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आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और स्वावलंबन का सूत्र है जी.आई. टैग

Admin September 20, 2021

उत्पादों को जी.आई. टैग द्वारा इनके उद्यमियों और कारोबारियों को उचित लाभ, व्यापार में उन्नति और इन स्थानों के कारीगरों की आर्थिक स्थिति सुद्रढ़ हो सकती है। भारतीय उद्योगों में अभी अपार संभावनाएं हैं।  — विनोद जौहरी

 

आत्मनिर्भर भारत के स्वदेशी मूल मंत्र में है स्वदेशी उद्योगों की लाभोन्मुखी प्रगति, बाज़ार में स्वदेशी उत्पादों के घरेलू मांग, स्वदेशी उद्यमों का विस्तार, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भारतीय उद्योगों की स्थिरता, छोटे छोटे स्तर पर लघु उद्योग, उद्योग व्यापार के अनुरूप सुविधाजनक कर, कंपनी, लाइसेन्स, ट्रांसपोर्ट व्यवस्था आदि। हमारे देश में प्राचीन काल से ही उद्योग व्यापार समृद्ध रहे हैं। परंतु वर्तमान कालखंड में हमारे उद्योगों के समक्ष नई चुनौतियाँ हैं। इस संदर्भ में “जीआई टैग” के विषय में सार्थक चर्चा प्रासंगिक है।    

वर्ल्ड इंटलैक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइजेश (डब्ल्यूआईपीओ) के मुताबिक जियोग्राफिकल इंडिकेशंस टैग एक प्रकार का लेबल होता है जिसमें किसी प्रोडक्ट को विशेष भौगोलिक पहचान दी जाती है। ऐसा प्रोडक्ट जिसकी विशेषता या फिर प्रतिष्ठा मुख्य रूप से प्रकृति और मानवीय कारकों पर निर्भर करती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जीआई का विनियमन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं (Trade & Related Aspects of Intellectual Property Rights -TRIPS) पर समझौते के तहत किया जाता है। जीआई टैग को औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिये पेरिस कन्वेंशन (Paris Convention for the Protection of Industrial Property) के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) के एक घटक के रूप में शामिल किया गया है। भौगोलिक संकेत बौद्धिक संपदा अधिकारों का हिस्सा हैं, जो ‘औद्योगिक संपदा के संरक्षण के लिये पेरिस अभिसमय’ (Paris Convention for the Protection of Industrial Property) के अंतर्गत आते हैं। अब तक भारत में 370 उत्पादों को जी आई टेग मिल चुके हैं जिन में से 14 उत्पाद विदेशी हैं। 

राष्ट्रीय स्तर पर यह कार्य ‘वस्तुओं का भौगोलिक सूचक’ (पंजीकरण और सरंक्षण) अधिनियम, 1999 (Geographical Indications of goods 'Registration and Protection' act] 1999) के तहत किया जाता है, जो सितंबर 2003 से लागू हुआ। इस आधार पर भारत के किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है। जी आई टेग द्वारा भारत के विशिष्ट उत्पादों को सुरक्षित करके हम अपने परंपरागत उद्योगों का बड़े स्तर पर विस्तार कर सकते हैं। भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री का मुख्यालय चेन्नई (तमिलनाडु) में स्थित है। एक भौगोलिक संकेतक का पंजीकरण 10 वर्ष की अवधि के लिये वैध होता है। विशेष भौगोलिक पहचान मिलने से इन उत्पादों के उत्पादकों को अच्छी कीमत मिलती है और साथ ही अन्य उत्पादक उस नाम का दुरुपयोग कर अपने सामान की मार्केटिंग भी नहीं कर सकते हैं। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण’ (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority - APEDA) के अनुसार, जीआई टैग को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में एक ट्रेडमार्क की तरह देखा जाता  है। भारत में वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्री प्रमोशन एंड इंटरनल ट्रेड की तरफ से जीआई टैग दिया जाता है। भारत में ये टैग किसी खास फसल, प्राकृतिक और उत्पादित वस्तुओं को दिया जाता है। 

                      भारत में भौगोलिक संकेतों के कुछ उदाहरण  
भौगोलिक संकेत (जीआई)                       वस्तु का प्रकार                           राज्य
1. दार्जिलिंग चाय                                            कृषि                                   पश्चिम बंगाल
2. अरनमुल्ला कन्नदी                                      हथकरघा                              केरल
3. पोचमपल्ली इकत                                      हथकरघा                              तेलंगाना
4. सेलम फैब्रिक                                            हथकरघा                              तमिलनाडु
5. चंदेरी साड़ी                                              हथकरघा                               मध्य प्रदेश
6. शोलापुर चदर                                           हथकरघा                              महाराष्ट्र
7. शोलापुर टेरी तौलिया                                  हथकरघा                              महाराष्ट्र
8. कोटपैड हथकरघा कपड़े                            हथकरघा                              ओडिशा
9. मैसूर सिल्क                                              हथकरघा                              कर्नाटक

 

