा है कि उनके द्वारा विकसित की जा रही हरित प्रथाएं लाभकारी होगी।

उदाहरण के तौर पर आईटीसी को लीजिए। इस कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ व्यवसायों का एक मजबूत पोर्टफोलियो बनाया है। तुलनात्मक रूप से यह दुनिया में एकमात्र ऐसा उद्यम है जो पिछले एक दषक से भी अधिक समय से कार्बन नकारात्मक पानी सकारात्मक और ठोस अपषिष्ट रिसाइक्लिंग सकारात्मक है। खाद्य उत्पादों के उद्योग में पर्यावरण हितैषी लक्ष्य के प्रदर्षन पर आईटीसी को अपने साथियों के बीच विश्व स्तर पर नंबर एक और समग्र रूप से तीसरे स्थान पर रखा गया है। कंपनी प्रचलित प्रथाओं से अलग हटकर खुद की इमारतों को खुद डिजाइन करती है, जिसमें अतीत से प्रेरणा लेना भी शामिल है। सभी हितधारकों को यह महसूस करना चाहिए कि लंबे समय में स्थिरता तभी संभव है जब हम ग्रह की जरूरतों के प्रति संवेदनषील हो।

वास्तु कला के मुताबिक निर्माण की बात करें तो आज के भारतीय वास्तुकार के पास प्राचीन हिंदू मंदिर की शैली से लेकर नवीनतम प्रचलित कंक्रीट ग्लास और स्टेनलेस स्टील तक के कई विकल्प मौजूद हैं। बेषक भारत कुछ नया फार्मूला विकसित कर सकता है। जरूरी नहीं कि वह यूरोपीय मिसाल पर आधारित हो, बल्कि समय की बदली हुई आर्थिक परिस्थितियों और सामाजिक आदतों को पूरा करने के लिए हो। यद्यपि जल की कमी और जलवायु आपदा से जुड़ी सभी समस्याएं हमारे अतीत के तरीकों से पूरी तरह हल नहीं हो सकती, तद्यपि पुरानी प्रथाओं से प्रेरणा लेकर हम पर्यावरण के प्रति अपनी सामूहिक लापरवाही और गैर जवाबदेही की वर्तमान स्थिति को कम जरूर कर सकते हैं। उदाहरण के लिए वर्षा जल संचयन हमारे अतीत की एक पारंपरिक प्रथा रही है। जल भंडारण के लिए जलाषयों, तालाबों, झीलों, बावडियों आदि का निर्माण, रखरखाव, संरक्षण किया जाता रहा है। राजाओं द्वारा जल निकायों का न सिर्फ निर्माण किया गया, बल्कि ग्राम समुदाय और व्यक्तियों को इसे बनाने और आगे भी बनाए रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया था।

समकालीन समय में प्रौद्योगिकी पानी, बिजली, ए.सी., हीटर जैसी अनेक सुविधाओं को सुनिष्चित करने के लिए आसान तरीके प्रदान करती है। हालांकि आर्थिक रूप से यह सभी बहुत महंगे हैं लेकिन सर्व सुलभ हैं। इसीलिए प्राकृतिक रूप से पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं की ओर मुड़ने पर विचार करने और उसके लिए आगे आने की इच्छा विवेक का विषय बन गया है। लेकिन स्ववित्त पोषित तरीके से भवनों को अधिक पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है। आदर्ष रूप में पैसे के लालच में ग्रह के स्वास्थ्य से समझौता नहीं करना चाहिए। समर्पण की भावना से आगे बढ़ा जाए तो पृथ्वी ग्रह और लाभ के बीच का यह संघर्ष सदा-सदा के लिए खत्म हो सकता है।

ज्ञात हो कि प्राचीन और मध्ययुगीन काल के वास्तुकारों को आज से अधिक कल्पनाषील और विचार केंद्रित होना पड़ता था, क्योंकि उन्हें स्थानीय सीमाओं, जरूरतों को पूरा करते हुए शाही संरक्षकों की आकांक्षाओं को भी पूरा करना होता था। उदाहरण के लिए गोलकुंडा किला और कुतुब शाही कब्रिस्तान को लिया जा सकता है। कुतुब शाही कब्रिस्तान का निर्माण गुरुत्वाकर्षण की एक स्वदेषी प्रणाली का उपयोग करके किया गया था ताकि भूमिगत पाइप और प्रकृति द्वारा आपूर्त पानी के साथ टकराव न हो। कुतुब शाही ने पानी की आपूर्ति सुनिष्चित रखने के लिए 5 स्तरीय प्रणाली तैयार की थी। दुर्गम चरेरू में बांध से पानी, पाइप और एक्वाइट के माध्यम से आता था।

