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ज्योतिबा फुले एवं डॉ. अंबेडकरः शिक्षा के जरिए से लाई सामाजिक क्रांति

महात्मा ज्योतिबा फुले एवं डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने स्वयं शिक्षित होकर शिक्षा के माध्यम सामाजिक क्रांति लाने का प्रयास किया। - डॉ. देवेन्द्र विश्वकर्मा

 

11 अप्रैल 1827 को पुणे (सतारा) महाराष्ट्र में ज्योतिबा गोविंदराव फुले का जन्म हुआ। जब वह एक वर्ष के थे, तभी उनकी माता का देहांत हो गया। उन्होंने अपने जीवन काल में शिक्षा, सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया और 28 नवम्बर 1890 को इस संसार से चले गये उसके बाद अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में मध्यप्रदेश के महु में हुआ और बचपन में ही इनकी माता का भी देहान्त हो गया। अपने जीवनकाल में खूब पढ़े और शिक्षा एवं सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया और वह भी 06 दिसम्बर 1956 को गहरी नींद में सो गये। ज्योतिबा की जलाई हुई जोत को मशाल बना गये और इस मशाल को न बुझने देना यह हर किसी को बता गये। अब हमारा भी दायित्व बनता है कि शिक्षा से वंचित न रहे कोई।

ज्योतिबा फुले ने बच्चों की शिक्षा पर विशेष बल दिया और 1848 में पाठशाला खोली तथा इसमें पढ़ाने के लिए प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले को प्रेरित किया जिसका परिणाम यह रहा कि उन पर गोबर फेंका गया और आखिरकार उनके पिता द्वारा उनको घर से बाहर निकाला गया। इस सब के बावजूद भी उन्होनें शिक्षा पर बल देते हुए पाठशालायें खोली। बाबा साहेब ने कहा कि ‘‘विद्यालयों की स्थापना बच्चों को बारहखड़ी पढ़ाने के लिए नही बल्कि उन्हें सुसंस्कृत कर समाज हित उपयोगी बनाने के लिए होनी चाहिए। उन्होनें विद्यालय को समाज का लघुरूप कहा है। इसीलिए उन्होंने विद्यालय में सामूहिक शिक्षा पद्धति पर बल दिया तथा विद्यालय में स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व के वातावरण पर बल दिया। उन्होनें कहा कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को आत्मानुभूति व आत्मोनति करना व नैतिक विकास हो। इस सबके लिए सामाजिक आदर्शों, मूल्यों व नैतिकता से पूर्ण उच्च सामाजिक पर्यावरण की आवश्यकता है। दोनों ही अपने आपको एक आदर्श विद्यार्थी की कहानी कहते हुए प्रतीत होते तथा विपरीत परिस्थितियों में जिज्ञासु बने रहना और लक्ष्य पर अपने आप को केन्द्रित किये हुये थे।