वर्ष 2004 में ‘दार्जिलिंग टी’ जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला भारतीय उत्पाद है। कांगड़ा की पेंटिंग, नागपुर का संतरा और कश्मीर का पश्मीना भी जीआई पहचान वाले उत्पाद हैं। दार्जिलिंग की चाय और मलिहाबाद के आम, चंदेरी की साड़ी जैसे करीब 370 उत्पाद अपने क्षेत्र की पहचान से जुड़े हैं। सरकार ने 2020 में 14 उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) प्रदान किया है, जिनमें हिमाचल का काला जीरा, छत्तीसगढ़ का जीराफूल और ओडिशा की कंधमाल हल्दी जैसे उत्पाद शामिल हैं, मणिपुर का काला चावल और गोरखपुर का टेराकोटा भी शामिल है। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (Department for Promotion of Industry and Internal Trade&DPIIT) के आँकड़ों के अनुसार, कर्नाटक की कुर्ग अरेबिका कॉफी, केरल के वायनाड की रोबस्टा कॉफी, आंध्र प्रदेश की अराकू वैली अरेबिका, कर्नाटक की सिरसी सुपारी और हिमाचल के चूली तेल को भी जीआई टैग प्रदान किया गया हैं। महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी, जयपुर की ब्लू पॉटरी, बनारसी साड़ी और तिरुपति के लड्डू सहित कई उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। मई 2010 में हिमालय की तलहटी से नीचे सिंधु-गंगा के मैदान (Indo-Gangetic Plains - IGP) में स्थित क्षेत्र में उत्पादित बासमती चावल के लिये यह प्रमाण पत्र प्राप्त किया था। इसमें 7 राज्यों (हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश (पश्चिमी यूपी के 26 जिले) और दिल्ली)  के क्षेत्र शामिल हैं। भारतीय बासमती चावल के लिए जीआई टैग मिलने के बाद यूरोपीय यूनियन को बासमती चावल का निर्यात करीब दोगुना हो गया है। बासमती चावल का भाव 868 डॉलर प्रति टन के हिसाब से मिलता है जबकि नॉन बासमती चावल का भाव 337 डॉलर प्रति टन के हिसाब से मिलता है। 

मलिहाबादी दशहरी आम को एक दशक से अधिक समय पहले जीआई टैग मिलने के साथ, सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर ने अब गौरजीत, बनारसी लंगड़ा, चौसा और रतौल की किस्मों के लिए भौगोलिक संकेत टैग प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। एक बार जब किस्मों को जीआई टैग मिल जाता है, तो इन आमों के उत्पादकों को अच्छी कीमत मिलने की संभावना होती है और अन्य क्षेत्रों के किसान नाम का दुरुपयोग करके अपने फलों का विपणन नहीं कर सकते।

वर्ष 2020 में कश्मीरी केसर को ’भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री’ (Geographical Indications Registry) द्वारा ’भौगोलिक संकेतक’ (Geographical Indication - GI) का टैग प्रदान किया गया। कश्मीरी केसर का सुगंधित मसाले के रूप में उपयोग किया जाता है, साथ ही इसमें औषधीय गुण होते हैं। कश्मीरी केसर पूरी दुनिया में सबसे अधिक उच्च क्वालिटी का माना जाता है। कश्मीरी केसर अन्य देशों के केसर से अलग हैं कश्मीरी केसर जैसे उच्च सुगंध, गहरे रंग, लंबे और मोटे धागे के कारण अधिक औषधीय मूल्य वाले गुणों में श्रेष्ठ माना जाता है। यह मुख्य रूप से पुलवामा, बडगांव, किस्तवार और श्रीनगर में पैदा किया जाता है।  विश्व में सबसे अधिक केसर उत्पादन करने वाला देश ईरान है जो कि जो हर साल 30,000 हेक्टेयर भूमि पर 300 टन से अधिक केसर की खेती करता है। इसके अलावा स्पेन, अफग़ानिस्तान निम्न क्वालिटी का केसर कम कीमत में बेचते हैं। 

भारत सदियों से सिल्क वस्त्रों का निर्यात करता रहा हैं। हजारों वर्ष पहले सिल्क रूट से यूरोप, सुदूर पूर्व देशों, मध्य पूर्व देशों में भारत के सिल्क व्यापार के साक्ष्य मिले है। हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम अपने विशिष्ट सिल्क की गौरव पूर्ण विरासत को जाने और उनको धारण करें। हम विभिन्न प्रदेशों और क्षेत्रों के सभी विशिष्ट सिल्क परिधानों और साड़ियों को जीआई टेग के द्वारा अपने सिल्क उद्योग को देश विदेश में प्रोत्साहित और उन्नत कर सकते हैं जिससे हमारे सिल्क कारोबारियों को अपने सिल्क उत्पादों उचित लाभ मिल सके और हमारे देश का सिल्क उद्योग प्राचीन काल की पूर्व विरासत को प्राप्त कर सके। अभी तक केवल कुछ ही सिल्क उत्पादों को जी आई टैग मिला है। 

इसके अतिरिक्त मुरादाबाद उत्तर प्रदेश के पीतल के बर्तन, जगाधरी हरियाणा के स्टील के बर्तन, अलीगढ़ के टाले, खुर्जा की पोटरी, मथुरा के पेड़े, केरल और तमिलनाडू के मसाले, मेरठ उत्तर प्रदेश के स्पोर्ट्स और हेंडलूम के उत्पाद जैसे अनेकों उत्पादों को जी आई टैग द्वारा इनके उद्यमियों और कारोबारियों को उचित लाभ, व्यापार में उन्नति और इन स्थानों के कारीगरों की आर्थिक स्थिति सुद्रढ़ हो सकती है। भारतीय उद्योगों में अभी अपार संभावनाएं हैं।

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