भारत के लिए, यह समय सबसे नाजुक है। हमारे पास दुनिया की सबसे युवा आबादी है, लेकिन हमारी उम्र भी तेजी से बढ़ रही है। हमारे पास ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ है, लेकिन अगर हमने रोजगार, शिक्षा और स्वास्थय में निवेश नहीं किया, तो यह ‘डेमोग्राफिक डिजास्टर’ बन सकता है। - प्रो. दीपक शर्मा
साल 2026 का आधा बीतते-बीतते दुनिया की आबादी 8.2 अरब के आंकड़े को पार कर चुकी है। हर छह हफ्ते में हम न्यूयॉर्क शहर के बराबर आबादी जोड़ रहे हैं। फिर भी, इतिहास में पहली बार, 14वीं सदी के ब्लैक डेथ के बाद से, लगभग हर महाद्वीप में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार एक साथ धीमी हो रही है। 20वीं सदी ‘अधिक लोगों’ की सदी थी, लेकिन 21वीं सदी ‘कौन’ और ‘कहाँ’ की सदी होगी। दुनिया एक मौन, परंतु गहरे बदलाव के दौर से गुजर रही है, जो राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज की बुनियाद को हिला सकता है।
1975 और 2011 के बीच, दुनिया हर 12 साल में एक अरब लोग जोड़ती थी। यह दौर अब खत्म हो गया है। संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व जनसंख्या संभावनाएं 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, मानवता 2080 के दशक के मध्य में 10.3 अरब पर चरम पर पहुंचेगी और फिर धीरे-धीरे घटने लगेगी। पहले से ही 60 से अधिक देश हर साल सिकुड़ रहे हैं। चीन ने 2024 में 2 मिलियन लोग खो दिए और 2100 तक उसकी आबादी आधी हो सकती है। जापान 2010 से सिकुड़ रहा है, और आज वहाँ बेबी डायपर से ज्यादा एडल्ट डायपर (बुजुर्गों के लिए) बिकते हैं। इटली में पिछले साल 1861 के बाद पहली बार 4 लाख से कम बच्चे पैदा हुए। बुल्गारिया ने 1989 के बाद से अपनी 22 प्रतिशत आबादी खो दी है।
इस गिरावट का मुख्य कारण ‘प्रजनन दर’ (फर्टिलिटी रेट) में कमी है। 1950 में वैश्विक औसत प्रजनन दर 5 बच्चे प्रति महिला थी, जो अब घटकर 2.25 रह गई है। दुनिया के दो-तिहाई देश अब 2.1 की ‘प्रतिस्थापन दर’ (रिपलेशमेंट रेट) से नीचे हैं, जो जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए जरूरी है। यूरोप में यह दर 1.5 है, पूर्वी एशिया में 1.2, और लैटिन अमेरिका में भी यह घटकर 1.8 हो गई है। यह वैश्विक नक्शा दो भागों में बंट रहा है। जहाँ अधिकांश क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि रुक रही है, वहीं उप-सहारा अफ्रीका 2050 तक 1 अरब लोग जोड़ेगा, जो कुल वैश्विक वृद्धि का आधा से अधिक है। नाइजीरिया की आबादी 375 मिलियन तक पहुँचकर अमेरिका को पीछे छोड़ देगी। तंजानिया, इथियोपिया और कांगो में 60-80 मिलियन की वृद्धि होगी।
भारतः जनसांख्यिकीय धुरी
भारत इस वैश्विक बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण और केंद्र बिंदु है। 1.46 अरब की आबादी के साथ, भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश बना हुआ है और सिर्फ ‘मोमेंटम’ (जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार) के कारण हर साल 1 करोड़ लोग जोड़ रहा है। 2021 से भारत की कुल प्रजनन दर 1.9 हो गई है, जो प्रतिस्थापन दर से नीचे है। केरल में यह दर 1.5 है, जबकि बिहार में 3.0 बनी हुई है, यह उत्तर-दक्षिण का बड़ा विभाजन दिखाता है।
