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मुडीज की रेटिंग में अर्थव्यवस्था सकारात्मक

Admin October 23, 2021

हमें ध्यान रखना होगा कि देश में करोना का खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और न ही हमारी इकोनॉमी पूरी तरह उबर पाई है। जैसे टीकाकरण की रफ्तार बनाए रखी है, वैसे ही एक इकोनॉमी के मोर्चे पर भी लगातार प्रयास जारी रखने होंगे।  — अनिल तिवारी

 

चौतरफा चुनौतियों से जूझकर उबर रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए पिछले हफ्ते सी.एम.आई के आंकड़ों से सकारात्मक संकेत मिलने के बाद अब यह राहत देने वाली खबर आई है कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने इसका सावरेन आउटलुक नकारात्मक से स्थिर की श्रेणी में कर दिया है। एजेंसी ने हालांकि सावरेन क्रेडिट रेटिंग में कोई बड़ा बदलाव न करते हुए पहले वाला बीएए3 का दर्जा ही बरकरार रखा है, जो कि एक तरह से सबसे निचला इन्वेस्टमेंट ग्रेड है। सावरेन आउटलुक में बदलाव उन प्रयासों और उनसे मिल रहे पॉजिटिव नतीजों को देखते हुए किया गया है जिनसे गुजरती भारतीय अर्थव्यवस्था ने तमाम चुनौतियों को पीछे छोड़कर फिर से उठ खड़े होने का जज्बा दिखाया है। रेटिंग एजेंसी के आंकलन में वित्तीय क्षेत्र की बेहतर होती स्थिति को तो रेखांकित किया ही गया है, यह भी कहा गया है कि कई एक नामी-गिरामी सेक्टरों में रिकवरी की रफ्तार उससे तेज रही है, जितनी कि अपेक्षा की जा रही थी।

पिछले 18 महीने से अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार की कोशिशों के बावजूद मोटे तौर पर हमारी अर्थव्यवस्था लंगडाकर चलने पर मजबूर है। मौजूदा वित्तीय वर्ष (अप्रैल से जून, 2021-22) की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद 32.4 ट्रिलियन की रही जो कि 2019-20 की पहली तिमाही में 35.7 ट्रिलियन रु. की थी। यह अच्छी खबर है कि साल 2020 के आगे हर महीने क्रमवार जो संकेत निकलकर आ रहे हैं उससे यह भरोसा बढ़ने लगा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना के चंगुल से बाहर निकलकर धीर-धीरे पटरी पर लौट आएगी।

भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने नोट में कहा है कि इस बात के कई साक्ष्य हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था कोविड-19 की महामारी के कारण जो गहरे गर्त में चली गई थी अब बाहर आ रही है। सदियों की लंबी मंदी छाया से बाहर निकलते हुए सूरज के उजाले की ओर बढ़ रही है। सरकार के मौद्रिक एवं राजकोषीय प्रोत्साहन के जरिए अनुमानों के विपरीत तेजी से आगे बढ़ रही है। वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर तीसरी तिमाही में सकारात्मक दायरे में आ गई है। हालांकि यह 0.1 प्रतिशत रह सकती है। यह बदलाव मुख्य रूप से दो कारणों से हो रहा है। पहला कोविड संक्रमण के दर में कमी लाकर। भारत दूसरी लहर के बाद टीकाकरण पर मुख्य फोकस किया। 

अब तक लगभग 100 करोड़ लोगों को टीका लगाया जा चुका है। देश में कोविड संक्रमण की दर न के बराबर रह गई है। और दूसरा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज में उपभोग व्यय से आत्मनिर्भर भारत के निवेश खर्च पर अधिक ध्यान देकर राजकोषीय उपायों के जरिए महत्वपूर्ण बदलाव लाया गया है। सीएमआईके अध्ययनकर्ताओं ने पिछले पखवाडे़ जारी किए गए अपने सर्वे में बताया था कि छोटे तथा मझौले उद्यमों में काम की गति बढ़ी है। वही फिक्स तनख्वाह पर काम करने की प्रवृत्ति वाली नौकरियों में भी इजाफा हुआ है। सितंबर महीने में एकमुश्त 27 लाख से अधिक नौकरियां लोगों को मिली, जिसमें पारिश्रमिक भी या तो बढ़कर था अथवा वर्तमान बाजार मूल्य के सापेक्ष था। आगे और भी सुनहरा भविष्य होने की कामना की गई है। बताते चले कि सीएमआई प्रमुख महेश व्यास के इस अध्ययन शोध पर कई एक लोगों ने शंका भी जताई थी। कोरोना के पहले आक्रमण के दौरान कामकाजी लोगों के पलायन और कंपलीट लॉकडाउन के चलते अर्थव्य्वस्था ठप्प हो चुकी थी। उस दौरान करोड़ो लोगों की नौकरियां छिन गई थी। सरकार के कल्याणकारी प्रयास से उद्योगों के पहिए धीरे-धीरे हिलना डुलना शुरू हुआ तथा लगा कि जल्द ही देश अपना खोया हुआ पा लेगा। लेकिन करोना की दूसरी लहर ने सारे अनुमानों पर ब्रजपात कर दिया। धन के साथ जन की भी भारी क्षति हुई। आर्थिक अराजकता का माहौल बन गया। 

