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सिखों के इतिहास का सुनहरा पन्ना है छोटे साहिबजादों का बलिदान

Admin January 19, 2022

‘वीर बाल दिवस’ बच्चों की बहादुरी के लिए एक श्रद्धांजलि है, जो गुरु गोविंद सिंह के दो सबसे छोटे बेटे साहिबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह को समर्पित है। —  स्वदेशी संवाद

 

देश अब हर साल 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाएगा। गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाशोत्सव के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चार साहिबजादां को समर्पित वीर बाल दिवस मनाने के ऐलान का देश में चौतरफा स्वागत हो रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं कि सिख धर्म के इतिहास में 26 दिसंबर का क्या महत्व है।

‘वीर बाल दिवस’ बच्चों की बहादुरी के लिए एक श्रद्धांजलि है, जो गुरु गोविंद सिंह के दो सबसे छोटे बेटे साहिबजादा जोरावर सिंह और फतेह सिंह को समर्पित है। इन्हें मुस्लिम बनने से इनकार करने पर सरहिंद के मुगल फौजदार वजीर खान के आदेश पर जिंदा दीवार के अंदर चुनवा दिया गया था। उस समय जोरावर सिंह 9 वर्ष के थे और फतेह सिंह केवल 7 वर्ष के थे। उन्हें जिंदा दीवार में चुनवा दिए जाने के तुरंत बाद उनकी दादी गुजरी देवी (गुरु गोविंद सिंह की मां) की मौत हो गई थी। गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब उस स्थान पर खड़ा है जहां दो साहिबजादों की 12 दिसंबर 1705 को क्रूर हत्या की गई थी। वर्तमान कैलेंडर के अनुसार यह दिन 26 दिसंबर को आता है। ऐसा माना जाता है कि जब सरहिंद शहर में कोई भी उनका अंतिम संस्कार करने के लिए जमीन देने के लिए सहमत नहीं हुआ तो दीवान टोडरमल नामक एक अमीर हिंदू व्यापारी ने कम से कम 7800 सोने के सिक्कों के साथ जमीन का एक छोटा टुकड़ा खरीदा और साहिबजादों का अंतिम संस्कार किया।

गुरु गोविंद सिंह के चार बेटे थे। चार साहिबजादे, चारों ने मुगलों के खिलाफ खालसा पंथ की पहचान और सम्मान को बनाए रखने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया। बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह ने 40 बहादुर सिंह योद्धाओं के साथ मिलकर चमकौर का युद्ध मुगलों के खिलाफ लड़ा। यह युद्ध पंजाब के चमकौर में 1704 में 21 दिसंबर से 23 दिसंबर तक लड़ा गया था। मुगलों की विशाल सेना से बहादुर सिखों ने डटकर मुकाबला किया। चमकौर साहब की लड़ाई में अजीत सिंह और जुझार सिंह की मृत्यु हो गई थी।

गुरु गोविंद सिंह के दो अन्य बेटों जोरावर सिंह और फतेह सिंह की बहादुरी और बलिदान को न केवल उनकी उम्र के कारण अद्वितीय माना जाता है बल्कि उन क्रूर और बर्बर परिस्थितियों के लिए भी, जो मुगलों ने बच्चों और उनकी दादी के लिए तय किया था। फांसी से पहले दो बच्चों और उनकी दादी को ठंडे मौसम में किले की खुली हवा में ठंडे बुर्ज में बंदी बनाकर रखा गया था, जिसमें वे अंतहीन रूप से कांपते थे। लेकिन फिर भी उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार किया। कई दिनों तक उन पर दबाव डाला गया और इस्लाम न मानने पर जान से मारने की धमकी दी गई, लेकिन वह मुगलों से नहीं डरे और अपने धर्म को त्यागने से इंकार कर दिया। अंत में गोविंद सिंह जी के दो बेटों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया। जोरावर और फतेह सिंह, गुरु की पहली पत्नी जीतू जी के पुत्र थे, जो जीतू जी के निधन के बाद उनकी दादी ने उनकी देखभाल की थी।

पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला द्वारा प्रकाशित सिख धर्म का विश्वकोश छोटे साहबजादे और माता गुजरी के अंतिम दिनों की कहानी बताता है। गुरु गोविंद सिंह ने 5-6 दिसंबर 1705 की रात आनंदपुर को खाली करा लिया। गुरु गोविंद सिंह जी अपने बहादुर योद्धाओं के साथ मुगलों की सेना से लड़ते हुए तेजी से आगे बढ़ रहे थे। उस समय उनके साथ उनकी माता गुजरी और दो बेटे जोरावर सिंह और फतेह सिंह भी थे। सहरसा नदी पार करते वक्त गुरु गोविंद सिंह जी परिवार से बिछड़ गए। वहीं परिवार के बिछड़े अन्य लोग घर वापस चले गए। कहा जाता है कि माता गुजरी के पास मुगल सेना के सिक्कों को देखकर गंगू लालच में आ गया और उसमें इनाम पाने की इतनी चाहत थी कि उसने कोतवाल को माता गुजरी की सूचना दे दी। माता गुजरी अपने दो छोटे साहिबजादों के साथ गिरफ्तार हो गई। 9 दिसंबर 1705 को जोरावर सिंह और फतेह सिंह को वजीर खान के सामने पेश किया गया। उसने उन्हें दान और सम्मान के वादे के साथ इस्लाम अपनाने की धमकी दी, लेकिन वे डटे रहे। अंततः मौत की सजा दी गई। नवाब शेर मोहम्मद खान ने विरोध किया कि निर्दोष बच्चों को नुकसान पहुंचाना अनुचित होगा और इस्लाम के खिलाफ भी होगा, लेकिन किसी ने एक न सुनी। दोनों बच्चों को दीवार में चुनवा दिया और माता गुजरी को किले से धकेल दिया, जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई।

लंबे समय से सिख समुदाय ने मांग की है कि 26 दिसंबर को छोटे साहेबजादे की याद में एक विशेष दिन के रूप में चिन्हित किया जाए। कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने तो यहां तक मांग की थी कि बाल दिवस 14 नवंबर के बजाय इसी दिन मनाया जाना चाहिए। पंजाब में 25 से 28 दिसंबर तक हर साल जोर मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें न केवल पंजाब, बल्कि अन्य राज्यों से भी लाखों लोग शामिल होते हैं।

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