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प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना: इरादा खेत से सीधे बाजार का

ग्रामीण सड़कों का विस्तार होने से सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर असर पड़ा है। बच्चों और खासकर बालिकाओं की शिक्षा का प्रसार हुआ है। सड़कों के अलावा अस्पताल और रेलवे स्टेशनों और बाजारों तक पहुंच बढ़ी है। व्यापारियों की आवक बढ़ने से उपभोक्ता सामग्री का उपभोग भी बढ़ा है। स्थानीय कौशल के उत्पादों के कारण बाहरी पूंजी निवेश में भी वृद्धि हुई है। — शिवनंदन लाल

 

सरजमीने हिंद पर आवामे आलम के ‘फिराक’/काफिले बसते गए, हिन्दोस्तां बनता गया। बहुत ही थोड़े शब्दों में फिराक गोरखपुरी ने भारत निर्माण, भारत के विस्तार की कहानी बयान कर दी है। ये काफिले, ये बस्तियां, ये गांव बस नहीं पाते यदि इन्हें रास्ते न मिले होते। भारत के विस्तार की असली कहानी इन्हीं रास्तों से होकर निकलती है जो देश के दूर-दराज तक जाती है। इन्हीं रास्तों से हम देश की अंतरात्मा तक प्रवेश करते हैं और अब इन्हीं रास्तों से निकलकर लोग गांव से शहरों में आ रहे हैं। यानी संपर्क में रहना इंसान की फितरत है तो सड़कें उसका स्त्रोत।

सड़कों के जरिए एक दूसरे को करीब लाने में मदद मिली है। इससे माल सेवा और रोजगार के नए बाजार खुले हैं। आज दुनिया एक दूसरे के करीब आने को बेताब है। हमारा अपना अनुभव है कि जो बेहतर तरीके से जुड़ा है वह विकसित और संपन्न है, जिसके संपर्क सूत्र ठीक से नहीं जुड़ पाए, वह इस दौड़ में पीछे रह गया है। जो गांव शहरों में तब्दील हो रहे हैं उसकी सबसे बड़ी वजह है, उनकी कनेक्टिविटी। रेल लाइन, टेलीफोन, बिजली, पानी, इंटरनेट और सबसे बढ़कर सड़क, इस संपर्क के बुनियादी मापदंड है। क्योंकि उनके साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व नागरिक सुविधाएं जुड़ी हैं।

भारत में विकास के लिए उचित सड़क नेटवर्क की जरूरत को आजादी के पहले ही समझ लिया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भविष्य की जरूरतों को देखते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने अलग-अलग प्रांतों के चीफ इंजीनियरों का एक सम्मेलन सन् 1943 में नागपुर में बुलाया था। आधुनिक भारत में सड़कों के विकास का यह पहला समन्वित कार्यक्रम था। इसके अंतर्गत देश की सड़कों को चार वर्गों में बांटा गया - पहला, राष्ट्रीय राजमार्ग, दूसरा राज्य राजमार्ग, तीसरा मुख्य जिला सड़के और चैथा ग्रामीण सड़कें। इनमें बाद की दो श्रेणियां ग्रामीण सड़क व्यवस्था से जुड़ी है। सड़कों को लेकर नागपुर के बाद मुंबई और लखनऊ प्लान आए। देश का कुल सड़क नेटवर्क इस वक्त लगभग 50 लाख किमी. के आसपास है, जिनमें ग्रामीण क्षेत्र के 30 लाख किमी. के करीब है। सन 2000 तक देश के 1500 से ज्यादा आबादी वाले गांवों को सड़कों से जोड़ दिया गया था। 1000 से 1500 के बीच की आबादी वाले 86 प्रतिशत गांव सड़क मार्ग से जोड़ने का लक्ष्य प्राप्त करने की स्थिति में थे। इसके बाद सरकारी लक्ष्यों में निरंतर सुधार होता गया। जनवरी 2000 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय विकास की भारी जरूरतों और गांव से शहरों की ओर होते तेज पलायन को देखते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ही प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का जन्म हुआ। जब यह योजना शुरू हुई उस समय देश की लगभग 40 प्रतिशत बस्तियां बारहमासी सड़कों से नहीं जुड़ी हुई थी। यानी देश की 75 प्रतिशत आबादी का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से सीधा संपर्क नहीं था। जो थोड़ी बहुत सड़कें थी भी, तो उनका रखरखाव का इंतजाम नहीं के बराबर था। स्थिति को सुधारने के लिए 25 दिसंबर 2000 को केंद्र द्वारा प्रायोजित प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना शुरू हुई। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के अलावा अन्य सडकंे राज्य सूची का विषय है, परंतु यह योजना एक विशेष हस्तक्षेप के रूप में असंबद्ध बस्तियों को ग्रामीण संपर्क नेटवर्क प्रदान कर ग्रामीण क्षेत्रों का सामाजिक, आर्थिक सशक्तिकरण करने के उद्देश्य से शुरू की गई। योजना के अंतर्गत जनसंख्या का आकार मैदानी क्षेत्रों में 500 और उत्तरी पूर्वी राज्यों हिमालयी राज्यों मरुस्थलीय और जनजाति क्षेत्रों में 250 निर्धारित किया गया।

