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इलैक्ट्रिक वाहनः परिवहन की सर्वोच्च आवश्यकता

नए परिदृश्य में, जन मानस में प्रदूषण के प्रति सजगता, पर्यावरण के प्रति संवेदना और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये जनता के बढ़ते समर्थन के साथ भारत सरकार के प्रयासों से इनका प्रचलन लक्ष्य के अनुसार बढ़ेगा और कच्चे तेल के आयात में भारी कमी होगी, साथ ही पर्यावरण स्वच्छ होगा।  — विनोद जौहरी

 

महंगे पेट्रोल, डीजल और प्रदूषण की मार ने जनता को इलैक्ट्रिक वाहन की ओर आकर्षित किया है। इलेक्ट्रिक वाहन आंतरिक दहन इंजन के बजाय इलेक्ट्रिक मोटर से संचालित होते हैं और इनमें ईंधन टैंक के बजाय बैटरी लगी होती है। इलेक्ट्रिक कार बैटरी में संग्रहीत ऊर्जा का उपयोग करके इलेक्ट्रिक मोटरों द्वारा संचालित होती है। आंतरिक दहन इंजन वाहनों की तुलना में, इलेक्ट्रिक कारें ध्वनि शून्य होती हैं, कोई विशेष निकास उत्सर्जन नहीं होता है। ये पर्यावरण के लिये अनुकूल होती हैं। पेट्रोल या डीजल से चलने वाले वाहन में इंजन के अंदर ईंधन जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी कई हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहन के लिये ईंधन की लागत लगभग 80 पैसे प्रति किलोमीटर है। इसकी तुलना में 100 रू. प्रति लीटर से अधिक के पेट्रोल मूल्य के साथ पेट्रोल संचालित वाहन पर 7-8 रू. प्रति किलोमीटर का खर्च आता है। जीवाश्म ईंधन से चलने वाली कार के पूरे काल में आयातित ईंधन का इस्तेमाल होता है।   

शहरीकरण आर्थिक विकास की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, इसकी वज़ह से ऊर्जा और परिवहन अवसंरचना पर दबाव तो बढ़ता ही है, साथ ही भीड़भाड़ और प्रदूषण में भी वृद्धि होती है। भारत अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और शहरीकरण के कारण बढ़ती परिवहन आवश्यकताओं के कारण इसमें वृद्धि निश्चित है। भारत लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए प्रयासरत है। आधिकारिक आंकड़े बतातें है कि भारत अपने महत्वाकांक्षी इलेक्ट्रिक वाहन नीति के कारण वर्ष 2030 तक परिवहन से ही लगभग 64 फीसदी ऊर्जा बचा सकता है और साथ ही 37 फीसदी कार्बन का उत्सर्जन भी कम कर सकता है। इसके साथ ही 60 बिलियन डॉलर भी 2030 तक बचाए जा सकते हैं। नीति आयोग, भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ के अनुमान के अनुसार, यदि भारत 100 प्रतिशत विद्युतीकरण कर लेता है तो 20 लाख करोड़ रू. और 1 गीगा टन कार्बनडाईऑक्साइड का उत्सर्जन बचाया जा सकता है।  

वैश्विक तापमान में तेज़ी से वृद्धि की संभावना ने जीवाश्म ईंधन के उपयोग और उससे होने वाले उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों के लिए विवश कर दिया है। भारत ने 2020 तक 175 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता जोड़ने और 2020 तक ही गैर-जीवाश्म स्रोतों से कुल विद्युत उत्पादन का 40 प्रतिशत हासिल करने का लक्ष्य रखा था। भारत ने अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 2030 तक 2005 के स्तर की तुलना में 33 प्रतिशत से 35 प्रतिशत कम करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। पिछले एक दशक में पवन और सौर ऊर्जा उत्पादन प्रौद्योगिकियों में हुई प्रगति से इलैक्ट्रिक वाहन की लागत में भारी कमी आई है और स्वच्छ, कम कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा के इस्तेमाल की संभावना को बल मिला है। 

भारत में और विश्व में मेट्रो समेत अधिकतर ट्रेनें पहले से ही बिजली से प्रचलित होती  हैं। देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की अपनी नीति के अंतर्गत भारत सरकार ने (फ़ास्टर अडोप्शन एंड मैनुफेक्चुरिंग ऑफ हाइब्रिड एंड इलैक्ट्रिक वेहिक्ल्स) फेम-2 (थ्।डम्) कार्यक्रम तय किया है, जिसके अंतर्गत भारत सरकार ने दूसरे  फेज़ में इस कार्यक्रम के लिए 10,000 करोड़ रू. का प्रावधान किया है। जहाँ केंद्र सरकार का लक्ष्य 2030 तक देश में सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह इलेक्ट्रिक चालित करने का लक्ष्य है, वहीं इस अवधि में व्यक्तिगत परिवहन वाले 40 प्रतिशत वाहनों को भी इलेक्ट्रिक चालित करने का लक्ष्य है। सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं के लिए उत्पादन से संबन्धित प्रोत्साहन की दो योजनाएं प्रारम्भ की हैं। एक इलेक्ट्रिक वाहनों के विनिर्माण के लिए है, दूसरी योजना पावर बैटरी के एडवांस केमिस्ट्री सेल्स के विनिर्माण के लिए है। 

 ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों में इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहियों की अच्छी बिक्री हुई है। महाराष्ट्र में 56 फीसदी, कर्नाटक में 75 फीसदी और तमिलनाडु में 78 फीसदी बिक्री ऐसे ही छोटे शहरों में हुई है। 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों में ई-स्कूटरों की सबसे ज्यादा बिक्री हुई है। कई राज्यों में छोटे कस्बों और शहरों में ई-वाहनों को तेजी से अपनाया जा रहा है। वित्त वर्ष 2022 में ई-स्कूटरों की बिक्री में महाराष्ट्र (41,850), कर्नाटक (41,278) और तमिलनाडु (35,695) शीर्ष तीन राज्यों में रहे। सभी दोपहिया वाहनों की बिक्री में भी महाराष्ट्र (69 फीसदी), कर्नाटक (79 फीसदी) और तमिलनाडु (82 फीसदी) के छोटे शहरों का अहम योगदान रहा।  मार्च 2022 में कुल ईवी की बिक्री पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 196 फीसदी बढ़कर 77,128 वाहन रही। ई-दोपहियों की मांग तिगुनी बढऩे से बिक्री में वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर जनवरी 2021 में कुल वाहनों की बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी 1 फीसदी थी, जो अगस्त 2021 में बढ़कर 2 फीसदी और दिसंबर 2021 में 3 फीसदी हो गई। मार्च 2022 में कुल वाहनों की बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी 4 फीसदी रही।

बैटरी तकनीक में प्रगतिः बैटरी प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति से उच्च ऊर्जा घनत्व प्राप्त किया जा सकता है तथा चार्जिंग में तेज़ी लाने के साथ चार्जिंग के दौरान होने वाली बैटरी की क्षमता में होने वाली कमी को भी नियंत्रित किया जा सकता है। अत्याधुनिक मोटरों के साथ इन बैटरियों के सम्मिश्रण से इलेक्ट्रिक वाहनों की कार्य प्रणाली सुधरी है तथा इनकी क्षमता बढ़ी है और लागत कम हुई है। ई-दोपहिया और ई-तिपहियों की बैटरी को चार्ज करने के लिए विशेष चार्जिंग इनफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता नहीं है। बिज़नेस स्टैंडर्ड में समाचार के अनुसार 60 फीसदी से ज्यादा ऑर्डर छोटे-मझोले शहरों से आते हैं। ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2022 में प्रति 1,000 गैर-ईवी वाहनों की बिक्री पर ईवी की बिक्री दिल्ली में 84, त्रिपुरा में 63 और असम में 49 वाहनों की रही।   

भारत में संभावनाएँ

निजी क्षेत्र से इलेक्ट्रिक वाहनों का बहुत समर्थन मिला है। अमेज़न, स्विगी और ज़ोमैटो जैसी कंपनियाँ अपने डिलीवरी कार्यों के लिये इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिकाधिक प्रयोग कर रही हैं। महिंद्रा कार निर्माता कंपनी की ओला उपभोक्ता सेवा प्रदाता कंपनी के साथ और टाटा मोटर्स की ब्लू स्मार्ट मोबिलिटी के साथ साझेदारी से अधिकाधिक इलेक्ट्रिक वाहन डिलीवरी सेवाओं की सुनिश्चितता होगी। टाटा मोटर्स ने  इलेक्ट्रिक वाहनों का वार्षिक उत्पादन 80,000 तक बढ़ाने की संभावना व्यक्त की है और 2026 तक इलेक्ट्रिक वाहनों के 10 ईवी मॉडल बनाने का कार्यक्रम तय किया है। टाटा मोटर्स का इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में 90 प्रतिशत योगदान है। टाटा मोटर्स ने टेक्नोलोजी पर 2 अरब डॉलर निवेश करने की योजना बनाई है। वर्ष 2030 तक भारत में कुल कारों की बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की भागीदारी 30 प्रतिशत तक होने की संभावना है। टाटा मोटर्स अपने ई वी मॉडल को विदेशों में भी बिक्री करेगी। 

दिल्ली सरकार की योजना हर तीन किमी पर चार्जिंग स्टेशन बनाने और साथ ही साथ प्राइवेट चार्जिंग स्टेशन बनाने के लिए सब्सिडी देने की भी है। ऊर्जा मंत्रालय ने 2023 तक चार्जिंग इन्फ्रा सेटअप योजना की घोषणा की  है। इसके अलावा कई निजी कंपनियां इसको लेकर पायलट प्रोजेक्ट पर काम भी कर रही हैं और ज्यादा से ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को प्रोत्साहित कर रही हैं।

नए परिदृश्य में, जन मानस में प्रदूषण के प्रति सजगता, पर्यावरण के प्रति संवेदना और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये जनता के बढ़ते समर्थन के साथ भारत सरकार के प्रयासों से इनका प्रचलन लक्ष्य के अनुसार बढ़ेगा और कच्चे तेल के आयात में भारी कमी होगी, साथ ही पर्यावरण स्वच्छ होगा। इनकी मरम्मत और सर्विसिंग सुलभ होने से स्वरोजगार के अवसर बढ़ेंगे। कुल मिलाकर हम परिवहन के क्षेत्र में स्वच्छ पर्यावरण और स्वरोजगार के साथ समाज के अंतिम स्तर तक स्वावलंबी होने में सफल होंगे।

विनोद जौहरीः सह विचार विभाग प्रमुख, स्वदेशी जागरण मंच दिल्ली प्रांत 

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