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देशी, स्वदेशी और विदेशी

(नदिया-पूर्व बर्दवान के ताँत उद्योग के आलोक में  भारतीय आर्थिक चिंतन का एक तात्त्विक विवेचन)

 

आज भारत “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” की बात कर रहा है। इन अभियानों की सफलता तभी संभव है जब “लोकल” का अर्थ केवल नारा न रह जाए, बल्कि आर्थिक नीति का ठोस आधार बने। - डॉ. धनपतराम अग्रवाल

 

नवद्वीप (पश्चिम बंगाल) की एक संकरी गली में एक वृद्ध बुनकर अपने करघे पर बैठा था। उसके हाथ धागे बुन रहे थे, पर वास्तव में वह केवल एक साड़ी नहीं बुन रहा था - वह अपने परिवार की आजीविका, अपने गाँव की अर्थव्यवस्था और भारत की एक जीवंत आर्थिक परंपरा को जीवित रखे हुए था। “हम केवल साड़ी नहीं बुनते; अपने परिवार और अपने गाँव का भविष्य भी बुनते हैं,” उसने कहा। इसी एक वाक्य ने इस लेख को जन्म दिया।

हाल ही में मुझे नदिया तथा पूर्व बर्दवान के कुछ ताँत बुनकरों (ताँतियों) के बीच जाने, उनसे संवाद करने और उनकी जीविका की वास्तविक स्थिति को निकट से समझने का अवसर मिला। श्रीरामपुर, नवद्वीप धाम तथा आसपास के अनेक गाँवों में हाथ से बुनी हुई सूती ताँत साड़ियों के निर्माण और व्यापार से जुड़े परिवारों से मिलकर यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक जीवंत सांस्कृतिक और आर्थिक परंपरा है।

इन दोनों जिलों में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से लाखों लोग ताँत उद्योग से जुड़े हैं - बुनकर, सूत व्यापारी, रंगाई करने वाले, डिज़ाइनर, फिनिशिंग और पैकिंग करने वाले, परिवहनकर्ता तथा छोटे व्यापारी। यह पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था आज गहरे संकट से गुजर रही है। अनेक बुनकर अपना पैतृक व्यवसाय छोड़ने के लिए विवश हो रहे हैं, और नई पीढ़ी इस परंपरा में अपना भविष्य नहीं देख रही है।

इस संकट का मूल कारण केवल बाज़ार की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि तीन भिन्न प्रकार की वस्तुओं का एक साथ बाज़ार में उपस्थित होना है - देशी, स्वदेशी और विदेशी। यह भेद यदि केवल भावनात्मक अपील न रहकर एक आर्थिक सिद्धांत के रूप में समझा जाए, तो यह स्वदेशी चिंतन में एक नया आयाम जोड़ सकता है।

देशी, स्वदेशी और विदेशीः तीनों में मूलभूत अंतर

देशी का अर्थ केवल भारत में बनी वस्तु नहीं है। देशी वह है - जो किसी क्षेत्र की स्थानीय प्रकृति, संस्कृति, कौशल, संसाधन और समाज की आर्थिक संरचना से जन्म लेती है। नवद्वीप, शांतिपुर, फुलिया या पूर्व बर्दवान की ताँत साड़ी इसलिए देशी है क्योंकि उसका निर्माण वहीं के लोगों द्वारा, वहीं के कौशल के आधार पर होता है, और उसकी आय पुनः उसी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में प्रवाहित होती है। देशी का केंद्र केवल वस्तु नहीं, स्थानीय समाज है।

स्वदेशी का अर्थ है - अपने राष्ट्र में निर्मित वस्तु का सम्मान और उपयोग। सूरत की पावरलूम साड़ियाँ स्वदेशी हैं क्योंकि उनका निर्माण भारत में होता है और वे भारतीय उद्योग व रोज़गार का सृजन करती हैं।

विदेशी वह है - जिसके उत्पादन से उत्पन्न रोज़गार, आय और मूल्य-संवर्धन भारत के बाहर जाता है, जैसे बांग्लादेश से आने वाली हैंडलूम व पावरलूम साड़ियाँ। जब उपभोक्ता विदेशी वस्तु खरीदता है, तो उसका धन स्थानीय अर्थव्यवस्था से निकलकर दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता है।

यह वर्गीकरण केवल भौगोलिक नहीं है; इसका सीधा संबंध रोज़गार, आय, पूँजी के प्रवाह और सामाजिक स्थिरता से है।

