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वेल्ट हंगर हिल्फ़ द्वारा ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर गैर-जिम्मेदार और शरारत पूर्ण रिपोर्ट

16-10-2022

प्रेस विज्ञप्ति
वेल्ट हंगर हिल्फ़ द्वारा ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर गैर-जिम्मेदार और शरारत पूर्ण रिपोर्ट

15 अक्टूबर 2022 को जर्मनी की एक गैरसरकारी संस्था ‘वेल्ट हंगर हिल्फे’ ने एक बार फिर भारत को बदनाम करने हेतु अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना तरीके से तैयार विश्व भूख सूचकांक की रैकिंग जारी की है, जिसमें 121 देशों की सूची में भारत को 107वें स्थान पर रखा गया है। इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में 116 मुल्कों की सूची में भारत को 101वें स्थान पर रखा गया था। वास्तविकता से कहीं दूर यह रिपोर्ट आंकड़ों की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि विश्लेषण और क्रियाविधी यानि मैथोडलॉजी की दृष्टि से भी दोषपूर्ण ही नहीं हास्यास्पद भी है। अकादमिए उपयोग की दृष्टि से पूर्णतः अनुपयोगी यह रिपोर्ट वास्तव में एक राजनीतिक स्टंटबाजी का एक हिस्सा है, जो भारत समेत कुछ विकासशील देशों और उनके नेतृत्व को बदनाम करने का एक प्रयास लगता है। पिछले वर्ष अक्टूबर में जब ऐसी रिपोर्ट जारी हुई थी तो भारत की ओर से उसमें इस्तेमाल किए गए आंकड़ों और क्रियाविधि पर खासा विरोध दर्ज कराया गया था और तब विश्व खाद्य संगठन (एफएओ) ने यह कहा था कि इन त्रुटियों को ठीक किया जाएगा, लेकिन अब चूंकि दोबारा से उन्हीं गलत आंकड़ों और क्रियाविधि को इस्तेमाल करते हुए इस वर्ष भी रिपोर्ट जारी करने से इस संस्था की बदनीयती स्पष्ट हो रही है।

आज जब दुनिया के कई मुल्क अपनी खाद्य सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं, भारत दुनिया के सामने एक मिसाल बनकर उभरा है। महामारी काल में जब सभी आर्थिक गतिविधियां ठप्प हो गई थीं और गरीबों, मजदूरों और वंचितों के आय के स्रोत समाप्त हो रहे थे, ऐसे में भारत सरकार द्वारा 80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन उपलब्ध कराने की योजना और उसका सफल निष्पादन दुनिया के सामने एक मिसाल है। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर भ्रामक प्रचार में जुटी हैं, लेकिन धरातल पर एक अलग चित्र उभर रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

गौरतलब है कि वेल्ट हंगर हिल्फे, विश्व भूख सूचकांक तैयार करने के लिए खाद्य उपभोग के स्वयं कोई आंकड़ें एकत्र नहीं करती। और केवल विश्व खाद्य संगठन (एफएओ) द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों को ही इसे उपयोग करना होता है। पूर्व में खाद्य संगठन भारत की एक संस्था राष्ट्रीय पोषण निगरानी बोर्ड पर निर्भर करती रही है, लेकिन बोर्ड का कहना है कि उसने ग्रामीण क्षेत्रों में 2011 और शहरी क्षेत्रों में 2016 के बाद खाद्य पदार्थों के उपभोग का कोई सर्वेक्षण नहीं किया है। ऐसा लगता है कि वेल्ट हंगर हिल्फे ने बोर्ड के आंकड़ों की जगह किसी निजी संस्था के कथित ‘गैलोप’ सर्वेक्षण, जिसका कोई सैद्धांतिक औचित्य भी नहीं, का उपयोग किया है।

भारत सरकार ने भी एजेंसी द्वारा युक्त इस ‘गैलोप’ सर्वे की कार्य पद्धति और उसमें पूछे गए प्रश्नों के ऊपर सवाल उठाया है। सरकार द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि एजेंसी द्वारा जारी रिपोर्ट में सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा हेतु किए गए प्रयासों को समाहित नहीं किया गया। गौरतलब है कि भारत सरकार द्वारा देश में विश्व का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसमें न केवल पिछले 28 महीनों से 80 करोड़ देशवासियों को मुफ्त खाद्यान्न एवं दाल का वितरण किया जा रहा है बल्कि आंगनबाड़ी सेवाओं के तहत भी लगभग 7.71 करोड़ बच्चों और 1.78 करोड़ गर्भवती महिलाओं एवं स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पोषण प्रदान किया गया है। 14 लाख आंगनबाड़ियों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताआंे और सहायिकाओं द्वारा पूरक पोषाहार का वितरण किया गया और लाभार्थियों को हर पखवाड़े उनके घरों तक राशन पहुंचाया गया। 1.5 करोड़ महिलाओं को उनके पहले बच्चे के जन्म पर गर्भावास्था और प्रसव के बाद की अवधि के दौरान पारिश्रमिक सहायता एवं पौष्टिक भोजन के लिए प्रत्येक को 5000 रूपए प्रदान किए गए।

