यह कृति मेवाड़ की ऐतिहासिक परंपराओं, नागदा विप्रकुल की भूमिका तथा गुहिल राज्य की सभ्यतागत और सांस्कृतिक आधारभूमि के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान है। - प्रो. नंदिनी सिन्हा कपूर
प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा ने अपनी पुस्तक “पुण्यभूमि नागदा, नागदा विप्रकुल और परमेष्ठी राज्य मेवाड़ (त्रिगुण संदर्भ), प्रथम भाग” (प्रकाशितः 2025, उदयपुर) में मेवाड़ राज्य की दिव्य उत्पत्ति तथा नागदा विप्रकुल की उस महत्वपूर्ण भूमिका का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिसके माध्यम से मेवाड़ के राजवंशीय गुहिल वंश का संरक्षण एवं संवर्धन हुआ। यह वंश विश्व के सर्वाधिक दीर्घकाल तक शासन करने वाले राजवंशों में से एक माना जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
यह ग्रंथ मेवाड़ के संस्कृत अभिलेखों, एकलिंग माहात्म्य (नागदा का स्थलपुराण), पुराणिक परंपराओं, राणछोड़ भट्टकृत अमरकाव्यम्, मुहणोत नैणसी री ख्यात, महामहोपाध्याय गौरीशंकर ओझा के महत्वपूर्ण प्रकाशनों, कविराज श्यामलदास कृत वीर विनोद, नागदा के बड़वाओं द्वारा संरक्षित राजवंशीय वंशावलियों तथा अन्य ऐतिहासिक परंपराओं जैसे मौलिक स्रोतों पर आधारित है।
इस महत्वपूर्ण शोधग्रंथ के दो प्रमुख योगदान हैंः
1. हिंदू एकता और प्रतिरोध का इतिहासः प्रथम, यह ग्रंथ भारतीय इतिहास के प्रारम्भिक मध्यकालीन तथा मध्यकालीन युग में हिंदू एकता पर आधारित राष्ट्रीय पहचान के उद्भव को रेखांकित करता है। इस प्रकार यह कृति भारत में प्रतिरोध के इतिहास में एक महत्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत करती है। मध्य एशिया और पश्चिम एशिया से हुए आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष के इतिहास को समझना आवश्यक है, क्योंकि भारतीय इतिहास लेखन में राजनीतिक कारणों से इस पक्ष की अक्सर उपेक्षा की गई है। मध्यकालीन भारत के हिंदू राज्यों की आलोचना प्रायः उनकी कथित असंगठित स्थिति के लिए की जाती रही है, जबकि ऐतिहासिक स्रोत इसके विपरीत हिंदू नेतृत्व द्वारा एकता स्थापित करने और सामूहिक प्रतिरोध के लिए किए गए गंभीर प्रयासों का उल्लेख करते हैं।
लेखक ने मेवाड़ राज्य की दिव्य उत्पत्ति पर विशेष प्रकाश डाला है। परंपरा के अनुसार मेवाड़ राज्य की स्थापना का अधिकार संस्थापक बप्पा रावल को भगवान एकलिंगजी महादेव द्वारा प्रदान किया गया था। गुहिल वंश ने स्वयं को एकलिंगजी का दीवान मानकर शासन किया और असंख्य विदेशी आक्रमणों के बावजूद मेवाड़ ने अपनी अखंड हिंदू पहचान को बनाए रखा। पुस्तक में उल्लेख है कि बप्पा रावल के अनेक पूर्वजों ने अरब आक्रमणों के समय सर्वोच्च बलिदान दिए। यह भी वर्णित है कि आठवीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में अरब शक्तियों ने सीरिया, लेबनान, मकरान तथा सिंध तक विस्तृत क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था।
लेखक के अनुसार बप्पा रावल ने कश्मीर के ललितादित्य मुक्तापीड, कर्नाटक के चालुक्यों तथा अनेक अन्य हिंदू राज्यों का सैन्य एवं राजनीतिक सहयोग प्राप्त कर अरब शक्तियों को पूर्वी ईरान तक पीछे धकेल दिया। उन्हें उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा के लिए रावलपिंडी में एक दुर्ग के निर्माण का श्रेय भी दिया जाता है।
बप्पा रावल के उत्तराधिकारी महाराणाओं ने, एकलिंगजी के आशीर्वाद से, पश्चिम और मध्य एशिया से होने वाले आक्रमणों का प्रतिरोध करने हेतु अनेक हिंदू राज्यों को मेवाड़ के ध्वज तले संगठित किया। बप्पा रावल के पुत्र रावल खुम्माण के तथा बाद में महाराणा सांगा ने भी विभिन्न हिंदू शासकों को संगठित कर बाबर और उसकी सेना के विरुद्ध संघर्ष किया।
इन सभी राज्यों और उनके राजवंशों ने निःसंदेह भारतीय संप्रभुता तथा उसकी सांस्.तिक विरासत की रक्षा की।
