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कारोबार, चार सौ बिलियन डालर के पार

दुनिया का हर देश भारत की ओर ललचाई नजर से देख रहा है। हर कोई चाहता है कि इस संकट काल में भारत उसके साथ रहे। स्वास्थ्य आपदा के दौरान जिस तरह तमाम देशों को वैक्सीन और दवाई पहुंचाई गई उससे भारत की अहमियत विश्व भर में बढ़ी है। - अनिल तिवारी

 

वाणिज्य मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि वर्ष 2021-22 में पहली बार भारत का निर्यात 400 बिलियन डालर पर पहुंच गया है। इससे पहले यह सबसे अधिक वर्ष  2018-19 में 330 बिलियन डालर के आंकड़े के पास था। कोरोना महामारी के दौर में जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था सिकुड़ गई है। कोरोना संकट के रूप में मानव इतिहास की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आपदा से दुनिया अभी ठीक से उबर नहीं पाई थी कि यूक्रेन के बहाने आ पड़ी युद्ध आपदा ने दुनिया भर के देशों की बची खुची अर्थव्यवस्था की चूलें हिला कर रख दी है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इस उपलब्धि के मायने क्या है? 

सबसे पहले उन क्षेत्रों पर गौर करते हैं, जिनके अच्छे प्रदर्शन से भारत निर्यात में इस रिकार्ड ऊंचाई को हासिल कर सका है। मोटे तौर पर इंजीनियरिंग उत्पाद, पेट्रोलियम उत्पाद और हीरा जवाहरात आभूषण का निर्यात बीते वर्ष भारत में कुल निर्यात में दो तिहाई रहा। ऑर्गेनिक ओर इनॉर्गेनिक केमिकल्स कोटन यानि हैंडलूम उत्पाद आदि इलेक्ट्रिक सामान, प्लास्टिक और लिमोनियम सामुद्रिक उत्पाद आदि ऐसे आइटम रहे जिसने भारत की निर्यात बास्केट में खासी जगह पाई है।

अब यहां से यह सवाल उठता है कि क्या निर्यात में बढ़ोतरी का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा, जैसे की जीडीपी के आंकड़ों के मामले में होता है। ठीक उसी तरह हमें निर्यात संबंधी आंकड़े को लेकर दो बातें ध्यान में रखनी होगी। पहला, चूंकि यह आंकड़े पारिभाषिक होते हैं इसलिए वैश्विक बाजार में वस्तुओं के मूल्यों के उतार-चढ़ाव के चलते इनमें भी उतार-चढ़ाव संभव है। दूसरा, विश्व बाजार के घटनाक्रम का किसी भी देश के निर्यात पर असर पड़ना अवश्यम्भावी है। भारत का निर्यात इन दोनों कारणों से लाभान्वित हुआ है। बीते वर्ष विश्व बाजार में वस्तुओं के दामों में वृद्धि का रुझान रहा। जिससे भारत के निर्यात का मूल्य बढ़ा खासकर पेट्रोलियम उत्पादों और धातुओं के दामों में यह रुझान देखने को मिला। अलबत्ता वैश्विक मुद्रा स्थिति का भारतीय निर्यात पर असर नहीं आंका जा सका है, जिसके लिए निर्यात की मात्रा और मूल्य संबंधी अंतिम आंकड़े आने के बाद ही आकलन लगाया जा सकेगा।

बहरहाल वैश्विक मुद्रास्फीति आंकड़े बढ़ते भी हैं तो भारत का निर्यात अपनी बढ़त बनाए रखेगा। बेशक बीते साल में महामारी संबंधी प्रतिबंध खत्म किए जाने, वस्तुओं के दामों में बढ़ने के रुझान, प्रोत्साहन पैकेजओं के जरिए मांग पैदा करने के प्रयासों से भारतीय उत्पादों की मांग में इजाफा हुआ और इजाफे की धारणा भी मजबूत हुई, जिसका फायदा निश्चित ही भारत को निर्यात के मोर्चे पर मिला है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वस्तुओं के निर्यात का लक्ष्य हासिल करने की सराहना करते हुए कहा है कि यह आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में मील का पत्थर है। उन्होंने अपने ट्विटर पर लिखा “भारत  400 अरब डॉलर की वस्तुओं के निर्यात का लक्ष्य रखा था इसे हासिल कर लिया गया है। पहली बार इतना ऊंचा लक्ष्य हासिल किया गया है। मैं अपने किसानों, बुनकरों, एमएसएमई, विनिर्माताओं, निर्यातकों को इस सफलता की बधाई देता हूं। यह आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में मील का पत्थर है।“ खुद प्रधानमंत्री द्वारा देश के किसानों, बुनकरों, लघु उद्योगों की भूमिका को रेखांकित किया जाना, अपने आप में एक बड़े महत्व का विषय है। यहां उल्लेखनीय है कि भारत को निर्यात का यह मुकाम पेट्रोलियम उत्पाद, इंजीनियरिंग, रत्न एवं आभूषण और रसायन जैसे क्षेत्रों की बदौलत हासिल हुआ है। यानि कि 400 अरब डालर के आंकड़े में साज सामान का निर्यात प्रमुख है। सॉफ्टवेयर का निर्यात इसमें शामिल नहीं है। सॉफ्टवेयर के निर्यात की गणना अलग से होती है।

