भारतीय एक्सचेंजों पर ‘क्वांटो क्रॉस करेंसी डेरिवेटिव’ जैसी योजनाएं लाने से निवेशकों को विनियमित घरेलू मंचों के माध्यम से वैश्विक मुद्राओं का व्यापार करने का अवसर मिलेगा। साथ ही इससे भारतीय मुद्रा के साथ एक विदेशी मुद्रा की जोड़ी के अलावा दूसरे अनुबंधों का क्षेत्र बढ़ाकर एक्सचेंज-ट्रेडेड करेंसी (करेंसी डेरिवेटिव) व्यापार पुनः बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। - विनोद जौहरी
पश्चिम एशिया में अमेरिका एवं ईरान तथा इस्राइल एवं लेबनॉन के मध्य युद्ध के चलते कच्चे तेल की आपूर्ति में अवरोध और होर्मुज जलडमरुमध्य में अमेरिकी और ईरानी वर्चस्व के कारण तेल के जहाजों का मार्ग बार बार बंद होने के कारण सम्पूर्ण विश्व में तेल की कीमतों में भारी वृद्धि के चलते रुपये की कीमतों में गिरावट आई है। अमेरिकी डॉलर के सापेक्ष विश्व की लगभग सभी मुद्राओं में गिरावट के संकेत है। इसके कारण हमारे आयात महंगे हुए और निर्यात में कमी आई। विदेशी निवेशकों ने भारत के शेयर बाज़ार और सेक्योरिटीज में भारी बिकवाली की और अपना निवेश कम किया है। ऐसी परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि वैश्विक मुद्राओं की अस्थिरता का विपरीत प्रभाव हमारे आयातकों, निर्यातकों और निवेशकों पर कम से कम पड़े। इसी दिशा में नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज की ओर से सकारात्मक पहल की गयी है।
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज घरेलू मुद्रा बाजार में आद्यतन बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक से ‘क्वांटो क्रॉस-करेंसी डेरिवेटिव्स’ लॉन्च करने की स्वीकृति मांग रहा है। एनएसई के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम के स्रोतों से यह जानकारी हुई है। एनएसई को यह नया उत्पाद लाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि घरेलू करेंसी डेरिवेटिव्स बाज़ार में ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत तेजी से गिरा है। मार्च 2024 में जहां एनएसई पर यह वॉल्यूम 33,165 करोड़ रुपया था, वहीं जून 2026 तक यह घटकर मात्र 5,000 करोड़ रुपया के रह गया। इस भारी गिरावट का कारण रिजर्व बैंक का वह नियम था, जिसके अंतर्गत निवेशकों के लिए करेंसी डेरिवेटिव्स में ट्रेड करने के लिए अंडरलाइंग फॉरेन करेंसी एक्सपोजर (विदेशी मुद्रा का वास्तविक लेनदेन या आवश्यकता) का साक्ष्य देना अनिवार्य कर दिया गया था। इस नियम से पहले सट्टेबाज (स्पेक्युलेटर्स) और आम निवेशक बहुत सुगमता से ट्रेड कर पाते थे। इसका प्रभाव यह हुआ कि जनवरी 2025 से बीएसई के करेंसी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में कारोबार लगभग शून्य हो चुका है।
यह उत्पाद निवेशकों को मुद्रा जोखिम के बिना करेंसी जोड़ी में व्यापार करने की अनुमति देगा जैसे यूरो-डॉलर या पाउंड-डॉलर। क्वांटो क्रॉस-करेंसी डेरिवेटिव एक वित्तीय अनुबंध है। यह निवेशकों को विदेशी मुद्राओं के उतार-चढ़ाव से लाभ अर्जित करने में सहायता करता है। यह अनुबंध विदेशी मुद्राओं की गति पर दृष्टि रखता है जबकि लाभ और हानि का निपटान एक तय ‘कन्वर्जन मैकेनिज्म’ के अंतर्गत पहले से निश्चित मुद्रा में किया जाता है। ‘कन्वर्जन मैकेनिज्म’ वह प्रक्रिया है जिसके तहत एक वित्तीय संपत्ति या मुद्रा पूर्व-निर्धारित शर्तों पर दूसरे रूप में परिवर्तित की जाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि निवेशक को