उच्च शिक्षा के लिए भी महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा 1882 में हंटर कमीशन के समक्ष लिखित रूप से यह कहा कि गणित, विज्ञान, कृषि आदि के बारे शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। 1851 विद्यालयों की शुरूआत की और 24 सितम्बर 1878 में सत्यशोधक समाज द्वारा शिक्षा एवं सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया। डॉ. अम्बेडकर ने विश्वविद्यालयों में स्नातक और स्नातकोतर संकायों के अलग-अलग रखने का विरोध किया। वे चाहते थे कि दोनो संकाय एकीकृत होकर कार्य करें। उच्च शिक्षा में शिक्षण एवं शोध दोनों का ही समावेश होता है। स्नातक स्तर पर शिक्षण का कार्य सम्पन्न हो एवं स्नातकोत्तर स्तर पर शोध को प्राथमिकता दिया जाना चाहिए। उच्च शिक्षा के संबंध में उनका मत था कि शिक्षकों को पाठ्यक्रम बनाने की स्वतंत्रता दी जाये तथा वे विद्यार्थियों का मूल्यांकन स्वतंत्र रूप से करें। विश्वविद्यालय एक निश्चित परिधि में परीक्षा संचालन या उपाधि वितरण के लिए नही होते बल्कि शिक्षा और शोध के केन्द्र हो ऐसा उनका मानना था। साथ ही वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा पर बल दिया और कहा कि शिक्षा मातृभाषा में हो इस पर उन्होने बल दिया। उनके विश्वविद्यालय के शिक्षक जॉन डी वी गहन प्रभाव था इसके चलते सन 1945 में ‘‘पीपुल्स एज्यूकेशन सोसायटी‘‘ की स्थापना की जिसके अंतर्गत अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की जिसमें सिद्धार्थ कॉलेज एवं मिलिंद कॉलेज प्रमुख है।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने स्त्री शिक्षा पर बल दिया। इसके लिए उन्होनें कहा कि समाज में स्त्री और पुरूष दोनां को शिक्षा के समान अवसर मिलने चाहिए। इसके चलते उन्होनें अपनी पत्नि सावित्री बाई फुले को पढ़ाया और उनको अन्य स्त्रियों और बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया। 1854 में विधवा आश्रम की स्थापना की विधवा स्त्रियों के बाल मुंडवाने की प्रथा का विरोध किया, बाल विवाह आदि कुप्रथाओं का विरोध किया। स्त्री शिक्षा पर अम्बेडकर के स्पष्ट विचार थे। उन्होनें स्पष्ट कहा कि किसी समाज में उन्नति देखनी हो तो उस समाज में स्त्री शिक्षा को देखो। इसलिए उन्होनें प्रत्येक वर्ग में स्त्रियों को पुरूषां के समान शिक्षा दिये जाने पर जोर दिया। 4 अगस्त 1918 को लिखे अपने पत्र में अम्बेडकर कहते है कि ’’यदि हम लोग अपने लड़कों की शिक्षा के साथ लड़कियों की शिक्षा पर भी ध्यान दे तो हमारे समाज की तीव्र गति से उन्नति होगी।’’ उन्होंने अपनी बहन को पढ़ाने पर जोर दिया साथ ही अपनी पत्नी रमाबाई को पढ़ाया। दोनों ने ही इस बदलाव की शुरूआत अपने घर से की। दोनों महामानव अपनी-अपनी सदी में अपनी विचारधारा में मानवीय दृष्टिकोण के धनी रहे है और अपने वैज्ञानिक, दृष्टिकोण, तर्कशीलता से पाखण्ड और अंधविश्वास से दूर करने का प्रयास किया है। मनुष्य को समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और देश प्रेम की भावना का जन्म हो इस प्रकार की शिक्षा पर बल दिया था। अस्पृश्यता, जातिवाद, रंगभेद, बाल विवाह जैसे व्यापक कुप्रथाओं का विरोध किया एवं विधवा विवाह का समर्थन किया जिसके चलते 1888 में मुम्बई में विशाल सभा में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत को ‘‘महात्मा‘‘ की उपाधि प्रदान की गई। इसके कार्य को आगे बढ़ाते हुए अम्बेडकर ने बालिका शिक्षा, मातृत्व अवकाश, हिन्दु कोड बिल और देश में व्यापक कुप्रथाओं को खत्म करने पर बल दिया और समता, समरसता मूलक शिक्षा पर बल दिया। दोनों की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं था।

शिक्षा नीति 2020ः शिक्षा नीति 2020 में ज्योतिबा फुले एवं अम्बेडकर की विचाराधारा को अपनाने का प्रयास किया गया है। आज हर विद्यार्थी को मातृभाषा में शिक्षा दिये जाने पर बल दिया गया है एवं स्नातकोतर स्तर पर शोध को प्राथमिकता दी जा रही है। लेकिन आज भी हमारी सरकारे शिक्षा की विषमता को दूर करने में विफल रही है। शिक्षा अधिक खर्चीली होने के कारण सिर्फ पैसे वाले की शिक्षा होती जा रही है और पैसे के बल पर उपाधि एवं डिग्रियां खरीदी जा रही है। इसलिए हम कह सकते है कि ज्योतिबा फुले एवं अम्बेडकर की जो विचारधारा थी ‘अच्छी और सस्ती शिक्षा दी जाए’ को आघात होता जा रहा है, जिसका परिणाम है कि विद्यार्थियों में लगातार मानव मूल्यों का पतन होता जा रहा है।

19वीं सदी में ज्योतिबा गोविंदराव फुले का आना और थोड़ी सी पढ़ाई के बाद भी शिक्षा की ज्योति जलाना और 20वीं सदी में अम्बेडकर आना 32 डिग्रियां एवं 09 भाषाओं का ज्ञाता ने साबित कर दिया की असंभव कुछ भी नहीं यदि आप अपने लक्ष्य पर अडिग है, और बदले की भावना के बिना यदि आप अच्छा कर्म करते है तो निश्चय ही जनमानस आप का सम्मान सदैव करता रहेगा। ज्योतिबा फुले एवं अम्बेडकर का भारतीय समाज ऋणी रहेगा। मुख्य रूप से शैक्षिक योगदान की बात की जाये तो ज्योतिबा फुले के द्वारा सत्य शोधक समाज की स्थापना एवं 1873 की उनकी पुस्तक ‘‘गुलामगिरी‘‘ एवं अम्बेडकर द्वारा 1920 में साप्ताहिक मूकनायक का प्रकाशन व बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना द्वारा उन्होनें जो जन्म से लेकर मृत्यु उपरान्त तक असमानता एवं अस्पृश्यता का सामना किया लेकिन फिर भी समतामूलक शिक्षा व्यवस्था की बात रख कर यह साबित कर दिया कि दोनों महामानव मानवता के गुण के साथ आगे बढ़ाना चाहते थे। महात्मा ज्योतिबा फुले एवं डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने स्वयं शिक्षित होकर शिक्षा के माध्यम सामाजिक क्रांति लाने का प्रयास किया।   

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