swadeshi jagran manch logo
News Image

भारत के पुनर्निर्माण की गाथा और विकसित भारत का मार्ग

पिछले बारह वर्षों की यह यात्रा केवल शासन परिवर्तन की कहानी नहीं है; यह भारत के पुनर्निर्माण, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की गाथा है। - डॉ. धनपतराम अग्रवाल

 

भूमिका

वर्ष 2014 भारतीय लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रारम्भ हुई नई विकास यात्रा ने शासन, अर्थव्यवस्था, अवसंरचना, प्रौद्योगिकी, सामाजिक कल्याण और वैश्विक कूटनीति के क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। वर्ष 2026 में जब यह यात्रा बारह वर्षों का पड़ाव पार कर चुकी है, तब इसका मूल्यांकन केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और संस्थागत परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।

इन बारह वर्षों में भारत ने विश्व की सबसे तीव्र गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी पहचान बनाई है। लगभग 1.84 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से बढ़कर भारत आज 4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था बन चुका है। किन्तु किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मूल्यांकन केवल आर्थिक आकार से नहीं किया जा सकता। विकास की गुणवत्ता, उसकी समावेशिता, उसकी स्थिरता तथा भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। मोदी सरकार के बारह वर्षों का मूल्यांकन इसी संतुलित दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।

विकास का विस्तृत परिदृश्य

भारत आज पारंपरिक विकास मॉडल से आगे बढ़कर वह एक आधुनिक, डिजिटल और नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। कोविड महामारी जैसी अभूतपूर्व चुनौती के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय लचीलापन प्रदर्शित किया है। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विभिन्न वैश्विक एजेंसियाँ भारत को वैश्विक विकास का प्रमुख इंजन मान रही हैं। सेवाक्षेत्र, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और अवसंरचना निवेश ने विकास की नई संभावनाएँ उत्पन्न की हैं।

अवसंरचना क्रांति: विकास की आधारशिला

पिछले बारह वर्षों की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि भारत की अवसंरचना क्रांति रही है। राष्ट्रीय राजमार्गों का तीव्र विस्तार, एक्सप्रेसवे नेटवर्क का निर्माण, समर्पित मालवाहक गलियारों की स्थापना, रेलवे के आधुनिकीकरण, वंदेभारत ट्रेनों का विस्तार तथा बंदरगाहों और हवाई अड्डों के विकास ने देश की आर्थिक क्षमता को नई गति प्रदान की है।

जहाँ एक समय भारत की विकास यात्रा अवसंरचनात्मक बाधाओं से प्रभावित होती थी, वहीं आज लॉजिस्टिक दक्षता, क्षेत्रीय संपर्क और व्यापारिक सुगमता में उल्लेखनीय सुधार दिखाई देता है। पूँजीगत व्यय में अभूतपूर्व वृद्धि ने रोजगार, निर्माण गतिविधियों तथा निवेश वातावरण को भी सुदृढ़ किया है। यह केवल सड़क, रेल और पुल निर्माण की कहानी नहीं है; यह भारत की उत्पादक क्षमता के पुनर्निर्माण की कहानी है।

डिजिटल भारत: विश्व के लिए एक मॉडल

जनधन, आधार और मोबाइल की त्रयी ने भारत में शासन और वित्तीय समावेशन की परिभाषा बदल दी है।

जनधन योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) ने सरकारी योजनाओं के लाभ को सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाकर पारदर्शिता और दक्षता में वृद्धि की।

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) आज भारत की सबसे बड़ी डिजिटल उपलब्धियों में से एक है। प्रतिदिन होने वाले करोड़ों डिजिटल लेन-देन ने भारत को नकदी-प्रधान अर्थव्यवस्था से डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा में अग्रसर किया है।

कोविन प्लेटफॉर्म, डिजिलॉकर, ओएनडीसी और अकाउंट एग्रीगेटर जैसी पहलों ने यह सिद्ध किया है कि भारत केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीकी समाधान प्रदान करने वाला राष्ट्र भी बन सकता है।

सामाजिक कल्याण की नई संरचना

किसी भी विकास मॉडल की सफलता का अंतिम मापदंड यह होता है कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचा या नहीं।

प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत करोड़ों परिवारों को पक्के मकान उपलब्ध कराए गए हैं। जल जीवन मिशन ने ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्धता में क्रांतिकारी सुधार किया है।

उज्ज्वला योजना ने महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराया, जबकि आयुष्मान भारत योजना ने करोड़ों गरीब परिवारों को स्वास्थय सुरक्षा प्रदान की।

इन योजनाओं ने सामाजिक सुरक्षा के उस आधार को मजबूत किया है जिस पर समावेशी विकास की इमारत खड़ी की जा सकती है।

स्टार्टअप और नवाचार अर्थव्यवस्था

भारत आज विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। स्टार्टअप इंडिया अभियान, नवाचार को प्रोत्साहन, वित्तीय सहायता और नीति सुधारों ने युवाओं में उद्यमशीलता की नई ऊर्जा उत्पन्न की है।

फिनटेक, एडटेक, हेल्थटेक, एग्रीटेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा सॉफ्टवेयर सेवाओं के क्षेत्र में भारतीय स्टार्टअप वैश्विक प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

चंद्रयान-3 की सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि सीमित संसाधनों में भी भारत उच्च स्तरीय वैज्ञानिक उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है। सेमीकंडक्टर मिशन, राष्ट्रीय क्वांटम मिशन और राष्ट्रीय एआई मिशन भविष्य के भारत की तकनीकी नींव तैयार कर रहे हैं।

वैश्विक मंच पर भारत का उदय

पिछले बारह वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। जी-20 की सफल अध्यक्षता, अफ्रीकी संघ को सदस्यता दिलाने की पहल, क्वाड की सक्रियता, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा तथा वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में भारत की भूमिका ने उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को नई ऊँचाई प्रदान की है।