अपने लाभ या हानि को अपनी घरेलू मुद्रा में बदलने का जोखिम नहीं उठाना पड़ता। उदाहरण के लिए यदि निवेशक यूरोप की मुद्रा यूरो के बाजार में निवेश करते हैं और यदि क्वांटो का उपयोग करते हैं, तो आपको केवल यूरो के भाव का ध्यान रखना होगा। यदि यूरो मजबूत होता है, तो पूरा लाभ मिलेगा। इस बात की चिंता नहीं करनी होगी कि डॉलर के मुकाबले रुपये का भाव कब बदल रहा है। निपटान के समय करेंसी बदलने का कोई खतरा नहीं होता। निवेशक बिना सीधे विदेशी मुद्रा खरीदे वैश्विक बाजारों में सीधे ट्रेड कर सकते हैं।
सूचीबद्ध होल्डिंग कंपनी रोज मर्क के चेयरमैन एवं स्वतंत्र निदेशक और वरिष्ठ वित्तीय सेवा क्षेत्र व्यवसायी उदय तरदलकर ने कहा, ‘इन अनुबंधों को मात्रा समायोजित (क्वांटिटी एडजस्टेड) कहा जाता है। ये विदेशी निवेशकों के लिए हमारे बाजार में एक अच्छा अवसर हो सकते हैं क्योंकि वे मुद्रा दर तय कर सकेंगे और उन्हें इस पर कोई संभावित हानि भी नहीं उठानी होगी। क्रॉस-करेंसी डेरिवेटिव में संभावित हानि न होना इस तरह के निवेश की सबसे बड़ी विशेषता है।
एनएसई कई अन्य योजनाओं के लिए भी बाजार नियामक से मंजूरी स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहा है। इन योजनाओं में जिंस डेरिवेटिव खंड में थर्मल कोल अनुबंध है और कॉरपोरेट बॉन्ड इंडेक्स पर ब्याज दर डेरेविटिव सम्मिलित हैं। एमसीक्यूब के मैनेजिंग पार्टनर एवं मल्टी-कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) के पूर्व एमडी एवं सीईओ मृगांक परांजपे ने कहा कि हेजिंग के लिए इस्तेमाल किए जा सकने वाले अनुबंध स्वागत योग्य हैं। उन्होंने कहा, हमारे देश में मुद्रा और जिंस से जुड़े जोखिम की हेजिंग (यानी जोखिम से सुरक्षा से बचने का उपाय) के बारे में जानकारी की कमी है या लोग इसमें रुचि नहीं लेते। अगर लोगों में रुचि और रुझान हो तो भी योजनाओं की कमी है। एक्सचेंजों को ऐसे कारोबार के बारे में सोचना चाहिए जिसमें संभवतः तुरंत सफलता भले ना मिले, परंतु ऐसी योजनाओं का प्रारम्भ शुभ संकेत है। भारतीय एक्सचेंजों पर ‘क्वांटो क्रॉस करेंसी डेरिवेटिव’ जैसी योजनाएं लाने से निवेशकों को विनियमित घरेलू मंचों के माध्यम से वैश्विक मुद्राओं का व्यापार करने का अवसर मिलेगा। साथ ही इससे भारतीय मुद्रा के साथ एक विदेशी मुद्रा की जोड़ी के अलावा दूसरे अनुबंधों का क्षेत्र बढ़ाकर एक्सचेंज-ट्रेडेड करेंसी (करेंसी डेरिवेटिव) व्यापार पुनः बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। एक विशेषज्ञ ने कहा,‘पिछले छह महीनों से बाजार में इस बात पर चर्चा हो रही है कि एक्सचेंजों को यूरो-डॉलर, पाउंड-डॉलर और डॉलर-येन जैसी गैर भारतीय मुद्रा जोड़ी में क्रॉस-करेंसी डेरिवेटिव के प्रस्ताव प्रस्तुत करने की स्वीकृति दी जानी चाहिए।’ एक सरकारी बैंक के विदेशी मुद्रा डीलर ने कहा, ‘बाजार का मानना है कि रुपये के अलावा क्रॉस-करेंसी डेरिवेटिव की अनुमति देने से एक्सचेंजों पर व्यापारिक गतिविधियां फिर बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।’
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, अब एनएसई को आशा है कि बिना करेंसी रिस्क वाले इन ‘क्वांटो कॉन्ट्रैक्ट्स’ के आने से बड़े संस्थागत और अंतरराष्ट्रीय निवेशक दोबारा भारतीय बाजारों का रुख करेंगे। यदि आरबीआई से इसकी स्वीकृति मिलती है, तो यह सेगमेंट एक बार फिर गति पकड़ सकता है।
(स्रोत - मनी9लाइव एवं बिज़नस स्टैंडर्ड 6 जुलाई 2026)