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कोरोना के बाद भारत अनहोनी से आशावाद की ओर..

दुनिया भर के सीईओ प्रतिभाओं को आकर्षित करने और अपने साथ बनाए रखने को लेकर भी चिंतित हैं। ऐसे में हमें डर के बजाय उम्मीद के साथ आगे बढ़ना चाहिए। — केके श्रीवास्तव

 

संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक विश्व आर्थिक स्थिति और संभावनाओं के हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछले साल 9 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ा था। आगे के 2 वर्षों में इसे क्रमशः 6.7 प्रतिशत और 6.1 प्रतिशत की मामूली वृद्धि की उम्मीद है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत को सबसे अधिक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में गौरव हासिल है। इसी दौरान चीन वर्ष 2021 के साथ दशमलव 8 प्रतिशत दर के मुकाबले आगे के वर्षों में 5.2 प्रतिशत और 5.5 प्रतिशत रहने का अनुमान रिपोर्ट में किया गया है। कुल मिलाकर 2020 के 3.4 प्रतिशत की तुलना में विश्व की अर्थव्यवस्था उछाल के साथ 5.5 पर पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में आर्थिक सुधार सही रास्ते पर है। कोरोना महामारी से निपटने के लिए तेजी से टीकाकरण, अपेक्षाकृत कम कड़े सामाजिक प्रतिबंधों और सहायक वित्तीय तथा मौद्रिक नीति के कारण भारत की स्थिति मजबूत हुई है। इससे निर्यात के मजबूत होने तथा सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा देने की भी संभावना बढ़ी है। हालांकि उच्च मुद्रास्फीति दर और खासकर तेल और कोयले की कमी के चलते आर्थिक गतिविधियों पर विराम लगने की आशंका है लेकिन निजी निवेश को बढ़ावा देकर इससे निपटा जा सकता है। इसके अलावा अप्रत्याशित मौसम, व्यापक आपूर्ति व्यवधान और उच्च कृषि कीमतों के कारण मुद्रा स्थिति के बढ़ने से खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है, वास्तविक आय को कम कर सकती है तथा देश के भीतर भूख को बढ़ा सकती है।

इंडिया इंक के लगभग 99 प्रतिशत सीईओ का मानना है कि आने वाले साल में भारत आर्थिक रूप से मजबूत हो जाएगा, जबकि वैश्विक स्थिति के बारे में केवल 77 प्रतिशत सीईओ ही आशावादी हैं। 98 प्रतिशत भारतीय अधिकारियों का मानना है कि इस अवधि में उनकी अपनी कंपनियों के राजस्व की संभावनाएं बढ़ेंगी, यह भारतीय कंपनियों के लचीलापन के साथ-साथ बड़े पैमाने पर दृढ़ होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण है। हालांकि स्वास्थ्य जोखिम जैसी चिंताएं अभी भी बनी हुई है, जिसके कारण शुरुआती निवेश और व्यवसायिक निर्णय में बाधा आ सकती है। दुनिया भर के सीईओ प्रतिभाओं को आकर्षित करने और अपने साथ बनाए रखने को लेकर भी चिंतित हैं। ऐसे में हमें डर के बजाय उम्मीद के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

हालांकि यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका या भारत में ओमिक्रोन का असर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि अगले कुछ महीनों के बाद ‘ब्लैकस्वान (काला हंस) परिघटना’ की तरह आई कोरोना महामारी आगे के वातावरण को नियंत्रित करना बंद कर देगी। मालूम हो कि दुनिया की आधी आबादी का टीकाकरण हो चुका है। अस्पतालों में कम भर्ती और मृत्यु के छोटे आंकड़े बताते हैं कि ओमिक्रान उतना घातक साबित नहीं हुआ, जितने की आशंका पहले की जा रही थी। भारत में इसका असर रोज-रोज कम हो रहा है। इसलिए प्रतिबंधों में भी लगातार ढील दी जा रही है। जैसे ही हमारी अर्थव्यवस्था को बाधित करने की शक्ति खो देगी, दुनिया गतिशीलता और डिजिटल समायोजन के साथ आगे की ओर बढ़ेगी।

