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एकजुट प्रयास से हरी भरी रहेगी धरती

पृथ्वी दिवस यह संदेश देता है कि दुनिया भर के लोगों को एकजुट होकर पृथ्वी को बचाने के लिए संकल्प लेना होगा। — डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्र

 

इस साल पृथ्वी दिवस की थीम ‘इन्वेस्ट इन आवर प्लेनेट’ है। यह थीम हमें संदेश देती है कि हमारी धरती को एक साथ संरक्षित करने का समय आ गया है ताकि हरित समृद्धि के जरिए दुनिया भर के लोगों को समृद्ध जीवन उपलब्ध कराया जा सके।

पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति उपेक्षा का ही परिणाम है कि सुंदर हरी भरी धरती प्रदूषित होती जा रही है। जिस पृथ्वी को हम मां का दर्जा देते हैं, उसे हम खुद अपने ही हाथों दूषित करने में कैसे लगे रहते हैं? आज जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है। अगर पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्न लग जाए तो मानव जीवन कैसे सुरक्षित एवं संरक्षित रहेगा? पृथ्वी है तो सारे तत्व हैं। इसलिए पृथ्वी अनमोल है। इसी पृथ्वी के सहारे आकाश है, जल है, अग्नि है, और हवा है। ‘छिति जल पावक गगन समीरा’ इन्हीं के मेल से प्रकृति की संरचना सुंदर एवं जीवंत होती है, पर आगे बढ़ने की होड़ में आज पूरी दुनिया पृथ्वी नामक ग्रह को तबाह करने पर तुली हुई है।

आज विश्व भर में हर जगह प्रकृति का दोहन एवं शोषण हो रहा है। जिसके कारण पृथ्वी पर अक्सर उत्तरी ध्रुव की ठोस बर्फ का कई किलोमीटर तक पिघलना, सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओजोन परत में छेद होना, भयंकर तूफान सुनामी और भी कई एक तरह की प्राकृतिक आपदाओं के होने से समस्याएं विकराल होती जा रही है। जिसके लिए केवल मनुष्य ही जिम्मेदार है। कई एक रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल वार्मिंग के जो रूप आज हमारे सामने हैं इसकी आपदाएं दिनों दिन अगर पृथ्वी पर ऐसी ही बढ़ती रही तो वह दिन दूर नहीं जब जीव-जंतु के साथ वनस्पतियों के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाएगा। प्रचंड गर्मी से लोगों की त्वचा झुलसने लगेगी। कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ने का अनुमान है। समुद्र का जल स्तर बढ़ने से तटवर्ती इलाके उसके चपेट में आएंगे और लाखों करोड़ों की आबादी देखते ही देखते काल के गाल में समा जाएगी। दुनिया भर में कोरोना जैसी महामारियां बढ़ेगी और जनजीवन को संकट में डालती रहेंगी।

दुनिया के ताकतवर देश लाभ कमाने की गरज से पृथ्वी पर लगातार अत्याचार कर रहे हैं। वैश्विक बैठकों में पृथ्वी को बचाने के लिए वही देश बड़े-बड़े दावे करते हैं लेकिन मंच से उतरते ही लाभ की अंधी दौड़ में सबसे आगे होते हैं। कई बार तो इनकी कारगुजारियों का खामियाजा अल्प विकसित और विकासशील देशों को भी उठाना पड़ता है। दुनिया भर के देश पृथ्वी सम्मेलन में जुटते हैं। पृथ्वी को बचाने के लिए नीति और नियम भी बनाते हैं लेकिन वे खुद ही उन नियमों की धज्जियां भी उड़ाने लगते हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि ऐसे अत्याचारों को रोकना होगा तथा कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर ध्यान केंद्रित करना होगा। मनमाने ढंग से विकसित हो रही औद्योगिक क्रांति पर नियंत्रण करना होगा, साथ ही साथ उन हर इकाइयों के बारे में गंभीरता से सोचना होगा जिसके कारण प्रदूषण में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और पृथ्वी का अस्तित्व संकट में फंसता जा रहा है।

दुनिया के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त आंकड़ों पर गौर करें तो कई प्रजाति के जीव-जंतु, प्राकृतिक स्रोत एवं वनस्पति विलुप्त हो रहे हैं। जिसके चलते पृथ्वी पर असंतुलन बढ़ रहा है। मालूम हो कि विलुप्त होते जीव-जंतुओं और वनस्पति की रक्षा के लिए ही विश्व समुदाय को जागरूक करने के लिए इस दिवस को मनाया जाता है। आज दुनिया में सबसे बड़ी चिंता लगातार विकराल एवं भीषण आकार ले रही गर्मी, सिकुड़ रहे जल स्रोत, विनाश की ओर धकेली जा रही पृथ्वी एवं प्रकृति के विनाश के प्रयास ही हैं। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति और पर्यावरण का नियमित दोहन, यह सब पृथ्वी एवं पृथ्वीवासियों के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में चिन्हित किए गए हैं और इन्हीं खतरो का अहसास कराना ही पृथ्वी दिवस का ध्येय है।