आर्थिक कोरः स्थानीय गुणक प्रभाव

यदि कोई उपभोक्ता नवद्वीप की एक ताँत साड़ी खरीदता है, तो उसका मूल्य सूत विक्रेता, रंगाई करने वाले, बुनकर, डिज़ाइनर, स्थानीय व्यापारी और परिवहनकर्ता - इन सबके बीच बँटता है। अर्थात एक ही गाँव में आय का बहुगुणक प्रभाव (लोकल मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट) उत्पन्न होता है - एक रुपया कई बार उसी स्थानीय अर्थव्यवस्था में घूमकर मूल्य बढ़ाता है।

इसके विपरीत, यदि वही उपभोक्ता सूरत की मशीन-निर्मित साड़ी खरीदता है, तो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ अवश्य होता है, परन्तु नवद्वीप का स्थानीय आर्थिक चक्र रुक जाता है। यहीं एक सूक्ष्म किन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि यदि सूरत की अत्यधिक यंत्रीकृत, कम लागत वाली पावरलूम साड़ियाँ नदिया और पूर्व बर्दवान के परम्परागत बाज़ार पर अधिकार कर लें, तो राष्ट्र के भीतर ही एक क्षेत्र का विकास दूसरे क्षेत्र की आजीविका को समाप्त करने लगता है।

अतः स्वदेशी का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संतुलन बनाए रखना भी है। यदि राष्ट्रीय उत्पादन स्थानीय जीवन को नष्ट करने लगे, तो स्वदेशी की आत्मा अधूरी रह जाती है।

और यदि वही उपभोक्ता बांग्लादेश की साड़ी खरीदता है, तो भारतीय रोज़गार नहीं बढ़ता, भारतीय उत्पादन नहीं बढ़ता, विदेशी मुद्रा बाहर जाती है, और स्थानीय उद्योग और अधिक कमज़ोर होता है - इसीलिए लगभग सभी विकसित देश अपने पारम्परिक उद्योगों की किसी न किसी रूप में रक्षा करते हैं।

आर्थिक त्रिकुटीः तीन प्रकार की प्रतिस्पर्धा

  • देशी (स्थानीय ताँत) - श्रमप्रधान, सांस्कृतिक, सीमित उत्पादन, उच्च कौशल
  • स्वदेशी (सूरत पावरलूम) - यंत्रीकृत, कम लागत, बड़े पैमाने का उत्पादन
  • विदेशी (बांग्लादेशी साड़ियाँ) - आयातित, मूल्य-प्रतिस्पर्धी, स्थानीय बाज़ार पर दबाव

पहली प्रतिस्पर्धा स्थानीय कौशल और मशीन के बीच है। दूसरी प्रतिस्पर्धा भारत के दो आर्थिक मॉडलों के बीच है। तीसरी प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय और विदेशी अर्थव्यवस्था के बीच है। यदि केवल मूल्य (प्राइस) को निर्णायक आधार बनाया जाए, तो मशीन सदैव हस्तकला पर भारी पड़ेगी - परन्तु यदि रोज़गार, संस्कृति और सामाजिक पूँजी को भी आर्थिक मूल्य माना जाए, तो निर्णय बदल जाता है।

विश्व के उदाहरणः यह केवल भारत की समस्या नहीं

जापान ने आधुनिक औद्योगीकरण के बावजूद अपने पारम्परिक किमोनो उद्योग को संरक्षण दिया; मशीन-निर्मित वस्त्रों के युग में भी हस्तनिर्मित किमोनो आज सांस्कृतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण हैं। इटली का टस्कनी लेदर, मुरानो ग्लास और हस्तनिर्मित फैशन उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बावजूद इसलिए जीवित है क्योंकि वहाँ सरकार, उपभोक्ता और बाज़ार स्थानीय शिल्प को विशेष पहचान देते हैं। फ्रांस में स्थानीय पनीर, वाइन और हस्तशिल्प को ‘‘प्रोटेक्टेड डिजिगनेशन ऑफ ओरिजिन (पीडीओ)’’ जैसी कानूनी सुरक्षा प्राप्त है - ये सभी उदाहरण दर्शाते हैं कि विकसित राष्ट्र भी अपनी स्थानीय पारम्परिक अर्थव्यवस्था को सायास संरक्षित करते हैं।

भारत के लिए शिक्षा

भारत में भी बनारसी साड़ी, कांचीपुरम सिल्क, चंदेरी, महेश्वरी, भागलपुरी, बालूचरी और बंगाल ताँत जैसी अनेक परम्पराएँ इसी चुनौती का सामना कर रही हैं। इन तथयों से स्पष्ट है कि ताँत उद्योग कोई सीमांत क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है -

  • भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा वस्त्र एवं परिधान उत्पादक देश है, और यह क्षेत्र देश के सबसे बड़े रोज़गार-प्रदाताओं में से एक है।
  • भारत सरकार की चौथी अखिल भारतीय हथकरघा गणना (2019-20) के अनुसार लगभग 35 लाख से अधिक बुनकर व संबद्ध कार्यकर्ता हथकरघा क्षेत्र से जुड़े हैं।
  • भारत में 600 से अधिक हस्तकरघा व हस्तशिल्प उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) का दर्जा प्राप्त है, जिनमें शांतिपुर साड़ी और फुलिया ताँत भी सम्मिलित हैं, इसका उद्देश्य स्थानीय परंपरा और उत्पाद की विशिष्ट पहचान की रक्षा करना है।

तात्त्विक आधारः दीनदयाल उपाध्याय और गांधीजी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्पष्ट कहा था कि अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल उत्पादन नहीं, बल्कि मनुष्य का समग्र विकास है। उन्होंने “अर्थायाम” की अवधारणा में अर्थ को धर्म, समाज और संस्कृति से जोड़कर देखा, और यह माना कि ऐसी अर्थव्यवस्था उचित नहीं हो सकती जिसमें उत्पादन तो बढ़े किन्तु बेरोज़गारी भी बढ़ती जाए। नदिया का ताँत उद्योग ठीक इसी प्रश्न को हमारे सामने रखता है।

महात्मा गांधी ने लिखा था कि स्वदेशी का अर्थ है - अपने निकटवर्ती पड़ोसी की सेवा करना। गांधीजी ने कभी केवल भारतीय वस्तु खरीदने की बात नहीं कही - उन्होंने पहले अपने गाँव, फिर अपने क्षेत्र, और उसके बाद अपने राष्ट्र की सेवा की बात की। यही देशी और स्वदेशी के बीच का वास्तविक सम्बन्ध हैः स्वदेशी, देशी से होकर ही परिपूर्ण होता है।

यदि कोई वस्तु सस्ती है, परन्तु उससे लाखों परिवार बेरोज़गार हो जाते हैं, तो उसका मूल्य केवल रुपये में नहीं आँका जा सकता। यदि किसी उत्पाद के कारण किसी क्षेत्र की शताब्दियों पुरानी कला समाप्त हो जाती है, तो वह केवल आर्थिक हानि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पूँजी का विनाश है।

एक नया आर्थिक सिद्धान्तः प्राथमिकता-क्रम

विदेशी वस्तु राष्ट्रीय संपदा को बाहर ले जाती है। स्वदेशी वस्तु राष्ट्रीय संपदा को देश में रखती है। देशी वस्तु स्थानीय समाज की संपदा, संस्कृति और रोज़गार को जीवित रखती है। इसीलिए आर्थिक नीति का क्रम होना चाहिए -

  • पहली प्राथमिकता - देशी
  • दूसरी प्राथमिकता - स्वदेशी
  • तीसरी और अंतिम - विदेशी

स्वदेशी का वास्तविक अर्थ केवल “भारतीय वस्तु खरीदो” का नारा नहीं है। स्वदेशी का अर्थ है - उत्पादन का विकेंद्रीकरण, स्थानीय कौशल का संरक्षण, अधिकतम रोज़गार-सृजन, आत्मनिर्भर समुदायों का निर्माण, और अर्थव्यवस्था को मानव-केंद्रित बनाना।

नीतिगत समाधान

ताँत उद्योग को केवल अनुदान देकर जीवित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए एक समग्र रणनीति आवश्यक है -

  • स्थानीय ताँत को विशिष्ट भौगोलिक पहचान (जीआई ब्रांड) के रूप में विकसित किया जाए।
  • डिज़ाइन, विपणन और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए।
  • सरकारी खरीद में स्थानीय ताँत को प्राथमिकता मिले।
  • विदेशी साड़ियों के अनुचित आयात पर प्रभावी निगरानी हो।
  • उपभोक्ताओं में “स्थानीय खरीदें, स्थानीय बचाएँ” का जन-अभियान चलाया जाए।
  • प्रत्येक जिले की अपनी पारंपरिक- उद्योग नीति तैयार की जाए।