योग, भारतीय संस्कृति, प्रवासी भारतीय समुदाय तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना भारत की सॉफ्ट पावर को भी सुदृढ़ कर रहे हैं।

आज विश्व भारत को केवल एक विशाल बाजार के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय साझेदार और उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में देख रहा है।

उपलब्धियों के बीच अधूरा एजेंडा

इन उपलब्धियों के बावजूद कुछ गंभीर चुनौतियाँ हमारे सामने हैं।

निजी निवेश की गति अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँची है। विदेशी निवेश के सकल आँकड़े उत्साहजनक दिखाई देते हैं, किन्तु शुद्ध विदेशी निवेश में गिरावट चिंता का विषय है। यदि आर्थिक विकास का प्रमुख आधार केवल सार्वजनिक निवेश बन जाए, तो दीर्घकाल में उसकी स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसलिए निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।

असमानता और समावेशी विकास की चुनौती

भारत की आर्थिक वृद्धि प्रभावशाली रही है, किन्तु आय और संपत्ति का वितरण अभी भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है। समाज के निचले वर्गों के जीवन स्तर में सुधार अवश्य हुआ है, किन्तु संपत्ति का संकेंद्रण शीर्ष वर्गों में अपेक्षाकृत अधिक तीव्र गति से बढ़ा है। समावेशी विकास का अर्थ केवल गरीबी उन्मूलन नहीं, बल्कि अवसरों की समान उपलब्धता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थय और रोजगार की व्यवस्था भी है। आर्थिक वृद्धि तभी टिकाऊ बन सकती है जब उसका लाभ व्यापक समाज तक पहुँचे।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोजगार का भविष्य

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आने वाले दशक का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी तत्व बनने जा रही है।

भारत का आईटी और बीपीओ क्षेत्र करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। किन्तु एआई आधारित स्वचालन पारंपरिक रोजगार संरचनाओं को चुनौती दे रहा है।

नई तकनीकें कुछ रोजगार समाप्त करेंगी, लेकिन साथ ही नए अवसर भी उत्पन्न करेंगी। चुनौती यह है कि भारत अपने युवाओं को इन नए अवसरों के लिए समय रहते तैयार कर सके।

एक व्यापक राष्ट्रीय पुनः कौशल (रेसकिलिंग) और कौशल उन्नयन (अपस्किलिंग) अभियान समय की आवश्यकता है।

तकनीकी सम्प्रभुता और अनुसंधान की आवश्यकता

21वीं शताब्दी में आर्थिक शक्ति का आधार केवल पूँजी नहीं, बल्कि ज्ञान और प्रौद्योगिकी है।

भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, किन्तु दुर्लभ खनिजों, उन्नत सेमीकंडक्टर, एआई चिप्स, उच्च प्रदर्शन संगणना, क्लाउड अवसंरचना तथा क्वांटम तकनीक जैसे क्षेत्रों में अभी भी बाहरी निर्भरता बनी हुई है।

अनुसंधान एवं विकास पर भारत का व्यय अभी भी प्रमुख नवाचार अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम है। यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो उसे तकनीकी उपभोक्ता से तकनीकी निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

विश्वविद्यालयों, उद्योगों और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग को नई ऊँचाइयों तक ले जाना होगा।

विकसित भारत 2047: संकल्प से सिद्धि तक

विकसित भारत 2047 केवल आर्थिक प्रगति का कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का संकल्प है।

भारत के पास विशाल युवा शक्ति, लोकतांत्रिक संस्थाएँ, तकनीकी क्षमता, उद्यमशीलता और वैश्विक स्वीकार्यता जैसे अनेक सकारात्मक तत्व हैं। किन्तु इन संभावनाओं को वास्तविक उपलब्धियों में बदलने के लिए निरंतर सुधार, नवाचार और सुशासन की आवश्यकता होगी।

आने वाले दो दशकों में शिक्षा, स्वास्थय, अनुसंधान, रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और तकनीकी आत्मनिर्भरता निर्णायक भूमिका निभाएँगे।

उपसंहार

मोदी सरकार के बारह वर्षों का मूल्यांकन करते समय यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने अनेक क्षेत्रों में ऐतिहासिक परिवर्तन का अनुभव किया है। अवसंरचना निर्माण की गति, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का विकास, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार, वैश्विक मंचों पर बढ़ती प्रतिष्ठा तथा नवाचार और उद्यमशीलता के क्षेत्र में नई ऊर्जा-ये सभी उस परिवर्तन के प्रमाण हैं जिसने भारत की विकास यात्रा को नई दिशा प्रदान की है। फिर भी राष्ट्र निर्माण एक सतत प्रक्रिया है। यह किसी एक सरकार, एक चुनाव या एक दशक की उपलब्धि नहीं होता। यह पीढ़ियों के सामूहिक पुरुषार्थ, दूरदृष्टि और राष्ट्रीय संकल्प का परिणाम होता है।

भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में प्रवेश करने की क्षमता रखता है। इसके लिए आवश्यक है कि उपलब्धियों पर संतोष करने के बजाय उन्हें नई ऊँचाइयों तक ले जाने का साहस दिखाया जाए। यदि विकास, सुशासन, नवाचार, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता का यह प्रवाह निरंतर बना रहा, तो वर्ष 2047 का भारत केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं होगा, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शक राष्ट्र बन सकता है।

वास्तव में, पिछले बारह वर्षों की यह यात्रा केवल शासन परिवर्तन की कहानी नहीं है; यह भारत के पुनर्निर्माण, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की गाथा है। मंज़िल अभी दूर है, किन्तु दिशा स्पष्ट है, और यही किसी भी महान राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है।                

Share This

Click to Subscribe