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भारतीय दवा उद्योग पर चीन का साया

Admin September 20, 2021

भारत सरकार को तुरंत योजनापूर्वक एपीआई के संदर्भ में चीन पर निर्भरता को समाप्त करने हेतु कड़े कदम उठाने होंगे। हाल ही में सरकार ने देष में एपीआई उत्पादन बढ़ाने हेतु उत्पादन से जुड़े हुए प्रोत्साहनों (पीएलआई) की घोषणा की है, जिसके अंतर्गत 12 हजार करोड़ रूपए की राशि रखी गई है। — डॉ. अश्वनी महाजन

 

भारत को दुनिया की फार्मेसी का हब कहा जाता है। भारत दवा उत्पादन के क्षेत्र में दुनिया में मूल्य के आधार पर चौथे स्थान पर और मात्रा के हिसाब से तीसरे पायदान पर है। दुनिया के अधिकांष मुल्कों में भारतीय दवा निर्यात की जाती है, जबकि अमरीकी बाजार में भारतीय दवाओं की हिस्सेदारी 34 प्रतिषत है। मलेरिया, सामान्य बीमारियों, विटामिनों की कमी, डायबटीज जैसे सामान्य रोग लक्षणों के साथ-साथ कैंसर, अस्थमा, एचआईवी, हृदय रोगों जैसे कठिन रोगों, सबके लिए भारत का दवा उद्योग दवाईयां बनाता है और न केवल देष की आवष्यकताओं की पूर्ति करता है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने का श्रेय भी भारतीय दवा उद्योग को जाता है।

लेकिन पिछले कुछ सालों से भारत के दवा उद्योग पर चीन का ऐसा साया पड़ा है कि उसका आस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। कारण यह है कि दवा उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला पर चीन लगभग काबिज हो गया है। इसके कारण न केवल भारत के 135 करोड़ लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, शेष विश्व को सस्ती दवा उपलब्ध कराने की भारतीय क्षमता पर भी ग्रहण लग सकता है।

आपूर्ति श्रृंखला पर कैसे हुआ चीन काबिज?

वर्ष 2000 से पूर्व भारत दवा उद्योग की आपूर्ति श्रृंखला का अग्रणी देष था, और देष में बने एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडीयंट्स (एपीआई) यानि दवाओं के कच्चे माल की दुनिया भर में मांग थी। मौलिक रसायनों, मध्यवर्ती रसायनों और एपीआई के क्षेत्र में भारत लगातार प्रगति पर था। लेकिन वर्ष 2000 के बाद भारत दुनिया के लिए तैयार दवाओं का स्रोत तो बना रहा, लेकिन एपीआई और मध्यवर्ती सामानों की मैन्युफैक्चरिंग भारत से खिसकती हुई चीन के हाथों में पहुंच गई और भारत और विश्व चीनी एपीआई पर निर्भर हो गए।

यह दुनिया के लिए अचानक हुआ, लेकिन इसमें चीन की सोची समझी चाल थी। एक ओर उन्होंने मध्यवर्ती रसायनों और एपीआई के लिए अकल्पनीय आकार की उत्पादन क्षमता का निर्माण कर लिया तो दूसरी ओर सामान्य कीमत से आधे से भी कम कीमत पर उनकी भारत समेत दुनिया के बाजारों में डंपिंग प्रारंभ कर दी। उसके लिए चीनी सरकार की इस मामले में सक्रिय भागीदारी रही। कम ब्याज पर ऋण, लंबे समय के लिए ऋण अदायगी से मुक्ति , चीनी संस्था सायनोषेऊर द्वारा क्रेडिट गारंटी, सक्रिय शोध सहायता, निर्यात प्रोत्साहन (13 से 17 प्रतिषत), मार्केटिंग में प्रोत्साहन, सस्ती बिजली और सामुदायिक सुविधाएं, जानबूझ कर लचर पर्यावरण नियामक कानून आदि ऐसे कई प्रावधान किए गए थे, जिनमें से कई अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों के विरूद्ध भी थे।इन हथकंडों द्वारा चीन ने भारतीय एपीआई उद्योग को नष्ट कर दिया।

एंटीबायोटिक दवाओं के लिए मूल रसायन (एपीआई) ‘6-एपीए’ के उदाहरण से यह बात स्पष्ट की जा सकती है। ध्यातव्य है कि 2005 में भारत चार निर्माताओं के साथ इस एपीआई हेतु पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर था। आज स्थिति यह है कि भारत इस एपीआई हेतु 100 प्रतिषत चीन पर निर्भर हो गया है। यही नहीं पूरा विश्व इस एंटीबायोटिक हेतु 100 प्रतिषत चीन पर निर्भर है। वर्ष 2001 तक चीन की बाजार आक्रामकता से पहले यह एपीआई औसतन 22 अमरीकी डालर प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकता था। चीन के द्वारा भारत और शेष दुनिया की उत्पादन क्षमता को नष्ट करने के लिए वर्ष 2001 से 2007 के बीच इस एपीआई कीमतों को आधे से भी कम औसतन 9 अमरीकी डालर प्रति किलोग्राम कर दिया गया। जिसका असर यह हुआ कि भारत की सभी चार कंपनियों ने इसका उत्पादन बंद कर दिया, क्योंकि इतने अधिक घाटे पर वे इस एपीआई का उत्पादन नहीं कर सकती थी। लेकिन जैसे ही भारतीय कंपनियां इसके उत्पादन से बाहर हो गई, वैसे ही चीन ने इस एपीआई की कीमत को बढ़ाना शुरू किया और उसके बाद से यह कीमत 2007 में 19 अमरीकी डालर प्रति किलोग्राम से बढ़ती हुई अभी तक 34 डालर प्रति किलोग्राम पहुंच चुकी है और यह लगातार बढ़ती ही जा रही है। यानि समझा जा सकता है कि सस्ते चीनी एपीआई का अंतिम परिणाम महंगा एपीआई ही है।

