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राजद्रोह नहीं, राष्ट्रद्रोह की हो पहचान

Admin August 18, 2021

भारत की जो भी सांस्कृतिक देन है उसका मज़ाक उड़ाया जा रहा है और सरकार उसको सहन कर रही है। यह कही न कही रोकने की जरूरत है। इसलिए ये सभी बातें राजद्रोह के प्रावधान के दायरे में लानी चाहिए और उसको राष्ट्रद्रोह माना जाना चाहिए। — अनिल जवलेकर

 

राजद्रोह कानून आजकल चर्चा में है। हमारी दिक्कत यह है कि हम स्वतंत्रता के 70 सालों बाद भी अंग्रेजों के दिमाग से सोचते है और उनकी दृष्टि लेकर ही चलते है। हमारे पूर्वजों ने राष्ट्र एक सांस्कृतिक सीमा के तहत परिभाषित किया था और संस्कृति का भ्रष्ट होना ही राष्ट्र के अवनति का कारण बताया था। लेकिन आज राज्य और राष्ट्र में भेद नहीं किया जाता और शायद इसलिए राजद्रोह एक विद्यमान सरकार का विरोध मात्र रह गया है। हकीकत यह है कि सरकार और राष्ट्र अलग है और राजद्रोह से हटकर हमें राष्ट्र और राष्ट्रद्रोह को समझने की जरूरत है, ताकि कानून में उसे ठीक से परिभाषित कर सके। 

सरकार राष्ट्र नहीं है 

राष्ट्र और सरकार को एक समझने की गलती आजकल सभी कर बैठे है इसलिए सरकार का विरोध राजद्रोह या राष्ट्रद्रोह माना जाता है। यह निष्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कोई सरकार राष्ट्र नहीं होती, न ही सभी सरकारें राष्ट्रीयता का प्रतिनिधित्व करती है। सरकार अपनी नीति और उसकी अमल करने की कार्यषैली से पहचानी जाती है।  जैसे की 1975 में अपनी सरकार बचाने के लिए आपातकाल लगाने वाली सरकार राष्ट्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी और इसलिए उसका विरोध द्रोह नहीं कहा गया। एक जमाना था जब राजा हुआ करता था और राजा का विरोध करना राजद्रोह कहलाता था। ब्रिटिष राज भी ऐसा ही था, जिसका विरोध करने वालों को द्रोही माना जाता था। अंग्रेजों की कानून व्यवस्था आज भी हम संभाले हुए है और उनकी ही राज्य और राजद्रोह की परिभाषा मानकर चल रहे है। सरकार और उसकी नीति का विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है और सभी को संवैधानिक तरीके से सरकार का विरोध करने का अधिकार जरूरी है। लेकिन सरकार को असंवैधानिक तरीके से हटाने की साजिष राजद्रोह कहा जा सकता है। यहाँ यह बात ध्यान देनी होगी कि सरकार राष्ट्र नहीं है और सिर्फ सरकार का विरोध राष्ट्रद्रोह नहीं है। राष्ट्र और राष्ट्रद्रोह को इसलिए समझना जरूरी है। 

संस्कृति राष्ट्र बनाती है 

स्वदेषी जागरण मंच और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेषा से यह बात कहता आया है की किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी संस्कृति और माने हुए सांस्कृतिक चिन्हों द्वारा होती है। जैसे की धर्म ग्रंथ, श्री राम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, जगत गुरु शंकराचार्य जैसे अवतारित महापुरुष, मंदिर, ऋषि परंपरा, देवी देवता, पुजा अर्चना पद्धति आदि तथा रामायण, महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रंथ भारतीय संस्कृति की पहचान बने हुए है। वैसे ही वेदों द्वारा बताया गया जीवन दर्षन और उससे निकली हुई सभी जीव प्राणी और सृष्टि के संबंध का आधार बनी हुई विचारधारा भारतीय संस्कृति की धरोहर है और यह सांस्कृतिक विषिष्टता भारत को राष्ट्र बनाती है। यह ठीक है कि आधुनिक दुनिया ने बलपूर्वक सांस्कृतिक राष्ट्र को सहूलियत के लिए भौगोलिक सीमा में बांध दिया है। लेकिन सांस्कृतिक राष्ट्र आज भी जीवित है और उसको अवमानित करने वाली शक्तियों कों राष्ट्र विरोधी मानना और उस अवमानना को राष्ट्रद्रोह कायदे के दायरे में लाना आवष्यक है।  

