बीते 12 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद आंकड़ों, परियोजनाओं या चुनावी जीतों में नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन में है जो भारत के जनमानस में दिखाई देता है। - अनिल तिवारी
विश्व बैंक की ताजा-ताजा रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना महामारी, रूस, यूक्रेन तथा मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध की वजह से दुनिया के अनेक देश विकास की दौड़ में सुस्त पड़ गए हैं, कई देशों की ग्रोथ निगेटिव है, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से कुलांचे भर रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया भर के विकास का इंजन बन रहा है। वैश्विक मंदी और चुनौतियों के बावजूद भारत में औसतन 6.5 से 7.5 प्रतिशत के बीच की शानदार वृद्धि दर बनाए रखी है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट में भारत को वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच एक ‘उज्जवल स्थान’ के रूप में चिन्हित किया गया है।
यह वृद्धि केवल एक आंकड़ा भर नहीं है और न ही यह उपलब्धि किसी जादू की छड़ी से हासिल हुई है, बल्कि यह कुशल नेतृत्व में बढ़ते निवेश, रोजगार सृजन, उद्यमिता, स्वावलंबन और आर्थिक अवसरों के विस्तार का प्रमाण है। वर्ष 2013-14 में जहां देश की प्रति व्यक्ति आमदनी लगभग 79,118 रुपए प्रतिवर्ष थी, आज बढ़कर 2.05 लाख रुपए प्रतिवर्ष से अधिक की हो गई है। बीते 12 वर्षों में भारत ने राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को प्रतिष्ठित करते हुए आर्थिक और राजनीतिक प्रगति के नए आयाम विकसित किए हैं।
दुनिया भर के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ कालखंड ऐसे रहे हैं जो केवल शासन परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की संस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण के लिए याद किए जाते हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते बारह वर्षों का दौर ऐसा ही एक कालखंड है। यह केवल एक प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की कहानी है जिसने नए आत्मविश्वास, नई ऊर्जा और नई पहचान के साथ स्वयं को स्थापित किया है। नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। यह उपलब्धि केवल राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि जनता के उस विश्वास का प्रमाण है जो बार-बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्त हुआ है। भारत जैसा विशाल, बहुभाषी, बहुधार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरा देश किसी नेतृत्व को लगातार तीन बार राष्ट्रीय जनादेश दे, यह अपने आप में असाधारण एवं ऐतिहासिक है।
इस कालखंड की सबसे बड़ी विशेषता केवल विकास नहीं, बल्कि विकास और विश्वास का समन्वय है। नेहरू युग को आधुनिक भारत के निर्माण का काल कहा गया, तो वर्तमान युग को उस भारत के आत्मविश्वास के पुनर्जागरण का काल कहा जा सकता है। इस कालखंड में केंद्र की राजग सरकार ने केवल सड़कों, पुलों, हवाई अड्डों और डिजिटल नेटवर्क का निर्माण नहीं किया, बल्कि करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास भी जगाया कि भारत किसी से कम नहीं है और वह विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है।
इस कालखंड का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री की सबसे विलक्षण विशेषता यह रही कि उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता संचालन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे जनभावनाओं और राष्ट्रीय आकांक्षाओं से जोड़ा। वे उन विरले नेताओं में हैं जिन्होंने सरकारी योजनाओं को केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें जन-आंदोलन का स्वरूप दिया। स्वच्छ भारत अभियान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सफाई का विषय जो कभी सरकारी विभागों तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ दिया गया।
वर्तमान समय को भारत की गुम होती सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्स्थापना के लिए भी याद किया जाएगा। सदियों से उपेक्षित राष्ट्रीय प्रतीकों, तीर्थ-स्थलों और सांस्कृतिक विरासत को नई गरिमा मिली। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सांस्कृतिक चेतना के सम्मान का प्रतीक बना। काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक, केदारनाथ पुनर्निर्माण और सोमनाथ जैसे तीर्थों का विकास यह संकेत देता है कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं।
वैश्विक मंच पर भारत आज वैश्विक विमर्श को प्रभावित करने वाला राष्ट्र बनकर उभरा है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का संकट हो, जी-20 का नेतृत्व हो अथवा वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज उठाने का प्रश्न हो, भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह वही भारत है जिसे कभी सपेरों का देश, तो कभी विकासशील देशों की कतार में खड़ा माना जाता था, लेकिन आज दुनिया इसकी आर्थिक प्रगति रफ्तार को आंकते हुए समाधान प्रदाता राष्ट्र के रूप में देख रही है।
इन बारह वर्षों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि शासन के केंद्र में पहली बार अंतिम व्यक्ति को रखने का गंभीर प्रयास दिखाई दिया। जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, पीएम आवास योजना, मुफ्त राशन योजना तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने करोड़ों गरीबों के जीवन में बदलाव लाने का काम किया। शासन की पारदर्शिता बढ़ी और बिचौलियों की भूमिका सीमित हुई। डिजिटल इंडिया अभियान ने तकनीक को केवल महानगरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचाया।