दुनिया के तमाम विकसित देश जो पहली लहर के बाद भारत की ओर ललचाई नजर से देख रहे थे उनकी समझ और सुर बदले हुए नजर आने लगे। भारत पलक झपकते कोरोना से संबंधित आवश्यक दवाईयों का बड़ा निर्यातक के ओहदे से उतर अयातक देश बन गया। छोटे-छोटे देश भी भारत को माक्स, सैनेटाइजर, जीवनरक्षक दवाईयां भेजने लगे। एक तरह से आर्थिक हताशा का हैव्वा खासकर देश के सत्ताविरोधी दलों द्वारा खड़ा किया गया। लेकिन इस दरम्यान देश में कृषि की स्थिति न सिर्फ संतोषजनक रही बल्कि कृषि क्षेत्र ने इस महामारी से निपटने में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। सारे सेक्टरों में जब गिरावट के नए-नए किस्से शामिल हो रहे थे उस वक्त कृषि की वृद्धि दर छलांग लगाकर आगे बढ़ने का कारनामा कर दिखाया। 

आज देश में 80 करोड़ लोगों को निशुल्क राशन उपलब्ध कराकर सरकार मानव जीवन रक्षा के परम लक्ष्य को साधने में सफल हुई है। सीएमआई, मूडीज जैसी नामी रेटिंग एजेसियों के हालिया अध्ययन नतीजे से यह साफ हो रहा है कि भारतीय अर्थव्यावस्था न सिर्फ आगे बढ़ रही है बल्कि यह उम्मीद भी जताई गई है कि वास्तविक जीडीपी इसी साल महामारी के पहले स्तर को पार कर सकती है। गौर करने की बात है कि इन पॉजिटिव बदलाव के पीछे उन कुछेक ठोस कदमों की बड़ी भूमिका रही जो वित्तीय तंत्र की कमियों को दूर करने के मकसद से इस बीच उठाए गए। उदाहरण के लिए बैंकों पर बढ़ता एनपीए का बोझ पिछले कई वर्षों से एक बड़ी समस्या के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है। अब अगर इस मोर्चे पर भी हालात को बेहतर होता बताया जाता है तो इसके पीछे एक वजह यह भी है कि नए कानूनों की मदद से गिरती अर्थव्यवस्था देश में बहुत मजबूत हुई है। 

जीएसटी संग्रह के नए आंकडें बता रहे हैं कि कर भी पहले की तुलना में कहीं आसानी से और अधिक मिलने लगा है। हालांकि सरकारी खजाने पर दबाव की समस्या अभी भी बनी हुई है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि जैसे-जैसे आर्थिक माहौल बेहतर होगा सरकार के लिए वित्तीय घाटा कम करने वाले कदम उठाने की गुंजाइश बढ़ेगी और हालात काबू में आते जाएंगे। चूंकि जोखिम का एक बड़ा स्रोत कोरोना वायरस का संक्रमण भी रहा है। इसकी दूसरी लहर में उठती हुई अर्थव्यवस्था को एक बार फिर से पीछे धकेल दिया था मगर उसके बाद टीकाकरण की तेज मुहिम की बदौलत तीसरी लहर की आशंका काफी कम करने में कामयाबी मिली है। माना जा रहा है कि तीसरी लहर आई भी तो उसका स्वरूप वैसा विनाशकारी नहीं होगा जैसा करोना की दूसरी लहर का था। इस विश्वास ने आर्थिक रिकवरी को रफ्तार देने में अहम भूमिका निभाई है। बहरहाल हमें ध्यान रखना होगा कि देश में करोना का खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और न ही हमारी इकोनॉमी पूरी तरह उबर पाई है। जैसे टीकाकरण की रफ्तार बनाए रखनी है। वैसे ही एक इकोनॉमीके मोर्चे पर भी लगातार प्रयास जारी रखने होंगे। 

सबसे बड़ी चुनौती अब भी रोजगार के अधिक से अधिक मौके उपलब्ध कराने की है ताकि मांग बढ़े और एकनामी का चक्का रफ्तार पकड़े। आजादी के अमृत महोत्सव के भव्य आयोजनों के बीच केंद्र की सरकार अत्याधिक रोजगार के अवसरों के सृजन के लिए ढेर सारे विभागों में नवाचार के साथ-साथ वोकल फॉर लोकल का नारा देते हुए शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी निवेश का दायरा बढ़ा रही है। उम्मीए की जा रही है कि इसके फलितार्थ शुभ ही होंगे।                

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