राजद्रोह का प्रावधान जरूरी 

यह धारणा बनती जा रही है कि यह राजद्रोह का प्रावधान आज के जमाने में जरूरी नहीं है। लेकिन यह बात भूली नहीं जा सकती कि दुनिया अभी भी बदली नहीं है। एक देष दूसरे देष को कमजोर करने और उसको अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है और यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक हिस्सा सदियों से रहा है।  चीन की हरकतें इस बात का सुबूत कही जा सकती है। सीआईए केजीबी वगैरे की बाते हम सालों से सुनते आ रहे है। हमारा पड़ोसी और उसकी खुफिया एजेन्सी भारत को नीचा दिखाने और उसका नुकसान करने में लगी हुई रहती है। और यह भी बात छुपी नहीं है की सरकार गिराने तथा देष को सांस्कृतिक दृष्टि से कमजोर करने के षडयंत्र रचे जाते रहे है। कई भारतीय नागरिक छोटी-छोटी लालच में आकर या साजिष से प्रेरित भ्रामक वैचारिक नेरेटिव के तहत ऐसी बाहरी देषों की एजेन्सी के चंगुल में फँसते है और भारत और भारतीय समाज को बदनाम करने तथा समाज को तोड़ने हेतु हिंसा फैलाने के साजिष में शामिल होते है। इसलिए राजद्रोह का यह प्रावधान जरूरी भी है और उसका कड़ाई से पालन होना भी जरूरी है। 

राजद्रोह की परिभाषा सीमित है 

अंग्रेजों ने दी हुई और भारतीय कानून ने स्वीकारी हुई राजद्रोह की परिभाषा सिर्फ सरकार और शासन व्यवस्था के बारे में सोचती है और उसके विरोध में की हुई साजिष को राजद्रोह मानती है। भारतीय दंड संहिता 121 से 130 तक राज्य (स्टेट्स) के विरोध में किए गए अपराध आते है जिसमें सरकार के खिलाफ षडयंत्र करना, युद्ध करने के आषय से शस्त्र आदि जमा करना, राष्ट्रपति, राज्यपाल पर हमला करना, राजद्रोह करना आदि शामिल है। जिसमें राजद्रोह का कलम 124ए अभी चर्चा में है जिसमें जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृष्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति  घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, अप्रीति प्रदीप्त करेगा या प्रदीप्त करने का प्रयत्न करेगा तो उसको सजा का प्रावधान है। यह प्रावधान बहुत ही सीमित कहा जायेगा क्योंकि यह सिर्फ सरकार के विरोध की बात करता है। 

राजद्रोह के साथ राष्ट्रद्रोह का प्रावधान भी जरूरी 

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बहुत ही एक तरफा रहा है। इस लोकतंत्र पर राजनीति हावी होने की वजह से यहाँ का मुख्य सांस्कृतिक प्रवाह जिसको हिन्दू संस्कृति भी कहा जाता है, को अपमानित किया जाता रहा है। भारतीय हिन्दू राजनीति में कमजोर रहने तथा जाति पंथों में बटा होने के कारण लोकतंत्र के चुनाओगे भी असर नहीं दिखा पाता। इसलिए उसके अपमानित होने को नजरंदाज कर दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय साजिष के तहत भी हिन्दू संस्कृति को अपमानित करने हेतु विचारधाराएँ प्रवाहित की जाती रही है। इसलिए यह जरूरी है कि राजद्रोह के प्रावधान का विस्तार किया जाये और राष्ट्रद्रोह की कल्पना को कानून का आकार दिया जाये। 

सांस्कृतिक राष्ट्र की अवमानना को राष्ट्रद्रोह माना जाये

जैसे कि पहले कहा गया है कि सरकार राष्ट्र नहीं होती, न ही सही माने में राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। संस्कृति से राष्ट्र बनता है। इसलिए सांस्कृतिक चिन्हों और प्रतीकों की अवमानना करने का अधिकार किसी को दिया नहीं जा सकता। आजकल तो एक साजिष के तहत इसका अपमान किया जा रहा है। देवी देवता के चित्रों को अष्लील रूप देना और उनका अपमान करना तो आम बात हो गई है। भारत की जो भी सांस्कृतिक देन है उसका मज़ाक उड़ाया जा रहा है और सरकार उसको सहन कर रही है। यह कही न कही रोकने की जरूरत है। इसलिए ये सभी बातें राजद्रोह के प्रावधान के दायरे में लानी चाहिए और उसको राष्ट्रद्रोह माना जाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि धर्म तथा परंपरा का सुधार चाहने वाला भी राष्ट्रद्रोही कहलाए। सुधारक और अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत अवमानना अलग-अलग है और उसका फर्क समझने में भारतीय समाज तथा न्याय व्यवस्था परिपक्व है। 

सरकार के खिलाफ होने वाली साजिश जितनी खतरनाक है उससे ज़्यादा खतरनाक सांस्कृतिक अवमानना की साजिश है यह बात समझ लेना बहुत जरूरी है।            

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