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ग्रामीण मेलेः रोजगार एवं प्रसन्नता के आधार स्तंभ

Admin December 21, 2021

भारत को 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में ग्रामीण मेलों द्वारा जुटाया गया सकल घेरलू उत्पाद एक प्रकार का गिलहरी प्रयास है, जिसे नजरन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। — पवन कुमार शर्मा

 

भारत की तकनीकी प्रगति से सामाजिक परिवर्तन हुआ है। यह परिवर्तन सामान्यता सकारात्मक रहा है, किन्तु कहीं-कहीं इसका प्रभाव नकारात्मक भी रहा है। बदलाव के इस दौर में, मशीनी युग के पहले से विद्यमान ग्राम्य संस्कृति के स्तम्भ रहे, मेलों पर यह विपरीत प्रभाव देखा जा सकता है। देश में, विभिन्न कालखण्डों में विद्यमान असमान राजनैतिक शासन व्यवस्था के बावजूद, मेले समान सांस्कृतिक-धार्मिक परम्पराओं व जीवन मूल्यों को आधार प्रदान करने वाले समन्वयक की भूमिका निभाते थे। प्राचीनकाल के कुम्भ मेले, जो कि एक सभा मिलन हुआ करते थे, नव सृजित साहित्य, आर्थिक नये और उपयोगी तरीके एवं अन्य अनुसंधान जनता तक सम्प्रेषित करते थे। परन्तु, कुम्भ मेलों के अलावा भी, सदियों से आदिवासी अंचलों एवं गाँवों में मेले हमारी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, साहित्यिक संरचना के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ रहे हैं। यह मेले मेल-मिलाप का केन्द्र बनकर सांस्कृतिक व विविध क्षेत्रों में आदान-प्रदान करते थे। भारतीय संस्कृति में मेलों का विशेष महत्व था। जिन मेलों में एक लाख या इससे अधिक जन जुटते थे, उन्हें लक्खी मेला कहा जाता था। इन लक्खी मेलों का व्यावसायिक तौर पर अधिक महत्व होता था। प्रत्येक मेला विशेष प्रयोजन से लगता था। मेलों में लोग एक-दूसरे के साथ समय गुजारते थे। किसी एक स्थान पर बहुत से लोग किसी सामाजिक, धार्मिक एवं व्यावसायिक या अन्य कारणों से इकट्ठा होते थे। इस प्रक्रिया में उत्पादों, सेवाओं, बाजारों का नवीनीकरण और विस्तार होता था।

मेलों का आयोजन लोक/कुल-देवी-देवताओं, भगवान या साधु-महात्माओं की जन्म-निर्वाण तिथियों, अन्य त्यौहारों-उत्सवों से जुड़ा होता है। मेलों की समय-सारिणी भारतीय पंचांग द्वारा निर्धारित तिथियों पर आधारित होती है। इनका मौसम भी होता है। अधिकांशतः खरीफ की बुवाई के बाद सावन-भादों माह या रबी फसल कटाई के बाद चैत्र-बैसाख माह, जिन महीनों में किसानों के पास थोड़ा खाली समय होता है, उन्हीं दिनों मेलों का आयोजन होता है।

अधिकतर मेले स्थानीय होते हैं परन्तु कुछ अंतर्राज्यीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भी हैं। राजस्थान से सम्बद्ध रामदेव, गोगाजी, तेजाजी, जीणमाताजी, खाटू श्यामजी, केला देवी इत्यादि जबकि बिहार में सोनपुर एवं महाराष्ट्र में पंढरपुर, उत्तर प्रदेश में बहराइच का मेला, बंगाल में दुर्गापूजा पर एक बड़े मेले का आयोजन कालीबाड़ी में होता है। पशुओं को खरीदने व बेचने के लिए पुष्कर एवं बालोतरा (राजस्थान) के मेलों में ऊँट, घोड़े, गाय-बैल इत्यादि प्रचुर संख्या में आते हैं। उत्तर प्रदेश में बलरामपुर, बलिया इत्यादि जगहों पर पशु व्यापार मेलों का आयोजन होता है। बलिया के ददरी क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध गर्दभ मेला लगता है।

