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पशुधन से देश का आर्थिक विकास

Admin November 22, 2021

सरकार भी विदेशी मुद्रा के लालच में पशुवध पर कारगर रोक नहीं लगा पा रही है, क्यांकि पशुओं के बाल, हड्डी, खाल (चमड़ा), खून तथा मांस के निर्यात से अधिक मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त हो रही है। — डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

 

यह सर्वविदित है कि प्राचीन समय से ही भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित रही है तथा कृषि, देष में उपलब्ध पषुधन पर आधारित रहा है। हिन्दू सभ्यता में गौवंष के वध पर प्रतिबंध के लिए वैज्ञानिक, सामाजिक व आर्थिक कारण रहे हैं, परन्तु वर्तमान में जिस तेजी से गौवंष, अन्य दूधारू पषु तथा अन्य कृषि कार्यो के उपयुक्त पषुओं का वध हो रहा है वह निकट भविष्य में देष के आर्थिक विकास को अवरूद्ध कर देगा तथा भारतीय समाज के सामने कई सामाजिक समस्याएं भी उपस्थित कर देगा।

भारत के महान पूर्वजों ने बहुत ही असरदार तरीके से सदैव ही पषुवध को निषेध करार दिया है। भगवान महावीर, भगवान बुद्ध तथा वर्तमान समय के महापुरूष गांधी जी ने अपने अहिंसात्मक सिद्धांतों को जन-सामान्य तक पहुंचाने की भरसक कोषिष की है, परन्तु भारतीय संस्कृति के पष्चिमी संस्कृति की तरफ बढ़ते कदमों ने भारतीय पूर्वजों के अहिंसावादी आदर्षों को नजरअंदाज करते हुए निरंतर ही मांसाहार तथा आधुनिक कत्लखानों का प्रसार व विकास किया है। भारतीय संस्कृति में पशु जिसमें विशेषकर गायों को पालने वाले को गोपाल कहकर भगवान के बराबर का सम्मान दिया जाता रहा है।