प्रति वर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है, आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ती जा रही है। हर आवश्यक चीज की उपलब्धता कम हो रही है। ऑक्सीजन की भी कमी है। इससे इतर हमारा सुविधावादी नजरिया एवं हमारी जीवन शैली पृथ्वी और उसके पर्यावरण एवं प्रकृति के लिए गंभीर खतरा बनकर प्रस्तुत हुई है।

जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों से पृथ्वी और प्रकृति का निर्माण होता है। यदि यह तत्व न हो तो पृथ्वी और प्रकृति इन तीनों तत्वों के बिना अधूरी है। बियाबान जैसी है। विश्व में ज्यादातर समृद्ध देश वही माने जाते हैं जहां इन तीनों तत्वों की बहुलता है। आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ में इन्हीं तीन संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, आज अनेक शहर पानी की कमी से परेशान है।

दुनिया का समाज कितना बदल गया है। पहले का समाज वृक्षों को काटने से रोकता था। गोचर भूमि का कोई भी टुकड़ा किसी को हथियाने नहीं देता था। जल के एक-एक बूंद की रक्षा की जाती थी। पशु पक्षियों के हर सुख-दुख का ख्याल रखा जाता था। लेकिन आज का मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए सही तरीके से प्रकृति का संरक्षण न तो खुद कर पा रहा है, न हीं इस दिशा में कार्य कर रहे लोगों को सहयोग दे रहा है। इन्हीं सब अनदेखी का कारण है कि बार-बार प्राकृतिक आपदाएं कहर बरपा रही हैं। बाढ़ ग्रस्त इलाकों में सूखा पड़ रहा है, तो रेगिस्तान में बाढ़ का नजारा दिख रहा है, क्योंकि मनुष्य पृथ्वी का संरक्षण नहीं कर पा रहा है। इसलिए पृथ्वी भी अपना गुस्सा कई प्राकृतिक आपदाओं के रूप में बार-बार दिखा रही है। वह दिन दूर नहीं होगा जब हमें शुद्ध पानी, उपजाऊ भूमि, शुद्ध वातावरण, शुद्ध वनस्पतियां नहीं मिल सकेगी, आखिर इन सबके बिना हमारा जीवन कैसा होगा?

मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए पॉलीथिन बनाई, लेकिन वही पॉलीथिन पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है। पॉलिथीन के कारण भूमि की उर्वरक क्षमता कम हो गई है। इसको जलाने से निकलने वाला धुआं ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचाता है, जो ग्लोबल वार्मिंग का एक बड़ा कारण है। देश में प्रतिवर्ष लाखों पशु-पक्षी पॉलिथीन के कचरे से मर रहे हैं। इससे लोगों में कई प्रकार की बीमारियां फैल रही है। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत पूरा करती है, इसलिए मनुष्य की भी यह जिम्मेदारी है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से जो भी बन सके, वह प्रयास करें। हमें पानी बचाने की तरकीब खोजनी चाहिए। वर्षा के जल को पुनः उपयोग में लाने वाली प्रणाली को विकसित करना चाहिए। बिजली की बर्बादी को नहीं रोका गया तो आने वाले दिन अंधेरे में गुजारने पड़ सकते हैं। हमें कागज के उपयोग को सीमित करना होगा, क्योंकि कागज पेड़ों की लकड़ी से ही बनते हैं जिसके लिए हमें बड़ी तादाद में पेड़ काटने पड़ते हैं। भूमि के जहरीले होने के कारण वनस्पतियों में भी विषाक्तता बढ़ रही है, हमें इस बारे में भी चिंतित कदम उठाने चाहिए।

गर्मी के मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों में जंगल जलते रहते हैं। सवाल जब ऐसी घटनाओं से हम हर साल दो-चार होते हैं तो भविष्य के लिए कोई योजनाएं क्यों नहीं तैयार कर लेते? पिछले कुछ वर्षों से बार-बार सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र के विदर्भ और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में पीने की पानी की समस्या बढ़ी है। इन इलाकों के कई जलाशयों में पानी का स्तर क्षमता 10 फ़ीसदी से भी कम रह गया है। पेयजल के साथ-साथ फसलें भी संकटग्रस्त हैं। प्रदूषण के कारण सारी पृथ्वी दूषित हो रही है। ऐसे में पृथ्वी दिवस यह संदेश देता है कि दुनिया भर के लोगों को एकजुट होकर पृथ्वी को बचाने के लिए संकल्प लेना होगा।     

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