2. नागदा विप्रकुल का योगदानः द्वितीय, यह शोधग्रंथ नागदा विप्रकुल के योगदान तथा मेवाड़ की राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नींव के निर्माण में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है।
शोधग्रंथ की संरचना
यह शोधग्रंथ चार मुख्य अध्यायों में विभाजित है-
ग्रंथ का समापन “विशिष्ट अनुपूरक” के साथ होता है।
पुस्तक के अध्याय में नागदा के ऋषिकुल की भूमिका, नागदा की पौराणिक पृष्ठभूमि तथा रामायण कालीन त्रेतायुगीन बैजनाथ महादेव से उसके संबंधों का विवेचन की गई है। अध्याय में मेवाड़ के राजपरिवार और नागदा विप्रकुल के मध्य विद्यमान अटूट संबंधों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।
इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जब बप्पा रावल की माता सती हुईं, तब उन्होंने बालक बप्पा को नागदा विप्रकुल की संरक्षण-व्यवस्था में छोड़ दिया। नागदा विप्रकुल ने ही उनका पालन-पोषण किया और आगे चलकर वही बालक मेवाड़ राज्य का संस्थापक शासक बना। लेखक ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख किया है जिसके अनुसार बाल्यावस्था में बप्पा रावल एक ग्वाले के रूप में कार्य करते थे और गुरु हरित की सेवा करते थे। नागदा विप्रकुल द्वारा उनका राजतिलक तथा गुरु हरित द्वारा चित्तौड़गढ़ तक राज्य विस्तार का आशीर्वाद प्राप्त होने का सजीव वर्णन इस अध्याय में मिलता है।
अध्याय में बप्पा रावल के ब्राह्मणीय सांस्.तिक परिवेश में पालन-पोषण का भी विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। ये विवरण नागदा विप्रकुल की वंशावलियों में संरक्षित हैं, जिन्हें बड़वाओं द्वारा लिपिबद्ध किया गया था। लेखक इन वंशावली-पांडुलिपियों को समकालीन अथवा “रीयल टाइम” इतिहास का स्वरूप प्रदान करते हैं।
एकलिंग माहात्म्य में नागदा को एक सर्वोच्च तीर्थ के रूप में स्थापित करने में देवी पार्वती की भूमिका तथा एकलिंगजी महादेव की स्थापना से संबंधित विवरणों का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है।
यह भी बताया गया है कि प्राचीन राजा जनमेजय ने ऋषिकुल और मेवाड़ क्षेत्र को 350 गाँव दानस्वरूप प्रदान किए थे।
नागदा विप्रकुल के पूर्वजों को भगवान राम द्वारा बुजड़ा, सिसारमा, पिछोली और आहाड़ नामक चार गाँवों के साथ 52000 बीघा अतिरिक्त भूमि प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी ऋषिकुल ने उदयपुर जिले की गिरवा तहसील स्थित सिसारमा ग्राम में प्रसिद्ध शैव तीर्थ बैजनाथ मंदिर की स्थापना की।
अध्याय यह स्पष्ट करता है कि गुहिल वंश के उदय से पूर्व भी नागदा विप्रकुल मेवाड़ में अत्यंत प्रभावशाली स्थान रखता था तथा इन ऋषियों की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।
यह भी उल्लेखित है कि एकलिंग माहात्म्य की उत्पत्ति पुराणिक परंपराओं से हुई और इसे अंतिम ऐतिहासिक स्वरूप महाराणा कुम्भा के शासनकाल (15वीं शताब्दी ईस्वी) में प्राप्त हुआ।
निस्संदेह, नागदा विप्रकुल ने मेवाड़ के गुहिल राजवंश की स्थापना, संरक्षण तथा “हिंदू सूरज” की अवधारणा को साकार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
निष्कर्ष
अपने चारों अध्यायों के आधार पर यह पुस्तक पुण्यभूमि नागदा तथा परमेष्ठी राज्य मेवाड़ से संबंधित ऐतिहासिक परंपराओं और विकासक्रम का व्यापक एवं संगठित विवरण प्रस्तुत करती है। ग्रंथ का समापन “विशिष्ट अनुपूरक” से होता है, जिसमें नागदा विप्रकुल की वंशावलियों को श्री एकलिंगजी से लेकर वर्तमान पीढ़ी तक क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही इसमें भूमि-अनुदान पत्रों की प्रतिकृतियाँ तथा डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा जी की अन्य प्रकाशित कृतियों की सूची भी दी गई है।
समग्रतः यह कृति मेवाड़ की ऐतिहासिक परंपराओं, नागदा विप्रकुल की भूमिका तथा गुहिल राज्य की सभ्यतागत और सांस्कृतिक आधारभूमि के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान है।