प्रत्येक पांच वर्ष में भारत में पशुओं की संख्या जानने के लिए केन्द्र सरकार के एनिमल हंसबैंड्री विभाग द्वारा गणना 1919 से शुरु की गई है। इस गणना में सभी घरेलू तथा पालने वाले पशुओं की गणना की जाती है। राज्यों व केन्द्र शासित राज्यों के प्रशासन के सहयोग से अभी तक 19 गणनाएं पूर्ण हो चुकी है तथा 20वीं गणना अक्टूबर 2018 में गांवों व शहरी क्षेत्रों में की गई थी। इस गणना में गाय, भैंस, मिथुन (ग्याल), याक, बकरी, भेड़, सुअर, घोड़े, खच्चर, गदहे, ऊंट, कुत्ते, खरगोश तथा हाथी इत्यादि के साथ-साथ पोल्ट्री पक्षियों जैसे मुर्गे, बत्तख इत्यादि को शामिल किया गया। 20वीं पशु गणना के अांकड़े एकत्र करने के लिए आधुनिक तकनीक व कम्प्यूटर, लैपटॉप, टेबलेट आदि का प्रयोग किया गया। 20वीं पशु गणना देश के 6.6 लाख गांवों तथा 89,000 शहरी वार्ड़ों में कुल मिलाकर 27 करोड़ परिवारों में यह गणना की गई। इस गणना से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार कुल पशुओं की संख्या 535.82 मिलियन थी जो कि 2012 की तुलना में 4.6 प्रतिशत अधिक थी। गाय, भैंस, मिथुन (ग्याल), याक की 2019 में संख्या 302.82 मिलियन थी जो गत गणना से एक प्रतिशत अधिक थी। गोवंश की संख्या 2019 में 192.52 मिलियन थी जो गत गणना से 0.8 प्रतिशत अधिक थी। गायों की संख्या 145.2 मिलियन थी जो 2012 की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक थी। देशी गायों की संख्या में 6 प्रतिशत कमी देखी गई। भैंसों की संख्या 109.85 मिलियन थी जो गत गणना से एक प्रतिशत अधिक थी। भेड़ों की संख्या 74.26 मि., बकरियों की संख्या 148.88 मिलियन सुअरों की संख्या 9.06 मिलियन, मिथुन (ग्याल) की संख्या 3.8 लाख, याक की संख्या 58 हजार, घोड़े व खच्चरों की कुल संख्या 3.4 लाख, गदहों की संख्या 1.2 लाख, ऊंटों की संख्या 2.5 लाख, तथा कुल पौल्ट्री 851.8 मिलियन थी।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र में गायों की संख्या में सबसे ज्यादा गिरावट आयी, जबकि पश्चिम बंगाल में 15 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई। देशी गायों की संख्या में 6 प्रतिशत की गिरावट आयी। दुधारु पशुओं और विशेषकर गायों की रक्षा हेतु स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त से ही कानूनों के द्वारा हर संभव उपाय किया गया। नये बनने वाले भारत के लिए जब संविधान निर्माण के लिए दिसम्बर 1946 में सभा की स्थापना की गई तो गांधी जी सहित अनेक प्रमुख नेताओं के पास देश के विभिन्न हिस्सों से पत्रों व टेलीग्रामों के द्वारा यह मांग की गई कि गायों के काटने के कसाई गृहों को पूरे देश में अवैधानिक घोषित किया जाये तथा गायों की सुरक्षा के उपाय किये जाये। गायों का धार्मिक महत्व भी है। गायों की हत्या से साम्प्रदायिक दंगे भी भड़कते रहते है। संविधान सभा में प्रसिद्ध कांग्रेसी सेठ गोविन्द दास ने कहा था कि छुआछूत की तरह गायों के कत्ल को भी गंभीर अपराध का दर्जा दिया जाना चाहिए। गाय का कृषि व भारत की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण स्थान है। परन्तु नवम्बर 1948 में संविधान के ड्राफ्ट में गायों के कत्ल को अपराध बनाने के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया। संविधान के अनुच्छेद 48 पर विचार करते समय गाय को महत्वपूर्ण मानते हुए उसकी हत्या को अपराध मानने पर विचार किया गया, परन्तु पं. जवाहर लाल नेहरु ने इसको राज्यों का विषय बताया। परन्तु 1966 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा हिन्दू महासभा आदि हिन्दू संगठनों के नेतृत्व में गायों के संरक्षण के लिए एक लाख लोगों ने प्रदर्शन किया। इंदिरा गांधी ने इस पर विचार करने के लिए एक कमेटी का गठन कर दिया। इस कमेटी के अध्यक्ष देश के मुख्य न्यायाधीश थे। इस कमेटी ने 1973 में रिपोर्ट दी परन्तु इसकी रिपोर्ट पर कोई विशेष कार्यवाही नहीं की गई। विदेश व्यापार नीति में गाय के मांस के निर्यात पर प्रतिबध लगा दिया गया, परन्तु भैंसों के मांस के निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया। 

संविधान के अनुच्छेद 48 को आधार मानते हुए गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में गायों के कत्ल पर प्रतिबंध लगा दिया, परन्तु बंगाल में बूढ़ी व गर्भवती नहीं हो सकने वाली गायों के कत्ल के लिए सरकारी अधिकारी के उचित प्रमाण पत्र के आधार पर कत्ल करने का नियम बना दिया गया। केरल, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड़, सिक्किम, त्रिपुरा, मण्पिर, मिजोरम में गाय के कत्ल पर कोई अधिनियम नहीं है। भारत की सनातन संस्कृति व धर्म में समाज में गाय को विशेष स्थान दिया गया है जिससे भारत के विभिन्न राज्यों में गाय के कत्ल करने पर लोगों को जेल जाना पड़ता है जबकि कुछ राज्यों में गाय का वध कानून सम्मत है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड़ के अनुसार भारत में अधिकांश बूचड़खाने पुराने है तथा उनमें प्रदुषण को नियंत्रित करने के लिए कोई विशेष प्रबंध नहीं किये हुए है। उनके फर्श गंदे रहते है। पानी की पूर्ति पर्याप्त नहीं होती है। वेस्ट के निस्तारण का कोई उपाय नहीं है। भारत में 1176 बूचड़खाने है जिनमें से 75 ही आधुनिक है। बाकी अनगिनत गैर कानूनी बूचड़खाने है। 