मेलों में सभी धर्मावलम्बी लोग आते हैं जिनके आयोजन की अवधि एक दिवसीय से लेकर कई दिनों तक होती है। देश की आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ को आजादी के अमृत महोत्सव के तौर पर मनाया जा रहा है, जिसके अनुरूप भारत सरकार की सामाजिक और आर्थिक नीतियों के केन्द्र में गरीब, छोटे किसान, महिला, बच्चे, युवा, ग्रामीण मेले, छोटे व्यापारी, पोषण युक्त चावल, स्वास्थ्य के क्षेत्र में अस्पताल और आक्सीजन प्लांट इत्यादि सम्मिलित किए गए हैं। जहाँ समानता और समृद्धि के साथ सबका प्रयास जुड़ता है और समाज के आखिरी व्यक्ति, गरीब, महिला और युवा, दलित-पिछड़े और सामान्य वर्ग के गरीब लोगों का समावेश होता है। 

पहले के समय, कई साधारण परिवार मेलों में विविध प्रकार के सामाजिक क्रियाकलाप करते थे। जैसे- मुंडन संस्कार, विवाह संस्कार हेतु सगाई-सम्बंध इत्यादि। जबकि कई जाति आधारित संगठन, भविष्य में अपनाई जाने वाली नीतियों के संकल्प, जाति पंचायतों में करते थे जिसमें वृहत एवं लघु सामाजिक परम्पराओं का सर्वव्यापीकरण एवं संकुचितीकरण प्रकट होता था।

आर्थिक संस्था के तौर पर विभिन्न मेले असंख्य कुशल लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था गतिशील बनती है। जीवन यापन हेतु मेलों में दुकान लगाने वालों की संख्या अच्छी खासी होती है। यह मेले वाले एक के बाद दूसरे मेले में, एक गाँव से दूसरे गाँव जाकर दुकान/स्टाल लगाते हैं। यहाँ बिकने वाला सामान उचित दर एवं गरीबों की क्रयशक्ति के अन्तर्गत होता है। यहाँ नामी-गिरामी कम्पनियों के सुप्रसिद्ध उत्पाद नहीं होते बल्कि फिरकी, बाइस्कोप, सर्कस, झूले, लट्टू एवं खानपान हेतु लाजवाब मिठाईयाँ होती हैं। इसके अलावा लुहार, बढ़ई द्वारा निर्मित कृषि उपकरण, बीज, ऊँटों, बैलों एवं घोड़ों के सजावट का सामान यहाँ बिकता है। यहाँ आदिवासी, संथाली या ग्रामीण अंचल की महिलाओं के लिए सौन्दर्य प्रसाधन का सामान मिलता है। आदिवासी व ग्रामीण महिलाएँ नियमित बाज़ारों में न जा पाने के कारण इन मेलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। अतः मेले पुराने समय के ग्राम्य जीवन के मॉल हैं, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इन मेलों में आने वाले अल्पपूँजी वाले उद्यमी मेलों हेतु नियत तिथियों के अनुसार बिक्री हेतु सामान जुटाते हैं या बनाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ताजा आँकड़ों के अनुसार भारत का 90.7 प्रतिशत श्रमशक्ति का हिस्सा असंगठित है। यह असंगठित क्षेत्र ही स्वरोजगार में लगा हुआ है जो सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ावा देने व मेलार्थियों को प्रसन्नता प्रदान करते हैं। आज़ादी के अमृत महोत्सव में अर्थनीति के क्षेत्र में सहकारवाद को बढ़ावा देने हेतु महिलाओं के स्वयंसेवी समूहों द्वारा बनाए गए उत्पादों को मेलों व विकासशील बाज़ारों से जोड़ने की बात कही गई है। ग्रामीण मेलों में किसानों द्वारा बनाए गए सामानों की पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति व निपटान होने से उनके हाथ में नकदी आएगी। जिससे सहकार से समृद्धि सुनिश्चित होगी।