विस्तृत दृष्टिः “देशी अर्थव्यवस्था” - 21वीं सदी का नया आर्थिक प्रतिमान

नवद्वीप का यह अनुभव एक व्यापक प्रश्न की ओर ले जाता है। इक्कीसवीं सदी का विश्व केवल राजनीतिक परिवर्तन का नहीं, बल्कि आर्थिक प्रतिमानों के पुनर्निर्माण का भी साक्षी बन रहा है। कोविड-19 महामारी ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की नाजुकता उजागर की, व्यापार-युद्धों ने मुक्त व्यापार की सीमाएँ स्पष्ट कीं, और आज विश्व का मूल प्रश्न केवल यह नहीं कि अधिक उत्पादन कैसे हो, बल्कि यह कि विकास ऐसा कैसे हो जो मानव, समाज, प्रकृति और प्रौद्योगिकी के बीच संतुलन स्थापित कर सके।

इसी संदर्भ में मैं “देशी अर्थव्यवस्था” की अवधारणा प्रस्तुत करना चाहता हूँ - यहाँ “देशी” कोई संकीर्ण भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि स्थानीय आर्थिक पारिस्थितिकी पर आधारित एक आर्थिक सिद्धांत है। किसी क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधन, मानवीय कौशल, स्थानीय पूँजी, उद्यमशीलता, सामाजिक विश्वास और सांस्कृतिक परंपरा मिलकर जो आत्मपोषित आर्थिक तंत्र निर्मित करते हैं, वही देशी अर्थव्यवस्था का आधार है। भारत को यदि समझना है, तो केवल उसके जीडीपी को नहीं, बल्कि उसके जिलों, कस्बों और गाँवों की आर्थिक जीवंतता को समझना होगा।

नवद्वीप का ताँत उद्योग, मुरादाबाद का पीतल, भदोही के कालीन, कन्नौज का इत्र, कच्छ की कढ़ाई, सूरत का वस्त्र उद्योग, तिरुपुर का निटवेयर, कोयम्बटूर की इंजीनियरिंग - ये केवल उद्योग नहीं, स्थानीय आर्थिक पारिस्थितिकियों के जीवंत उदाहरण हैं, जिनमें कच्चे माल से लेकर कौशल, वित्त, परिवहन और सामाजिक संबंधों की पूरी शृंखला सक्रिय रहती है।

यह प्रतिमान न तो संरक्षणवाद है, न वैश्वीकरण का विरोध। यह कहता है कि विश्व के साथ वही राष्ट्र सम्मानपूर्वक खड़ा हो सकता है जिसकी स्थानीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो। इसीलिए विकासक्रम यह होना चाहिए - स्थानीय समृद्धि - राष्ट्रीय शक्ति - वैश्विक नेतृत्व, अर्थात देशी - स्वदेशी - वैश्विक सहभागिता।

निष्कर्ष

नदिया और पूर्व बर्दवान का ताँत उद्योग हमें एक गहरा आर्थिक सत्य सिखाता है - हर स्वदेशी वस्तु देशी नहीं होती, और हर देशी वस्तु का संरक्षण स्वदेशी की आत्मा का अनिवार्य अंग है। विदेशी वस्तुओं की चुनौती स्पष्ट दिखाई देती है, किंतु राष्ट्रीय स्तर की यंत्रीकृत प्रतिस्पर्धा भी कभी-कभी स्थानीय अर्थव्यवस्था को उतना ही आहत कर सकती है।

अतः आर्थिक नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि उत्पादन, रोज़गार, संस्कृति और क्षेत्रीय संतुलन - इन चारों का समन्वय होना चाहिए। स्वदेशी का वास्तविक संदेश यही है कि जिस अर्थव्यवस्था में अंतिम व्यक्ति की आजीविका सुरक्षित रहती है, वही राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि का आधार बनती है। स्थानीय उत्पादन का संरक्षण किसी प्रकार का संरक्षणवाद नहीं, बल्कि भारत की बहुरंगी आर्थिक संरचना, सांस्कृतिक विविधता और करोड़ों परिवारों की गरिमामय आजीविका की रक्षा का एक राष्ट्रीय दायित्व है।

आज भारत “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” की बात कर रहा है। इन अभियानों की सफलता तभी संभव है जब “लोकल” का अर्थ केवल नारा न रह जाए, बल्कि आर्थिक नीति का ठोस आधार बने। यदि प्रत्येक भारतीय वर्ष में केवल एक स्थानीय हथकरघा उत्पाद खरीदने का संकल्प ले, तो लाखों बुनकर परिवारों की आजीविका सुरक्षित हो सकती है - यही देशी से स्वदेशी, और स्वदेशी से आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक यात्रा है।                

(लेखक, प्रधान शोधकर्ता और संस्थापक निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल ट्रेड (आईआईट्रेड), कोलकाता है।)

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