भारतीय साजोसामान के निर्यात में बढ़ोतरी एक तरह से भारत के पद, प्रतिष्ठा और साख की बढ़ोतरी है। इंजीनियरिंग, रासायनिक उत्पादों के मामले में अगर निर्यात उपलब्धियों को देखा जाए तो एक हद तक यह मेक इन इंडिया की कामयाबी की कहानी ही कहता है। भारत में बनने वाले साजोंसामान को अगर बेहतर निर्यात के लिए बाजार मिलता है तो इसका मतलब है कि भारत में बनने वाले साजों  सामान की स्वीकार्यता एवं उसकी गुणवत्ता लगातार बढ़ रही है। थोड़ा और आगे बढ़कर देखें तो भारत के साजोंसामान की पहुंच बढ़ते हुए दुनिया भर में फैलती है तो इसका सीधा लाभ मध्यम, लघु और छोटे कारोबारियों को मिलेगा। क्योंकि अगर सॉफ्टवेयर के निर्यात से बड़ी कंपनियों को फायदा मिलता है तो उसका असल फायदा बहुत पढ़े-लिखे कुशल कर्मियों के पक्ष में जाता है। वहीं अगर उदाहरण के लिए मुरादाबाद से पीतल की कलाकृतियों का निर्यात बढ़ता है तो जाहिर सी बात है कि इसका लाभ छोटे कारीगर को बहुत अधिक मिल सकेगा जो कि समग्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ही सुखद होगा।

कोरोना आपदा के चलते आज से लगभग दो साल पहले देश में लॉकडाउन लगाया गया था। जनजीवन लगभग ठहर गया था। लोग घरों में कैद थे और आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ गई। शेयर बाजार, रियल स्टेट, मैन्युफैक्चरिंग जैसे तमाम क्षेत्रों में मंदी का माहौल पसर गया। महंगाई और बेरोजगारी लगातार ऊंचाई हासिल करने लगी। यही वह आपदा काल था जो देशवासियों के जीवट  का नजीर बन गया है अवसर मिलते ही देश ने उम्मीद से बढ़कर बेहतर प्रदर्शन किया। जिसका परिणाम है कि बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था जल्दी से पटरी की ओर लौट पड़ी और निर्यात का आंकड़ा आज एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। अप्रैल-जून 2020 में जीडीपी जहां घटकर -24.4 प्रतिशत हो गई थी, वही अक्टूबर दिसंबर 2021 में यह 5.4 प्रतिशत पर पहुंच गई। 23 मार्च 2020 को सेंसेक्स 25981 पर था जो अक्टूबर 2021 में 62345 के रिकॉर्ड पर बंद हुआ। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस क्षेत्र में जोरदार रिकवरी हुई है। रियल स्टेट भी उत्साहवर्धक है। ऑटो सेक्टर के भी दिन लौट आए हैं। बेरोजगारी के मामले में भी स्थिति पहले से बेहतर हुई है। बेरोजगारी की दर अप्रैल 2020 में 23.52 प्रतिशत थी जो मई 2021 में यह 11.84 प्रतिशत और फरवरी 2022 आते-आते गिरकर 8.1 प्रतिशत ही रह गई है। महंगाई के मोर्चे पर भी सुधार जारी है। अक्टूबर 2020 में महंगाई की दर 7.6 प्रतिशत थी जो कि फरवरी 2022 में 6.01 प्रशित दर्ज की गई।

हालांकि रूस ने यूक्रेन पर हमला बोल कर कोरोना की काली साया से बाहर निकल रही दुनिया की जान फिर से सांसत में डाल दी है। तमाम देश खेमों में बंट गए हैं और युद्ध के बाद की कल्पना कर सिहर रहे हैं। ईंधन की कमी से उद्योग धंधों के साथ ही जनजीवन का चक्का जाम हो जाने का अंदेशा तो पैदा हुआ ही है, साथ ही साथ खाद्य संकट के बादल भी मंडराने लगे हैं। लेकिन इन सबके बीच भारत तेजी से उम्मीद के केंद्र के रूप में उभरा है। दुनिया का हर देश भारत की ओर ललचाई नजर से देख रहा है। हर कोई चाहता है कि इस संकट काल में भारत उसके साथ रहे। स्वास्थ्य आपदा के दौरान जिस तरह तमाम देशों को वैक्सीन और दवाई पहुंचाई गई उससे भारत की अहमियत विश्व भर में बढ़ी है। भारत की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता बढ़ने का ही नतीजा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी भारत अपने निर्यात के लक्ष्य को सहायता से हासिल कर सका है और इस हासिल का प्रभाव यह है कि जीडीपी की दृष्टि से वर्ष 2021-22 में अग्रिम अनुमानों के मुताबिक स्थिर मूल्यों के आधार पर हिस्सेदारी 20.9 प्रतिशत के करीब रहनी है। वर्ष 2020-21 मई में यह आंकड़ा 18.8 प्रतिशत का था।        

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