जब भी ग्रामीण परिवेश में मेले लगते हैं तो गाँव के बच्चे, युवा, वृद्ध, महिलाएँ रंग-बिरंगे परिधानों में सजधज कर घरों से आराध्य देवता के दर्शन करने निकल जाते हैं। मेलों के दौरान सर्वप्रथम आराध्य देवता की पूजा की जाती है। लोक गीत गाते-बजाते समूहों में पैदल, बैलगाड़ी, ऊँट-गाड़ी या ऊँटों पर निकलते चले जाते हैं। उनके आस-पास का प्राकृतिक वातावरण भी नाचने गाने लगता है। प्राकृतिक परिवेश रमणीय हो जाता है। जिनका मेले में न जाने का मन होता है, वे भी मस्ती में झूम उठते हैं। पुराने समय में मेले में जाने वाले सभी लोग दिन भर की यात्रा के बाद रात्रि में पूर्व नियत स्थान पर सामूहिक ठहराव करते थे। ठहराव बिंदु पर रात्रि में बाजार सा लग जाता था जहाँ स्थानीय गाँव के लोग जरूरत का सामान विक्रय करते थे। पूरी रात समर्पित देवता (कुलदेवी-देवता) की श्रद्धा स्वरूप गाना बजाना चलता था जिसमें महिलाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी होती थी। समूह अगली सुबह गंतव्य के लिए प्रस्थान करता एवं अगली संध्या दूसरा समूह आकर ठहराव करता। यही क्रम वापसी में भी दोहराया जाता।

बचपन में मेलों की वर्ष भर प्रतीक्षा रहती थी। कुछ सामान जो इस बार लोग नहीं खरीद सके, उसे अगली बार खरीदने का सपना संजोए रखते। गाँवों की मेला आयोजन समितियाँ होने वाले विविध कार्यक्रमों का इश्तिहार जारी करती थी। इसके पश्चात् दुकानों के लिए जगह आवंटन करना, खेलों- प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारियों हेतु टीम निर्धारित की जाती थी। स्थान आवंटन, किराया या टैक्स से आय होती थी।

जब किसी गाँव की टीम क्रीड़ा या सांस्कृतिक प्रतियोगिता में विजयी होती यथा फुटबॉल, वालीबॉल, मुकदर (एकल भारोत्तोलन), कबड्डी, कुश्ती, घुड़दौड़, ऊँटदौड़ या गायन-नृत्य इत्यादि तब भारतीय समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास द्वारा प्रतिपादित ‘ग्रामीण समुदाय’ की भावना अभिव्यक्त होती थी। विजयी गांव वाले जाति समुदाय से ऊपर उठकर अपने गांव के व्यक्ति द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के कारण सामूहिक खुशी मनाते जिससे प्रोत्साहित होकर, गांवों के युवा व प्रौढ़ वर्षभर अपने क्षेत्र में गाँव की सामाजिक पहचान हेतु तैयारी करते थे। विजयी होने वाले व्यक्ति की चर्चा ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय नायक जैसी रहती थी।

हाल के वर्षों में मेलों का स्वरूप बदला है। मेलों का स्वरूप बदलने से उनकी भूमिका भी घट रही है। युवाओं का गाँवों से पलायन होने के कारण, समयाभाव के कारण मेलों के प्रचलन में कमी आई है। मेलों में आने जाने के लिए साधनों का उपयोग बदला है। ब्रांडेड सामान की माँग बढ़ने लगी है। टीवी पर प्रसारित होने वाले खेलों व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोग व्यस्त हो गए हैं। ग्रामीणों में स्वाभिमान की भावना दिनों-दिन गायब होती जा रही है। आपसी लगाव की कमी आ गई है। मेलों में बढ़ती हिंसा, महिलाओं से छेड़छाड़, शराब सेवन व उत्पात, भीड़ जनित दुर्घटनाएँ इत्यादि, इनके प्रति घटते आकर्षण के कारण है। तीव्र गति यातायात के साधनों एवं इंटरनेट ने कई मेलों की प्रासंगिकता को ही चुनौती दे दी है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि मेलों द्वारा प्रदत्त क्रय-विक्रय स्थल का कोई भी इंटरनेट आधारित आभासी प्लेटफार्म विकल्प नहीं बन सकता है।