इरादा खेत से सीधे बाजार तक सड़क संपर्क सुनिश्चित करने का है। ग्रामीण सड़क विकास विजन 2025 में ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों से न जुड़ी बसावटों को आवश्यक पुलिया, ड्रेनेज की मदद से बारहमासी सड़कों से जोड़ना था। इस कार्यक्रम के लिए इकाई राजस्व गांव अथवा पंचायत न होकर एक बसावट या बस्ती है। ग्राम, ढाढ़ी, पुरवा मजरा आदि।

ग्रामीण सड़कों का विस्तार होने से सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर असर पड़ा है। बच्चों और खासकर बालिकाओं की शिक्षा का प्रसार हुआ है। सड़कों के अलावा अस्पताल और रेलवे स्टेशनों और बाजारों तक पहुंच बढ़ी है। व्यापारियों की आवक बढ़ने से उपभोक्ता सामग्री का उपभोग भी बढ़ा है। स्थानीय कौशल के उत्पादों के कारण बाहरी पूंजी निवेश में भी वृद्धि हुई है। चूंकि सड़कों का विस्तार व्यक्तियों को जोड़ता है। ग्राहकों के पास चुनने का विकल्प होता है तो उत्पादक के पास अपना माल बाहर ले जाकर बेचने के मौके भी होते हैं। सड़कों के बनने से सबसे बड़ा प्रभाव परिवहन लागत में कमी के रूप में आता है। इससे वस्तुओं के दाम में कमी तो आती ही है, सब्जियां, फल, दूध, दही, दूसरे अन्य कृषि उत्पाद, डेरी उत्पाद शहरों को मिलते हैं। सड़कंे अगर पलायन को बढ़ावा देती है तो यही सड़कंे पलायन को रोक भी सकती है। सीधी सी बात है कि अपने घर गांव में ही रोजगार उपलब्ध हो तो कोई बाहर क्यों जाएगा?

इस योजना का सर्वाधिक लाभ गांवों को होने का अनुमान है। गांव के छोटे किसान अब शहरों से सीधे जुड़ कर अपनी फसलों फसलें बेच सकेंगे तथा फसलों के लिए उचित दाम पर आवश्यक खाद बीज भी प्राप्त करेंगे। इस योजना से ग्रामीण स्तर पर ही रोजगार सृजित होने की प्रबल संभावनाएं हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत रेल क्रॉसिंग और तिराहों पर ओवरब्रिज बनाने का काम भी शामिल है, इससे भी लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। भारत सरकार ने ‘मेरी सड़क’ नाम से एक सरकारी ऐप जारी किया है। व्यवस्था यह है कि अगर आपके गांव की सड़क अभी तक नहीं बनी है या किसी कारण से खराब हो गई है तो आप इस ऐप के जरिए सीधे प्रधानमंत्री से शिकायत कर सकते हैं।

बेशक प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर संबंधित योजना बनी है, पर ग्रामीण सड़कों का निर्माण कई तरह के अन्य कार्यक्रमों के जरिए भी होता है। इसमें महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना, एमपी लैंड, आपदा राहत तथा अन्य स्थानीय कार्यक्रम भी प्रमुख रूप से जुड़े हैं। इनमें स्थानीय एजेंसियों की भूमिका ज्यादा होती है। हालांकि इसके लिए राष्ट्रीय राज्य स्तरीय और स्थानीय व्यवस्था बनाई गई है फिर भी इसके समन्वय को लेकर समुदायों को साथ लेकर चलने की जरूरत है। स्थानीय स्तर पर पंचायतों की भूमिका पढ़ाना भी इसके लिए लाभप्रद होगा।

इस बीच केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज्यमंत्री ने राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में बताया है कि इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य असंबद्ध बस्तियों को सड़क नेटवर्क प्रदान करना है। योजना के प्रारंभ होने से अब तक लगभग डेढ़ लाख बस्तियों को आपस में जोड़ने के लिए सवा छह लाख किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया जा चुका है। इन सड़कों में लगभग सवा दो लाख किलोमीटर से अधिक लंबाई की सड़कें 10 साल पुरानी है जबकि डेढ़ लाख किलोमीटर सड़कें 5 साल तक पुरानी है। यानी कुल मिलाकर 60 प्रतिशत सड़कों के उचित रखरखाव की जरूरत है। मंत्रालय के एक अनुमान के अनुसार योजना के तहत निर्मित सड़कों के रखरखाव के लिए वर्ष 2021-22 से प्रारंभ होकर अगले 5 वर्षों के दौरान 75 हजार से लेकर 80 हजार करोड रुपए खर्च करने की आवश्यकता होगी। राज्यों द्वारा चालू वित्त वर्ष में 11 हजार 500 करोड़ रुपए खर्च करने की आवश्यकता है और वित्त वर्ष 2024-25 तक आवश्यक राशि बढ़कर 19 हजार करोड ़रूपये होने का अनुमान है।

लेखक आकाशवाणी में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी है।

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