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विपक्ष है महिला आरक्षण में विलंब का दोषी

महिला आरक्षण विधेयक को पहले हमें उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझना पड़ेगा। वर्ष 2023 में ‘महिला आरक्षण कानून’ बना जिसके अंतर्गत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। यह कानून तो बन गया, लेकिन लागू नहीं हो पाया था। इसका कारण यह रहा कि इस कानून में यह कहा गया था कि यह कानून नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निधारण) के बाद ही लागू किया जा सकेगा। सर्वविदित है कि जनगणना वर्ष 2021 में होनी थी, जो कोविड महामारी के कारण स्थगित हो गई और अब उस जनगणना की प्रक्रिया जारी है, जो वर्ष 2028 से पहले पूर्ण नहीं हो सकेगी। जहां तक परिसीमन की प्रक्रिया का सवाल है वह जनगणना पूर्ण होने पर ही की जा सकेगी, क्योंकि संसदीय क्षेत्रों और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण जनगणना के बाद ही संभव हो सकता है। ऐसे में पूर्व में बने महिला आरक्षण कानून के आधार पर व्यावहारिक रूप से महिलाओं को आरक्षण इन सभी प्रक्रियाओं (जनगणना और परिसीमन) के बाद ही संभव है, और यह काम आने वाले 2029 के चुनावों तक संभव नहीं हो सकता था। ऐसे में महिला आरक्षण कानून को जल्दी लागू करने की दृष्टि से सरकार एक नवीन महिला आरक्षण अधिनियम (नारी शक्ति वंदन विधेयक) लेकर आई, जिसमें यह प्रावधान था कि लोकसभा और विधानसभाओं के क्षेत्रों का परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर ही कर दिया जाए। यह विधेयक 17 अप्रैल, 2026 को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के अभाव में पारित नहीं हो पाया और इस प्रकार महिला आरक्षण कानून के आधार पर निकट भविष्य में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए संभव नहीं होगा। इस बीच विपक्ष ने इस विधेयक के संबंध में कुछ तर्क सामने रखे हैं, जिनकी प्रासंगिकता समझने की जरूरत है। विपक्षी सदस्यों खासतौर पर तमिलनाडु के महत्वपूर्ण राजनीतिक दल डीएमके का कहना है कि यदि जनसंख्या के आधार पर लोकसभा की सीटों का पुनर्वितरण होता है तो उन्हें लोकसभा में आनुपातिक रूप से कम प्रतिनिधित्व मिलेगा, क्योंकि पिछले दशकों में तमिलनाडु जैसे दक्षिण के राज्यों ने सफलतापूर्वक जनसंख्या पर नियंत्रण किया है, जबकि उत्तर के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में जनसंख्या वृद्धि तेजी से हुई है। इस आपत्ति के निवारण हेतु, सरकार ने संसद में 50 प्रतिशत फार्मूला सुझाया है, जिसके अनुसार दक्षिण के राज्यों को भी उनकी वर्तमान संख्या के अनुपात में 50 प्रतिशत अतिरिक्त सीटें मिलेंगी। इस फार्मूले के आधार पर कर्नाटक को वर्तमान में 28 के स्थान पर 42, तमिलनाडु को 39 के स्थान पर 59, आंध्र प्रदेश को 25 के स्थान पर 38, तेलंगाना को 17 के स्थान पर 26 तथा केरल को 20 के स्थान पर 30 सीटें मिलेंगी। पूर्व में भी एनके सिंह की अध्यक्षता में 15वें वित्त आयोग ने वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करने हेतु जनसंख्या से इतर अन्य मापदंडों को स्थान दिया था, जिससे जनसंख्या कम होने पर भी उन्हें केंद्र से पर्याप्त हिस्सा प्राप्त हो सका था। इसका अभिप्राय यह है कि केंद्र सरकार ने जब यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी राज्य को भी सीटों का नुकसान नहीं होगा, तो ऐसे में इस अधिनियम का विरोध इस आधार पर करना सर्वथा अनुचित है। इसके अतिरिक्त कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल यह कह रहे हैं कि वे वास्तव में महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं, लेकिन वर्तमान अधिनियम में महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना के साथ जोड़ा जाना सही नहीं है। कांग्रेस का तर्क है कि इस बिल में महिलाओं के लिए आरक्षण को देशव्यापी परिसीमन प्रक्रिया (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना) के साथ जोड़ दिया गया है, जिसका महिलाओं के सशक्तीकरण से कोई लेना-देना नहीं है। उनका तर्क है कि यह भारत के चुनावी नक्शे को बदलने का एक प्रयास है। लेकिन यह सही तर्क इसलिए नहीं है कि 2023 में पारित अधिनियम में भी आरक्षण को जनगणना और परिसीमन के साथ जोड़ा गया था। 17 अप्रैल, 2026 को खारिज किए गए अधिनियम में तो इस संदर्भ में परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात कही गई थी, ताकि परिसीमन को जल्दी से पूर्ण करते हुए महिला आरक्षण को जल्द लागू किया जा सके। परिसीमन की प्रक्रिया एक नियमित काम रहा है। यह वर्ष 1951 से जारी है। कई कारणों से अब नए परिसीमन का समय आ गया है।

इसलिए कांग्रेस का यह तर्क कि महिलाओं के लिए आरक्षण को देशव्यापी परिसीमन (चुनाव क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करना) के काम से जोड़ा जा रहा है, सही नहीं है, क्योंकि यह एक संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि कोई अपनी मर्जी से किया जाने वाला काम। यह एक जरूरी प्रक्रिया है, जिसके बिना महिलाओं के लिए आरक्षण और महिलाओं का राजनीतिक सशक्तीकरण संभव नहीं है। कांग्रेस का यह तर्क कि सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण को परिसीमन को आगे बढ़ाने के लिए एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, जिससे कुछ खास इलाकों को राजनीतिक लाभ हो सकता है, सही नहीं ठहरता, क्योंकि यदि यह बिल खारिज भी हो जाता है, तो भी 2026 के बाद जब जनगणना पूरी हो जाएगी, तभी परिसीमन किया जा सकेगा। वर्तमान कानून के तहत, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नया परिसीमन करना जरूरी है। 17 अप्रैल को बिल खारिज होने के बाद केवल वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर केवल परिसीमन जल्दी करने का काम ही रुका है। इसलिए निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक 2026 पर विपक्ष की आपत्तियां वास्तव में भ्रामक और अविवेकपूर्ण हैं। मौजूदा परिस्थितियों में सरकार का रुख अधिक सही प्रतीत होता है कि विपक्ष महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में खड़े होने के अवसर का लाभ उठाने में विफल रहा है; परिणामस्वरूप महिला आरक्षण का शीघ्र कार्यान्वयन, जो अब विलंबित हो गया है, पूरी तरह से विपक्ष के कारण ही हुआ है।

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