परन्तु, पहले से ही कमजोर कड़ियों के दौर से गुजरते ग्रामीण मेलों पर मार्च 2020 एवं अप्रैल 2021 में कोरोना महामारी के चलते लगी अघोषित रोक किसी व्रजपात से कम नहीं है। संपूर्ण देश की दृष्टि से देखें तो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करोड़ों लोगों का रोजगार छिन गया। ऐसी स्थिति में हासिए पर जीवन-यापन करने वाला व्यक्ति यथा प्रसाद विक्रेता, मुंडन करने वाला नाई, लोहे एवं लकड़ी के उपकरण बनाने वाले बढ़ई एवं लुहार सब बेकार हो गए। ग्रामीण की खुशहाली के साधनों का छिन जाना ही अवसरों का छिन जाना है। ऐसी स्थिति में बच्चे, महिलाओं, वृद्ध, युवा इत्यादि की दशा बद से बदतर हो गई है। लोगों के लिए महंगा मनोरंजन वहन करना अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गया।

अतएवं, समाज एवं सरकार को मेलों की प्रासंगिकता पर विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत है। इनके द्वारा सृजित रोज़गार एवं सकल घरेलू उत्पाद में सहयोग पर ध्यान देना होगा। इनके द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसन्नता प्रदान करने में योगदान का सही आंकलन करना होगा। इसके लिए इस दिशा में समुचित सर्वे करवाना जरूरी है। सर्वे में पशु मेलों में शामिल होने वाले पशुपालकों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। कोरोना काल की पाबंदियों के कारण, असंगठित क्षेत्र से जुड़े हुए मेलों में रोज़गार पाने वाले सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। इन्हें इस प्रकार की महामारी से उबारने के लिए संगठित क्षेत्र के समान वित्तीय सुविधाएँ जैसे वित्तीय सहायता एवं रियायती दर पर ऋण इत्यादि उपलब्ध कराया जाए। पशुओं हेतु मुफ्त बीमा, मुफ्त पानी एवं चारे इत्यादि की व्यवस्था करनी चाहिए। इस दिशा में प्रयास किया जाए तभी ग्रामीण मेले रोज़गार एवं प्रसन्नता के स्तम्भ बने रह सकेंगे। एक सार्थक प्रयास एवं पहल सरकार और जनता (शहरी एवं ग्रामीण) द्वारा होनी चाहिए।

आजादी की 75वीं वर्षगांठ के अन्तर्गत अमृत महोत्सव मना रहे राष्ट्र की यह सच्ची पहल होगी कि सहस्रों वर्षों से प्रचलित ग्रामीण मेले जो लाखों-करोड़ों नर-नारियों को स्वछन्द रोजगार एवं खुशी प्रदान करवाते हैं उन्हें न केवल बचाया जाए बल्कि उनमें आ रही विकृतियों से रक्षा कर उनकी उपादेयता समयानुकूल बनाई जाए। ग्रामीण मेलों का जीडीपी में योगदान चिन्हित हो। भारत को 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में ग्रामीण मेलों द्वारा जुटाया गया सकल घेरलू उत्पाद एक प्रकार का गिलहरी प्रयास है, जिसे नजरन्दाज नहीं किया जाना चाहिए।ु

प्राचार्य, दयाल सिंह सांध्य महाविधालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, गत चार दशक से दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है एवं ग्रामीण विकास, लोक संस्कृति बाबत लिखते है।

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