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उत्पादन में अव्वल, लेकिन अनाज भंडारण में कमी

By Vinod Johri • 02 Apr 2024
उत्पादन में अव्वल, लेकिन अनाज भंडारण में कमी

राष्ट्रीय सहकारी अनाज भंडारण परियोजना एक ऐतिहासिक पहल है जो जमीनी स्तर पर अनाज भंडारण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करके खाद्य सुरक्षा बढ़ाने, बर्बादी को कम करने और पूरे भारत में किसानों को सशक्त बनाने का वादा करती है। - विनोद जौहरी

 

भारत सबसे ज्यादा अन्न उत्पादक देशों में से एक है, लेकिन भंडारण क्षमता में पीछे है। अनाज के अन्य बड़े उत्पादक देशों चीन, अमेरिका, ब्राजील, रूस और अर्जेंटीना के पास वार्षिक उत्पादन से अधिक की भंडारण क्षमता है।भारत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य कार्यक्रम चलाता है, जिसमें लगभग 81 करोड़ लोग शामिल हैं। इसलिए, एक अरब से अधिक आबादी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खाद्यान्न भंडारण सुविधाओं का एक मजबूत नेटवर्क आवश्यक हो जाता है।

भारत में वर्षा में गर्मी के साथ हवा में उपस्थित आर्द्रता कवक/फफूंद की उत्त्पत्ति के लिये ज़िम्मेदार कारक है। इन दिनों कवक के हमले से खाद्य पदार्थों की सुरक्षा के लिये हम अपने घरों में अच्छी तरह से फिटिंग वाले ढक्कन तथा सीलबंद प्लास्टिक बैग, एयरटाइट कंटेनरों में खाद्य पदार्थों का भंडारण करते हैं। इसी तरह भारत में अधिकांश अनाज, जिसे सरकार द्वारा किसानों से खरीदा जाता है, सीएपी या कवर और प्लिंथ विधि का उपयोग करके संग्रहीत किया जाता है। एक आँकड़े के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम के गोदामों और किराये वाली जगहों पर इस तरह के ढाँचे में 30.52 मिलियन टन चावल, गेहूँ, मक्का, चना और ज्वार का भंडारण किया जाता है।

भारत जैसे विकासशील देश में अनाज के कुल उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत भाग विभिन्न कारणों से उपभोग उपयुक्त नहीं रह पाता। जिसका कारण भण्डारण की समुचित व्यवस्था का अभाव प्रमुख है। किन्तु भारतवर्ष जैसे विशाल देश और विशाल कृषि उत्पाद हेतु भण्डारण व्यवस्था तुरंत ही सुधारा नहीं जा सकता, इसलिए कृषकों को अपने स्तर पर ही फसल की कटाई के बाद अनाज को पूरी तरह से सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि अनाज को हानि पहुंचाने वाले अनेक कीट व चूहे सदा घात लगाए बैठे रहते हैं। अनाज भंडारण की आवश्यकता और प्राथमिकता इसलिए भी अधिक है क्योंकि असुरक्षित अनाज जिसको भंडारण की सुविधा नहीं मिली, वह स्वास्थ्य कारणों से भी उपभोक्ता के अहितकारी है।

अवैज्ञानिक भंडारण, कीट, चूहे, सूक्ष्म जीवाणु आदि के कारण कुल उत्पादित खाद्यान्नों के लगभग 10 प्रतिशत की फसल कटाई उपरान्त हानि होती है। भारत में वार्षिक भंडारण हानि 7000 करोड़ रूपए कीमत के लगभग 14 मिलियन टन खाद्यान्न हैं, जिसमें अकेले कीटों से हानि लगभग 1300 करोड़ रूपए है। भंडारण कीट द्वारा प्रमुख हानि न केवल उनके द्वारा अनाज को खाने से होती है बल्किर संदूषण से भी होती है। जिनसे कीटों लगभग 600 प्रजातियां जुड़ी हैं। भंडारित उत्पादों के कीटों की लगभग 100 प्रजातियां आर्थिक हानि पहुँचाती हैं। विश्वय बैंक की रिपोर्ट (1999) के अनुसार भारत में फसलोत्तर हानि प्रति वर्ष 12 से 16 मिलियन टन खाद्यान्न है, जो भारत के एक तिहाई गरीबों का पेट भर सकती है। 

दोषपूर्ण भंडारण से उत्पन्न समस्या

फफूंद लगा अनाज विभिन्न बीमारियों का कारण बनता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “माइकोटॉक्सिन्स“, जो फफूंद लगे अनाज/खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं तथा मानव स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होते हैं और एफ्लाटॉक्सिन (कैंसर पैदा करने), ट्राइकोथेसेन, ओक्रेटॉक्सिन्स, साइट्रिनिन और अन्य विषैले पदार्थ उत्पन्न करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भोजन में एफ्लाटॉक्सिन की उच्च सांद्रता पेट दर्द, उल्टी, हेपेटाइटिस और कभी-कभी मृत्यु का कारण भी बनता है। यही कारण है कि पारंपरिक जानकारी के अनुसार, फफूंद लगे भोजन को खराब माना जाता है। उल्लेखनीय है कि आज भी हमारे यहाँ अनाज, विशेष रूप से गेहूँ  और धान, बरसात के मौसम में तिरपाल के नीचे सड़क पर संग्रहीत किया जाता है।इसके बाद अनाज को आटा या आटा आधारित उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है, जिन्हें हम फफूंद से बचाने के लिये एयरटाइट कंटेनर में स्टोर करते हैं।ऐसी स्थिति में माइकोटॉक्सिन अनाज के संग्रहण के समय से ही इसमें मौजूद रहते हैं और बाद में भोजन के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य को हानि पहुँचाते हैं। उल्लेखनीय है कि माइकोटॉक्सिन स्वाभाविक रूप से कुछ कवकों द्वारा उत्पादित विषाक्त पदार्थ होते हैं और भोजन में पाए जाते हैं। विभिन्न फसलों और खाद्य पदार्थों जैसे कि अनाज, नट, मसाले, सूखे फल, सेब और कॉफी सेम में अक्सर ये गर्म और आर्द्र परिस्थितियों में बढ़ते हैमाइकोटॉक्सिन से स्वास्थ्य पर विभिन्न प्रकार के प्रतिकूल प्रभाव पड़ते है और यह मनुष्यों तथा पशुओं दोनों के लिये गंभीर स्वास्थ्य खतरा पैदा कर करता है। माइकोटॉक्सिन से स्वास्थ्य पर के कई प्रतिकूल प्रभाव जैसे- प्रतिरक्षा की कमी और कैंसर आदि होने का खतरा रहता है।