कुतुब शाही परिसर के मकबरे को इस तरह बनाया गया था कि बारिष का पानी गड्ढों में बह जाए और वहां से बावरियों तक अपने आप पहुंच जाए। साथ-साथ बावडियों में बैलों का उपयोग करके पानी निकालने की व्यवस्था थी ताकि एक बूंद पानी भी बर्बाद न हो और परिसर हमेषा साफ-सुथरा और हरा-भरा भी बना रहे। किले के कक्ष भी इतने संरेखित थे कि हवाओं ने स्वभाविक रूप से अंदरूनी हिस्से को ठंडा कर दिया था। पत्थर के फर्ष पर भाप के लिए पानी उबालने की व्यवस्था थी, तो बगल में ठंडे पानी में डुबकी लगाने का भी इंतजाम था।

होटल आई.टी.सी. कोहिनूर हैदराबाद ने वास्तुकला के ऐसे ही मॉडल से प्रेरणा ली है। आईटीसी ने पर्यावरण के साथ सहयोग करने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया है न कि इसे जीतने का प्रयास किया है। होटल को जेड आकार दिया गया है। जिसकी इमारत 93 डिग्री कोण पर आगे की ओर झुकी हुई दिखाई देती है। वास्तुकार ने पाया कि इससे पूरे वर्ष प्रकाष और शीतलन सबसे अच्छा होगा लेकिन चूंकि एक सीधी इमारत को छोटे से संकीर्ण भूखंड पर समायोजित करना था, इसलिए किनारों को एक कोण पर रखा गया था। बालकनी और खिड़कियों को ऐसे डिजाइन किया गया था ताकि धूप भी मिलती रहे और पतले आकार की इमारत को पूर्व-पष्चिम अक्ष पर गर्मी को कम करने में मदद मिले जिससे कि मेहमान बगैर ए.सी. के भी रह सके और साथ ही साथ सूर्योदय तथा सूर्यास्त का भी आनंद ले सके। वहां पर किए गए लकड़ी के काम यह सुनिष्चित करते हैं कि धूप गर्मी का कारण नहीं बनेगी। हवा के सतत प्रवाह के लिए इमारत के किनारों को गोल किया गया है, जहां चट्टानी शिला खंडों से दक्खन की हवा आती है। मालूम हो कि लंबे समय तक कई हमलों का सामना कर चुके दक्खन के शिलाखंड इतिहास में भी बहुत महत्वपूर्ण है, उसकी स्मृति को भी अपनाने के लिए होटल ने अच्छा काम किया है।

जैसे कुतुब शाही राजघराने हरे-हरे चारबागों में आराम करते थे, उसी तरह होटल को हरा-भरा करने के लिए विभिन्न स्तरों पर स्काईगार्डनों को भी जोड़ा गया है ताकि प्राकृतिक वेंटिलेषन रहे और आग से बचाव हो सके। मध्यकालीन वास्तुकला और लैंडस्केप प्लेजर से प्रेरित प्रवेष द्वार के साथ लंबवत उद्यान इमारत को ठंडा करने में मदद करते हैं। वास्तव में बीते युग की स्थापत्य प्रतिभा की प्रचुर संपति हमें आधुनिक समय में सौंदर्यषास्त्र और सर्वोत्तम पर्यावरणीय प्रभाव से सबक लेने के लिए प्रेरित करती है। मध्यकालीन शासकों ने मानव निर्मित जल निकायों और प्राकृतिक रूप से ठंडी और हवादार इमारतों का निर्माण किया, लेकिन अब प्रौद्योगिकी ने हमें आलसी अभिमानी और पर्यावरण की जरूरतों के प्रति बेपरवाह बना दिया है। हमारे पास देखने के लिए गौरवषाली अतीत है लेकिन हम प्रेरणा लेने के लिए पष्चिम की ओर दौड़ रहे हैं।

वर्तमान में हमने दिल्ली में सेंट्रल विस्टा के निर्माण का विषाल कार्य शुरू किया है लेकिन इसके स्थापत्य और इसके नींव आदि के बारे में बहुत ही कम जानकारी किसी के पास है। अच्छा होता कि इतनी बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण में अपनी प्राचीन विरासत से कुछ सीखते हुए पर्यावरण के अनुकूल इसको बनाया जाता ताकि अन्य कामों में भी लोग इससे प्रेरणा ग्रहण करते।         

 

डॉ. जया कक्कड़ श्याम लाल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास, संस्कृति और पर्यावरण की अध्यापिका हैं।

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