फिर भी भारतीय रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट की माने तो ओमिक्रोन के प्रभाव को एक झटके से दूर नहीं किया जा सकता, इसने यात्रा, पर्यटन, होटल रेस्तरां, ऑफलाइन खरीदारी आदि जैसे सघन संपर्क उद्योगों को बुरी तरह प्रभावित किया है। आईएमएफ के अनुसार वैश्विक विकास दर को संशोधित करना पड़ सकता है। उन्नत देशों की विस्तारवादी नीति गरीब और विकासशील देशों के लिए भारी पड़ रही है। विशेष रूप से भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी का  बहिर्वाह हो सकता है। हालांकि भारत के मैक्रो फंडामेंटल मजबूत है, सेंट्रल बैंक ने क्रिप्टो और प्रोसाइकल प्राइवेट इक्विटी और वेंचर फंड द्वारा उत्पन्न जोखिमों को चिन्हित किया है। बताते चलें कि इसी दौरान चीन शून्य  कोविड-नीति का पालन करते हुए सख्त तालाबंदी कर रहा है। अर्धचालक, नवीकरणीय और इलेक्ट्रिक वाहन प्रौद्योगिकीयां भारत के लिए आशा जगाने वाली हैं। भारत को इन क्षेत्रों में पहल करनी चाहिए, क्योंकि यहां से अवसर की खिड़कियां खुलती है। वैश्विक मंच परिस्थितियां भारत के अनुकूल है। डिजिटल और आर्थिक क्षेत्र में चीन के अमेरिका के साथ चल रहे संघर्ष जैसे कई एक कारक भारत के पक्ष में हैं। 

2008 के वित्तीय संकट के बाद दुनिया भर में कोरोना संकट आया, जिसने दुनिया को अपनी गिरफ्त में लिया, लेकिन भारत अपवाद रहा। जिस तरह वर्ष 2008 के वित्तीय संकट से भारत सहज बाहर निकल आया था उसी तरह कोरोना संकट से भी बाहर निकलने के लिए हर संभव तैयारी की तथा सफलता भी प्राप्त कर रहा है।

हमारे पास एक विशाल उद्यमशील प्रतिभा की फौज है। अगर हम पिछले तीन दशकों के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो भारत ने सुनील मित्तल, उदय कोटक जैसे कई पहली पीढ़ी के उद्यमी पैदा किए हैं और इन उद्यमियों के पास फार्मा और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में अच्छी कंपनियां है। ऐसे कई उद्यमियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया है। खुदरा बिक्री, हरित प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान निर्माण आदि क्षेत्रों में प्रबल संभावनाएं हैं। 

कोरोना काल में मोदी शासन के तहत केंद्र की सरकार और दिल्ली में केजरीवाल की सरकार की तरह कई राज्यों में उत्पादकता के साथ-साथ आउटरिच का उपयोग करके बड़े पैमाने पर लक्षित कल्याणकारी लाभ देने की योजना चलाई जा रही है। सरकारी कर्मचारियों और तकनीकी उद्यमियों की टीम ने सराहनीय काम किया है। चिकित्सकों ने दिन-रात मेहनत कर  स्वास्थ्य समस्याओं के निदान की कोशिश की है, पर गुणवत्तापूर्ण बुनियादी शिक्षा और जन स्वास्थ्य की देखभाल अभी भी दूर की कौड़ी है। हम सभी जानते हैं कि भारत के समक्ष सुरक्षा चुनौती बढ़ती जा रही है, स्थापित तथ्य है कि रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में हमें पहले कोई सफलता नहीं मिली थी लेकिन अब इस क्षेत्र में भी सफलता के संकेत हैं। हमारे यहां हल्के लड़ाकू विमान का उत्पादन हो रहा है। अब भारत के पास अपना घरेलू विमान वाहक पोत है, जो मिसाइलों की एक पूर्ण स्पेक्ट्रम सारणी विकसित किया है, यह पूरी तरह से परमाणु शक्ति संपन्न है। यह सब कुछ हमारी आपूर्ति कंपनियों के कारण ही संभव हुआ है। पहले हम रक्षा उपकरणों के दुनिया में दूसरे बड़े आयातक देश थे, अब उत्पादक देश की दिशा में हम आगे बढ़े हैं। 

भारत राजमार्गों, हाई स्पीड रेलवे, प्रांत कॉरिडोर के साथ-साथ देश के भौतिक बुनियादी ढांचे में निवेश के परिणामों को प्राप्त करने की दिशा में है। देश में गतिशीलता आसान हुई है। लागत में भी कटौती आई है। कनेक्टिविटी के कारण शहरीकरण के विकास के द्वार खुल गए हैं। बिजली और दूरसंचार के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है। इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग जैसी सेवाओं ने लाखों लोगों का जीवन बदल दिया है। परिवहन और प्रौद्योगिकी में आई क्रांति ने आम आदमी के जीवन को आसान बना दिया है। इन सकारात्मक बातों के साथ सुखद मुस्कान लिए हम आगे बढ़ सकते हैं कि आर्थिक सुधार राष्ट्रीय निर्माण और भलाई के लक्ष्य को प्राप्त करने, भौतिक और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में सुधार और मानव संसाधनों के निर्यात के लिए बुनियादी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की राह आसान करने में महत्वपूर्ण साबित होगा।  

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