उल्लेखनीय है कि गेहूं के वाणिज्यिक निर्यात पर प्रतिबंध के बावजूद भारत सरकार द्वारा खाद्यान्न की आवश्यकता वाले देशों की सहायता के लिए गेहूं का निर्यात जारी रखा गया है।  सरकार का मानना ​​है कि भारत किसी भी जरूरतमंद देश को खाद्य सामग्री की आपूर्ति करने के लिए तैयार है।  इस वित्तीय वर्ष में 22 जून तक अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, इजरायल, इंडोनेशिया, मलेशिया, नेपाल, ओमान, फिलीपींस, कतर, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, सूडान, स्विटजरलैंड, थाइलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और यमन समेत कई देशों को 18 लाख टन गेहूं भेजा जा चुका है।यह मात्रा पिछले साल के निर्यात से लगभग चार गुना अधिक थी। हमें यह समझना होगा कि गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का मतलब यह नहीं है कि भारत में खाद्यान्न की कमी है।

आज भारत खाद्यान्न और अन्य खाद्य उत्पादों में न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि यह एक शुद्ध निर्यातक देश भी है। भारत में वर्ष 2021-22 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 3160 लाख टन है यानि 227 किलो प्रतिव्यक्ति।

भारत में खाद्यान्न एवं अन्य खाद्य पदार्थों जैसे दूध, अंड़े, सब्जी, फल, मछली आदि सभी का उत्पादन बढ़ा है। पिछले दो दशकों को देखें तो पता चलता है कि दूध का कुल उत्पादन वर्ष 2000 में मात्र 777 लाख टन था, जो 2021-22 तक बढ़ता हुआ 2100 लाख टन तक पहुंच चुका है और हमारा दैनिक प्रति व्यक्ति दूध उत्पादन 413 ग्राम तक पहुंच चुका है। अंडों का कुल उत्पादन 2020-21 में 12211 करोड़ प्रति वर्ष रहा, जो वर्ष 2000 में मात्र 3050 करोड़ ही था। यानि अब अंड़ों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 88 तक पहुंच चुकी है। सब्जियों, फलों, मीट ही नहीं दालों और खाद्य तेलों एवं अन्य खाद्य पदार्थों की उपलब्धता अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। यही नहीं, जिन देषों को भारत से पीछे दिखाया गया है, इन खाद्य पदार्थों की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता वहां कहीं कम है।

एक अन्य दिलचस्प सवाल यह है कि क्या वैश्विक भूख सूचकांक में इस्तेमाल होने वाले संकेतक जैसे बच्चों में ठिगनापन और पतलापन वास्तव में भूख को मापते हैं? यदि ये संकेतक भूख के परिणाम हैं, तो अमीर लोगों को भोजन तक पहुंच की कोई समस्या नहीं है, उनके बच्चे ठिगने और पतले (स्टंटिंड और वेस्टिड) क्यों होने चाहिए। 16 राज्यों के 2016 के राष्ट्रीय पोषण संस्थान के आँकडों से पता चलता है कि यहां तक कि अमीर लोगों (कारों, घरों के मालिक) में भी क्रमशः 17.6 फीसदी और 13.6 फीसदी बच्चे स्टंटिंग और वेस्टिंग से पीड़ित थे। और, अधिक वजन और मोटापे (भोजन तक पर्याप्त पहुंच) वाली माताओं के स्टंटिंग (22 फीसदी) और वेस्टिंग (11.8 फीसदी) वाले बच्चे होते हैं। इस रपट के अनुसार भी 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर भी घटी है, साथ ही साथ 5 वर्ष की आयु से कम के बच्चों में ठिगनेपन की प्रवृत्ति भी कम हुई है। समझना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों म अपना एक एजेंडा हो ेसकता है, इसलिए खाद्य सुरक्षा के मामले में अपने मार्ग पर चलते रहना होगा। गौरतलब है कि वर्ष 1998-2002 के बीच अपने आयु से ठिगने बच्चों का अनुपात 54.2 प्रतिशत से घटता हुआ वर्ष 2016-2020 के बीच में मात्र 34.7 प्रतिशत ही रह गया है। यानि अब बच्चे पहले से ज्यादा लंबे हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि बच्चे पहले से ज्यादा लंबे हो रहे हैं, इसलिए बढ़ती लम्बाई के चलते उनमें पतलापन आ रहा है, जो कि अच्छा संकेत है। ऐसे में भुखमरी मापने की कार्यपद्धति में दोष दिखाई देता है।

समय की मांग है कि इस प्रकार की झूठी रपटों का ठीक प्रकार से पर्दाफाष किया जाये और विकासषील देष आंकड़ों की बाजीगरी से मुक्त होकर, जमीनी हकीकत प्रस्तुत करें।

स्वदेशी जागरण मंच एक बार फिर इस रिपोर्ट के खिलाफ अपनी नाराज़गी व्यक्त करता है और सरकार से इस रिपोर्ट को खारिज करने और उस संगठन के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का आग्रह करता है, जो भारत की खाद्य सुरक्षा के बारे में झूठ फैलाकर भारत को बदनाम कर रहा है।

डॉ अश्विनी महाजन
राष्ट्रीय सह संयोजक

https://www.abplive.com/news/india/swadeshi-jagran-manch-terms-global-hunger-index-2022-report-irresponsible-and-mischievous-demands-action-against-publishers-2239927

https://hindi.asianetnews.com/national-news/india-poor-position-in-global-hunger-index-2022-swadeshi-jagran-manch-opposes-report-dvg-rjunx5

https://hindi.theprint.in/india/वैश्विक-भूख-सूचकांक-रिपो/410955/

https://bhasha.ptinews.com/news/national/422030.html

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