केंद्र सरकार ने सहकारिता क्षेत्र में विश्व की सबसे बड़ी अन्न भंडारण योजना “राष्ट्रीय सहकारी अनाज भंडारण परियोजना”को स्वीकृति दी है। इस पर लगभग एक लाख करोड़ रुपये व्यय किये जायेंगे। प्रत्येक प्रखंड में दो हजार टन क्षमता के गोदाम बनाये जायेंगे। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कैबिनेट की बैठक के बाद बताया कि देश में कुल 1450 लाख टन अन्न भंडारण की क्षमता है। अब सहकारिता क्षेत्र में 700 लाख टन भंडारण की अतिरिक्त क्षमता पर काम प्रारंभ होगा। अगले 5 वर्षों में भंडारण क्षमता बढ़ाकर 2150 लाख टन कर दी जायेगी। केंद्रीय मंत्री ने इसे सहकारिता क्षेत्र में विश्व का सबसे बड़ा अन्न भंडारण कार्यक्रम बताया। 

इस योजना के चार उद्देश्य हैं। अन्न भंडारण सुविधाओं की कमी के कारण अनाज की बरबादी पर नियंत्रण और किसानों को अनुचित रूप से कम दामों पर फसल बेचने से रोकना। इसके साथ ही आयात पर निर्भरता कम करना और गांवों में रोजगार सृजन करना भी इसका उद्देश्य है। 

भंडारण बढ़ाने से अनाज की परिवहन लागत कम होगी, जिससे खाद्य सुरक्षा में दृढ़ता आयेगी। देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 31 करोड़ टन से अधिक का अनाज उत्पादन होता है परंतु वर्तमान भंडारण क्षमता के अंतर्गत गोदामों में कुल उपज का 47 प्रतिशत तक ही रखा जा सकता है। गोदामों के अभाव में 12 से 14 प्रतिशत अन्न नष्ट हो जाता है।

योजना के शीघ्रता से कार्यान्वयन के लिए सहकारिता मंत्री की अध्यक्षता में एक अंतर मंत्रालयीय समिति का गठन किया जायेगा। समयबद्ध और एकरूपता के साथ कार्यान्वयन के लिए सहकारिता मंत्रालय देश के विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित क्षेत्रों में कम से कम दस चयनित जिलों में पायलट योजना चलायेगा। इस योजना के अंतर्गत 2000 टन का अन्न भंडारण का गोदाम हर ब्लॉक में बनाया जाएगा।

योजना की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वीकृति के एक सप्ताह के भीतर ही समन्वय समिति का गठन कर दिया जायेगा। 15 दिनों के भीतर कार्यान्वयन दिशा निर्देश जारी कर दिये जायेंगे। डेढ़ महीने के भीतर प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) को भारत और राज्यों की सरकारों के साथ संयोजित करने के लिए एक पोर्टल प्रारंभ किया जायेगा। 45 दिनों के भीतर प्रस्ताव का कार्यान्वयन भी प्रारंभ हो जायेगा।

देश में लगभग एक लाख प्राथमिक कृषि ऋण समितियां हैं जिनके 13 करोड़ से अधिक किसान सदस्य हैं। एक लाख पैक्स में से लगभग 63,000 परिचालन में हैं। योजना के माध्यम से पैक्स को दृढ़ता मिलेगी। पैक्स के स्तर पर भंडारण गृह, कस्टम हायरिंग केंद्र, प्रसंस्करण इकाई जैसी कृषि अवसंरचनाएं बनायी जायेंगी। इससे पैक्स बहुउद्देशीय बन सकेंगे। गोदामों के निर्माण से भंडारण की आधारभूत संरचनाओं की कमियां दूर होंगी। पैक्स को अन्य गतिविधियां करने में भी सक्षम किया जायेगा।

वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन केवल एमएसपी की गारंटी तक ही मुख्य रूप से सीमित हैं जबकि कृषि की आधारभूत संरचनाओं पर योजनाएं और उनका शीघ्रता से कार्यान्वयन भी उतना ही अधिक आवश्यक है।

राष्ट्रीय सहकारी अनाज भंडारण परियोजना एक ऐतिहासिक पहल है जो जमीनी स्तर पर अनाज भंडारण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करके खाद्य सुरक्षा बढ़ाने, बर्बादी को कम करने और पूरे भारत में किसानों को सशक्त बनाने का वादा करती है। यह योजना कृषि परिदृश्य को बदलने और कृषक समुदाय की भलाई सुनिश्चित करने की सरकार की प्रतिबद्धता का एक प्रमाण है। 

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