वास्तव में चीन की रणनीति यह थी कि जहां-जहां भारत या वैश्विक स्तर पर कोई कंपनी उनके साथ प्रतिस्पर्धा में थी, तो कीमतों को इतना नीचे गिराया जाए कि वो कंपनी बाजार से बाहर हो जाए। जैसे ही वो कंपनी बाजार से बाहर हो और चीन का एकाधिकार स्थापित हो जाए तो कीमतों को बढ़ा कर शोषण और अंतोत्गत्वा ब्लैकमेल किया जाए। स्थिति यह है कि आज चीन लगभग सभी प्रकार के एपीआई में एकाधिकार स्थापित कर चुका है और उसके बाद उसका शोषण का खेल भी शुरू हो गया है। यदि हम जनवरी 2020 से जुलाई 2021 के कीमतों के आंकड़ें लें तो पता चलता है कि सभी प्रकार के एंटी बायोटिक के मुख्य एपीआई, ‘6-एपीए’ की कीमत 66 प्रतिषत बढ़ी, जबकि एंटी मलेरिया दवा हेतु मुख्य एपीआई ‘डीबीए’ की कीमत 47 प्रतिषत बढ़ी, एजिथ्रोमायसीन हेतु एपीआई ‘एरिथ्रोमायसीन टीआईओसी’ की कीमत 44 प्रतिषत बढ़ी, ‘पैंनिसीलिन-जी’ की कीमत 97 प्रतिषत और इसी प्रकार से बाकी सभी एपीआई की कीमत भी बढ़ी। अभी भी जो एपीआई भारत में बन रहे हैं या उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं, उनकी कीमतों को जानबूझ करके घटाकर उन्हें प्रतिस्पर्धा से बाहर करने का खेल चल रहा है।

यानि कहा जा सकता है कि चीन येन-केन-प्रकारेण भारत की जनस्वास्थ्य सुरक्षा को ध्वस्त करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। ऐसे में यदि भारत दवाओं के क्षेत्र में इन महत्वपूर्ण आगतों के संदर्भ में चीन पर पूरी तरह से निर्भर होने के कारण ऐसा संभव है कि चीन यदि अचानक इन एपीआई की आपूर्ति बंद कर दे तो ऐसे में हमारी जन स्वास्थ्य सुरक्षा पूरी तरह से ध्वस्त हो सकती है। देष में हर साल 1.5 करोड़ लोग मलेरिया से पीड़ित होते हैं, 5.45 करोड़ हृदय रोगों से ग्रस्त हैं, 22.5 लाख लोग कैंसर पीड़ित हैं, 125 करोड़ लोगों को एंटीबायोटिक की आवष्यकता पड़ती है, 21 लाख एचआईबी मरीज हैं और 3 करोड़ लोग डायबटीज से पीड़ित हैं। ऐसे में इन मरीजों का क्या होगा, यह सोच भी परेषान करने वाली है।

चीन द्वारा ऐसा कदम उठाए जाने की संभावना कोई कपोल कल्पना नहीं है, बल्कि हकीकत है। चीन पहले ही अमरीका को दवा आपूर्ति रोकने की धमकी दे चुका है और अमरीका में इस हेतु चिंता व्यक्त की जा रही है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल ने चेतावनी दी थी कि भारत की चीन पर एपीआई हेतु निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा हो सकती है।

क्या है समाधान?

भारत सरकार को तुरंत योजनापूर्वक एपीआई के संदर्भ में चीन पर निर्भरता को समाप्त करने हेतु कड़े कदम उठाने होंगे। हाल ही में सरकार ने देष में एपीआई उत्पादन बढ़ाने हेतु उत्पादन से जुड़े हुए प्रोत्साहनों (पीएलआई) की घोषणा की है, जिसके अंतर्गत 12 हजार करोड़ रूपए की राषि रखी गई है। लेकिन केवल यही पर्याप्त नहीं होगा। चीन को कीमत युद्ध में पराजित करने के लिए सरकार को सभी एपीआई में ‘सेफगार्ड’ और ‘एंटी डंपिंग’ शुल्क लगाने होंगे। शोध एवं विकास इकाईयों की स्थापना और उत्पादकों को उनकी सुविधा, पर्यावरण कानूनों में उचित प्रावधानों द्वारा एपीआई इकाईयों के लिए जल्दी मंजूरी, टेस्टिंग उपकरणों हेतु आयात शुल्क में छूट, पर्यावरण कानूनों में इन इकाईयों को विषेष छूट और सस्ते दरों पर भूमि का आवंटन आदि कुछ प्रयास हैं, जिनको अपनाकर हम देष पर आसन्न इस संकट से पार पा सकते हैं।     

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