स्वदेशी तकनीक से विकसित यह उड़ान न केवल भारत के वैज्ञानिक सामर्थ को नई ऊंचाई देने वाली है बल्कि दुनिया को यह संदेश भी गया है कि भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र अंतरिक्ष की नई सीमाओं को छूने के लिए पूरी तरह से तैयार है। - अनिल तिवारी
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक नए और ऐतिहासिक दौर में प्रवेश कर चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो की दशकों की उपलब्धियों के बाद देश की एक निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट ने अपने विक्रम-1 रॉकेट से प्रदर्शनात्मक सामग्री पृथवी की एक निकट कक्षा में निर्धारित जगह पर पहुंचा दिया है। श्रीहरिकोटा से स्काई रूट एयरोस्पेस का सफल कक्षीय प्रक्षेपण केवल एक रॉकेट लॉन्च नहीं बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग की नई शुरुआत का सुनहरा अध्याय भी है। तकनीकी तौर पर देखें तो विक्रम-1 रॉकेट कंपोजिट कार्बन जैसी अपेक्षाकृत हल्की सामग्री से बना हुआ है और इसका लिक्विड फ्यूल इंजन 3-डी प्रिंटिंग से तैयार किया गया है। यह 4 स्टेज रॉकेट है जिसकी तीन स्टेजेज सॉलि़ड फ्यूल से और चौथी यानी आखिरी स्टेज लिक्विड फ्यूल से चलने वाली है। किराए के मामले में यह थोड़ा महंगा पड़ेगा, लेकिन कोई टीवी कंपनी फटाफट अपना सैटेलाइट चाहती है तो उसे अब लंबा इंतजार नहीं करना होगा। यह मिशन इसलिए भी विशेष है क्योंकि पहली बार कोई भारतीय निजी कंपनी अपने विकसित किए गए रॉकेट के माध्यम से उपग्रह को पृथवी की कक्षा में स्थापित किया है। 19 जुलाई 2026 को हुए सफल प्रक्षेपण के बाद भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है जहां सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ निजी कंपनियां भी स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष प्रक्षेपण करने में सक्षम बन रही हैं।
‘विक्रम-1’ भारत का पहला निजी रूप से स्वदेशी तकनीक पर विकसित कक्षीय प्रक्षेपण यान है। इसका नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉक्टर विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। यह रॉकेट भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ते निजी निवेश, स्वदेशी तकनीक और नवाचार का प्रतीक माना जा रहा है। अब तक इस प्रकार के मिशन का नेतृत्व मुख्य रूप से इसरो करता रहा है लेकिन अब निजी क्षेत्र भी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारतीय स्टार्टअप द्वारा अर्जित यह सफलता भविष्य में भारत में निजी उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं के नए अवसर खोलेगी और वैश्विक वाणिज्यिक अंतरिक्ष बाजार में भारत की भागीदारी को भी मजबूत करेगी।
विक्रम-1 छोटे सैटेलाइट को पृथवी की कक्षा में पहुंचने वाला रॉकेट है। इसरो धीरे-धीरे 500 किलो से कम के सेटेलाइट की लांचिंग से दूरी बना रहा है। हालांकि स्काई रूट की रॉकेट सेवा अभी 350 किलो तक के लांचिंग के लिए ही डिजाइन की गई है लेकिन भविष्य में विक्रम रॉकेट के अगले मॉडल 800 किलोग्राम तक के लॉन्च करने की योजना है। लेकिन यह सब तभी संभव होगा जब स्काईरूट एरोस्पेस अपना लॉन्चिंग इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करे।
पूरी दुनिया में सिर्फ चार देश ऐसे हैं जो स्पेस लॉन्च सेक्टर में निजी उद्यमों के प्रवेश की व्यवस्था कर सके हैं। अमेरिका, जापान और चीन के बाद भारत का नाम शामिल हो गया है। इससे भारत के नवाचार को बहुत अधिक लाभ मिलने वाला है। इस क्षेत्र में निजी उद्यमों को बढ़ावा देने का घोषित लक्ष्य यह है कि इसके बल पर सैटेलाइट भेजने का खर्चा इसरो की तुलना में पांचवें हिस्से तक लाया जा सकता है। अभी इस पर 20 से 25 करोड़ का खर्च आने की बात कही गई है जबकि सबसे सस्ती इसरो की लॉन्चिंग 30 से 35 करोड़ में होती है। भारत के वैज्ञानिकों ने सेटेलाइट टेक्नोलॉजी का सुदृढ़ ढांचा खड़ा किया है। इसलिए क्षेत्र में निजी भागीदारों के शामिल होने के बाद बहुस्तरीय नवाचार गुणात्मक गति से आगे बढ़ेगा।
स्पेस एक्स ने अगले कुछ वर्षों में 50000 और चीन ने 12500 सैटेलाइट लॉन्च करने की योजना बना रखी है। इस माहौल में भारत आकाश से लेकर जमीन तक अपनी संप्रभुता सुरक्षित रखने के लिए इस तरह के नवाचारों को बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयासरत है। भारत राकेटों के पुनर्प्रयोग के लिए भी तैयारी कर रहा है। जिस तरह अमेरिका और चीन अपने राकेटो को सुरक्षित उतार कर उन्हें दोबारा इस्तेमाल के लायक बना लेते हैं, स्काई रूट एयरोस्पेस के लिए यह काम ज्यादा आसान है क्योंकि इसका मटेरियल उन देशों की तुलना में बहुत हल्का है। स्काई रूट के वैज्ञानिक रॉकेट कैप्चर टेक्नोलॉजी विकसित करने में लगे हुए हैं।
इस मिशन की एक विशेष सांस्कृतिक पहचान भी है। विक्रम-1 अपने साथ एक सूक्ष्म स्वर्ण रॉकेट ले गया जिसमें डॉक्टर विक्रम साराभाई सर चंद्रशेखर वेंकट रमन और डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की सूक्ष्म प्रतिमाएं भेजी गई। यह विज्ञान संस्कृत और भारत की वैज्ञानिक विरासत को एक साथ जोड़ने का अनूठा प्रयास है। ‘मिशन आगमन’ वंदे मातरम अंकित प्रधानमंत्री का संदेश और दुनिया भर से प्राप्त शुभकामनाओं का संदेश भी ले गया। यह पहला भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को नागरिक आकांक्षाओं से जोड़ने का प्रतीकात्मक प्रयास है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विक्रम-1 की सफलता भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकती है भारत ने आने वाले वर्षों में वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। उपग्रह प्रक्षेपण, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान और निजी निवेश के क्षेत्र में यह मिशन मील का पत्थर साबित हो सकता है।
पिछले कुछ सालों में भारत ने निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र के द्वारा खोले हैं। भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र जैसी संस्थाओं की स्थापना और नई अंतरिक्ष नीति ने निजी उद्योगों को इस क्षेत्र में निवेश और अनुसंधान के लिए प्रोत्साहित किया है। स्काईरूट एयरोस्पेस की यह उपलब्धि इसी नीति का परिणाम मानी जा रही है। स्वदेशी तकनीक से विकसित यह उड़ान न केवल भारत के वैज्ञानिक सामर्थ को नई ऊंचाई देने वाली है बल्कि दुनिया को यह संदेश भी गया है कि भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र अंतरिक्ष की नई सीमाओं को छूने के लिए पूरी तरह से तैयार है।