भारत मूलतः एक कृषि प्रधान देश है। लेकिन पहले हमारी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि देश में अनाज की कमी न हो और भूख से बचाव हो जाए। आज किसान हितैषी नीतियों के कारण कृषि सिर्फ ‘उत्पादन के क्षेत्र’ तक सीमित न होकर किसान की समृद्धि, जोखिम, सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, हरित तकनीक और ग्रामीण विकास का समन्वित आधार बन गई है। हरित क्रांति के बाद पहली बार नीतियां फसल उत्पादन के बजाय किसान की वास्तविक आय, टिकाऊ कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती जैसे पहलुओं पर केंद्रित हैं। सरकार ने किसान की जोखिम. सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है। सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कृषि, अवसंरचना, वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज, चेन में निवेश ने उत्पादन, भंडारण और बाजार तक पहुंच को मजबूत किया है।
असमानता को दूर करने के लिए पीएम धन-धान्य कृषि योजना की संकल्पना की गई है। इसके तहत सिंचाई, मृदा स्वास्थय, बीज, उर्वरक, फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, कृषि-उपकरण, कौशल विकास, अवसंरचना और बाजार .जुड़ाव जैसी सुविधाएं सहजता से उपलब्ध हो पा रही हैं। सरकार का इरादा स्पष्ट है कि किसान की आय बढ़े, उसकी मेहनत का उचित सम्मान और मूल्य मिले।
ग्रामीण किसानों की समृद्धि के लिए भारत सरकार ने पीएम कुसुम योजना को मूर्त रूप दिया है। इसका लक्ष्य किसानों को सिंचाई के लिए सोलर पंप उपलब्ध कराना और उनकी बंजर जमीन से अतिरिक्त आय के अवसर निर्मित करना है। इस योजना के तहत किसान अपनी बंजर या कृषि योग्य जमीन पर दो मेगावाट तक के छोटे सोलर पावर प्लांट स्थापित कर 25 वर्षों तक एक सुनिश्चित आय प्राप्त कर सकते हैं। सिंचाई के लिए डीजल से चलने वाले पंपों को सोलर पंप में बदलने के लिए सरकार 60 प्रतिशत तक का अनुदान देती है। इस योजना के तहत 34422 करोड रुपए की वित्तीय सहायता से मार्च 2026 तक 34800 मेगावाट सौर क्षमता को जोड़ा जा चुका है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि संकल्प बोध के साथ सरकार ने कुछ बड़े लक्ष्य निर्धारित कर उन्हें राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप दिया हैं। चाहे धारा 370 का उन्मूलन हो, तीन तलाक पर रोक हो, जीएसटी लागू करना हो, महिला आरक्षण विधेयक हो अथवा नक्सलवाद और आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति। इन सभी निर्णयों में राजनीतिक जोखिम था, लेकिन सरकार ने जोखिम उठाने का साहस दिखाया। शिक्षा नीति में आमूल चूल परिवर्तन, सेना में अग्नि वीरों की भर्ती, स्वर्ण जातियों के लिए आरक्षण जैसे फैसले लेना सरकार की दृढ़इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
हालांकि, किसी भी लोकतांत्रिक शासन की तरह चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थय की बढ़ती लागत, सामाजिक विषमताएं तथा आर्थिक अवसरों का असमान वितरण ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान अभी अपेक्षित है। भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है तो केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ चिकित्सा, रोजगार सृजन और भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन को भी समान प्राथमिकता देनी होगी। मोदी सरकार के आगामी वर्षों से सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने अभियान को और अधिक प्रभावी बनाए। भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जहां ईमानदारी अपवाद नहीं, सामान्य व्यवहार बने। शिक्षा और स्वास्थय को व्यावसायिक माफियाओं के प्रभाव से मुक्त कर आम नागरिक की पहुंच में लाया जाए। साथ ही उद्यमिता को बड़े औद्योगिक घरानों तक सीमित रखने के बजाय गांवों, युवाओं और महिलाओं तक पहुंचाना होगा ताकि प्रत्येक नागरिक रोजगार खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बन सके। ‘स्वदेशी जागरण मंच’ स्वावलंबी भारत अभियान के जरिए इसके लिए लगातार प्रयासरत है। मंच का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा और ग्रामीण आबादी है। यदि इस ऊर्जा को कौशल, नवाचार और उद्यमिता से जोड़ा गया तो भारत केवल विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है।
इसी प्रकार महिला शक्ति को विकास की मुख्यधारा में पूर्ण भागीदारी देकर राष्ट्र निर्माण की गति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
कुल मिलाकर बीते 12 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद आंकड़ों, परियोजनाओं या चुनावी जीतों में नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन में है जो भारत के जनमानस में दिखाई देता है। केंद्र सरकार ने बारह वर्षों में विकास की संरचनाएं खड़ी की हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सरकार ने करोड़ों भारतीयों के भीतर भविष्य के भारत की एक आकांक्षा जगाई है। 2047 के विकसित भारत का संकल्प तभी साकार होगा जब विकास के साथ विश्वास, समृद्धि के साथ समान अवसर और शक्ति के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ेगी। परम वैभव के लक्ष्य की ओर बढ़े संतुलित कदमों का यदि यह संतुलन बना रहता है, तो इतिहास इस कालखंड को केवल एक लंबे राजनीतिक कार्यकाल के रूप में नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण युग के रूप में याद करेगा।