भारत में औसत आयु 29 वर्ष है, जो इसे लगभग 15 साल की ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (डिमोग्राफिक डिविडेंट) की खिड़की देती है। लेकिन देश में पहले से ही 15.3 करोड़ लोग 65 वर्ष से अधिक हैं, जो 2050 तक 34.7 करोड़ हो जाएंगे, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बुजुर्ग समूह होगा। शहरीकरण एक और बड़ी चुनौती है। केवल 36 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है, लेकिन 2050 तक भारत को 41.6 करोड़ और शहरी निवासियों को समायोजित करना होगा, जो इतिहास का सबसे बड़ा शहरी विस्तार होगा।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि स्नातकों में बेरोजगारी दर 45 प्रतिशत है। अगर भारत को हर साल 1.2 करोड़ नए गैर-कृषि रोजगार सृजित करने होंगे, एक नया पेंशन स्तंभ बनाना होगा, और 25 वर्षों में एक नया ‘शहरी फ्रांस’ बसाना होगा, तो जनसांख्यिकीय लाभांश ‘आपदा’ में बदल सकता है। वहीं, भारतीय प्रवासी 2024 में 129 अरब डॉलर का प्रेषण (रेमिटेंस) भेजकर दुनिया में सबसे आगे हैं।
बूढ़ी होती दुनिया और ‘सिल्वर इकोनॉमी’
हम सिर्फ लोग नहीं जोड़ रहे, बल्कि बूढ़े लोग जोड़ रहे हैं। 2026 में मानवता का 10 प्रतिशत 65 वर्ष से अधिक का है। 2050 तक यह 16 प्रतिशत हो जाएगा। 80 वर्ष से अधिक लोगों की संख्या तीन गुना बढ़कर 45.9 करोड़ हो जाएगी। जापान इसका पूर्वावलोकन हैः वहाँ 30 प्रतिशत नागरिक 65 से अधिक हैं, और 15 प्रतिशत घर खाली हैं। इटली में औसत आयु 48 वर्ष है। चीन में ‘एक बच्चा नीति’ और बढ़ती उम्र का मतलब है कि 60$ आबादी 2050 तक 29.7 करोड़ से बढ़कर 52 करोड़ हो जाएगी। पारंपरिक कन्फ्यूशियस मॉडल, जहाँ बेटे माता-पिता की देखभाल करते थे, टूट रहा है क्योंकि अब एक बच्चे के लिए दो माता-पिता और चार दादा-दादी हैं।
प्रवासनः एकमात्र उपाय?
जब जन्म दर गिरती है, तो प्रवासन ही जनसंख्या परिवर्तन का मुख्य कारण बन जाता है। ओईसीडी के 38 देशों में से 27 में यही स्थिति है। कनाडा ने 2023 में 13 लाख लोग जोड़े, जिसमें 98 प्रतिशत प्रवासन से थे। जर्मनी बिना नए आप्रवासियों के 50 साल तक सिकुड़ता रहता। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और यूके सभी विकास के लिए प्रवासन पर निर्भर हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 28.1 करोड़ अंतरराष्ट्रीय प्रवासी हैं, जो 2000 में 17.3 करोड़ थे। प्रेषण (रेमिटेंस) 2024 में 860 अरब डॉलर तक पहुँच गए। जलवायु परिवर्तन इसका अगला बड़ा कारण बनेगा। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2050 तक जल तनाव, फसल विफलता और समुद्र-स्तर वृद्धि के कारण 21.6 करोड़ लोग अपने ही देशों में विस्थापित हो सकते हैं। बांग्लादेश, वियतनाम और साहेल क्षेत्र शुरुआती हॉटस्पॉट हैं।
निष्कर्ष
200 वर्षों तक, श्अधिक लोगोंश् का मतलब ‘अधिक शक्ति’ था। यह संबंध अब टूट रहा है। नए सवाल हैं कि बूढ़ों की देखभाल कौन करेगा? कर कौन चुकाएगा? फैक्ट्रियों और अस्पतालों में कौन काम करेगा? जनसांख्यिकी भाग्य नहीं है, लेकिन यह सीमाएँ निर्धारित करती है। जो देश पारिवारिक नीति, आप्रवासन, बुजुर्ग देखभाल और शहरी नियोजन को फिर से डिजाइन करेंगे, वे फलेंगे-फूलेंगे। जो आंकड़ों से लड़ेंगे, वे बूढ़े, सिकुड़े हुए और प्रभावहीन हो जाएंगे। विश्व का रंगमंच फिर से बन रहा है। दर्शक बदल रहे हैं, और कुछ सीटें जल्द ही खाली हो जाएंगी।
भारत के लिए, यह समय सबसे नाजुक है। हमारे पास दुनिया की सबसे युवा आबादी है, लेकिन हमारी उम्र भी तेजी से बढ़ रही है। हमारे पास ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ है, लेकिन अगर हमने रोजगार, शिक्षा और स्वास्थय में निवेश नहीं किया, तो यह ‘डेमोग्राफिक डिजास्टर’ बन सकता है। हमें 25 सालों में एक ‘नया फ्रांस’ बसाना है, 12 करोड़ नौकरियां बनानी हैं, और अपने बुजुर्गों की देखभाल की व्यवस्था करनी है। दुनिया बदल रही है, और भारत को इस बदलाव को न केवल स्वीकार करना होगा, बल्कि उसे अपनी ताकत में बदलना होगा।