सरकार भी विदेषी मुद्रा के लालच में पषुवध पर कारगर रोक नहीं लगा पा रही है, क्यांकि पषुओं के बाल, हड्डी, खाल (चमड़ा), खून तथा मांस के निर्यात से अधिक मात्रा में विदेषी मुद्रा प्राप्त हो रही है। परन्तु सरकार यह भूल जाती है कि इन पषुओं से मिलने वाला दूध, भारतीय जनस्वास्थ्य में भारी परिवर्तन लाने मेंं सक्षम है तथा भारत के बचपन को भी दूध की कमी की त्रासदी नहीं झेलनी पडे़गी। गौवंष कभी भी अनार्थिक नहीं होता है। उसके पालन-पोषण पर जितना भी खर्च आता है उससे अधिक लाभ वह प्रदान कर देता है। 

भारत के जीव जन्तु कल्याण बोर्ड के अनुसार भारत में 4,000 कत्लखानों को यंत्रीकृत करने की आवष्यकता है। सरकार द्वारा विदेषी मुद्रा के लालच में यह योजना अमल में लायी जा रही है जिससे प्रतिदिन लाखों पषु काटे जाएगें। भारतीय गौवंष रक्षण संवर्धन परिषद् के संगठन मंत्री के द्वारा एकत्र जानकारी के अनुसार प्रतिदिन 30,000 से अधिक गौवंष की हत्या हो रही है।

26 जनवरी 1950 से लागू देष के संविधान के 48वें अनुच्छेद में स्पष्ट निर्देष है कि गायें, उनके बछडे़ तथा अन्य दूध देने वाले पषु और जो कृषि के उपयोग में आने वाले पषु हैं, उनकी हत्या न हो, यह देखने की जिम्मेदारी सरकार की होगी।

संविधान में उल्लिखत नियमों का पालन हो और उदारीकरण के नाम पर आयात किये जाने वाले सडे़ और गंदे माल (मांस) का विरोध करना सरकार व प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है। यदि सरकार आर्थिक लोभवष अपनी नीति में परिवर्तन नहीं करती है तो देष की प्रबुद्ध जनता को आवाज उठानी चाहिए।

भारत की आजादी की प्रथम लड़ाई ही कारतूसों पर गाय की चर्बी लगाने के प्रकरण को लेकर ही शुरू हुई। स्वतंत्रता के बाद संविधान में गौवंष की रक्षा का संकल्प लिया गया, परन्तु वर्तमान से संविधान को सर्वोपरि मानने वाले से कुछ खादीधारी सत्ताधीष गौवंष के वध को रोकने के कोई उपाय नहीं कर रहे हैं जो कि पूर्णरूप से अनुचित है।

अभी तक गौवंष को हिन्दुओं की धार्मिक भावना के साथ ही जोड़कर देखा जाता रहा है तथा हिन्दुओं की गौवंष के वध की प्रतिबंध की मांग का मजाक उड़ाते हुए उसे साम्प्रदायिक मांग ही माना जाता रहा है जबकि हिन्दुओं की गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग को भारतीय समाज के आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक विकास के दृष्टिकोण से देखना परमावष्यक है।

आज वक्त आ गया है, जब गौवंष के वध पर पूर्ण प्रतिबंध तथा अन्य दुधारु व उपयोगी पषुओं पर प्रतिबंध लगाया जाये, तभी हमारी भारतीय संस्कृति, सभ्यता तथा मूल्य बच पायेंगे वरना तो हम आर्थिक समस्याओं के मकड़जाल में फंस कर रह जायेंगे।      

डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रवाल सनातन धर्म महाविद्यालय मुजफ्फरनगर 251001 (उ.प्र.), के वाणिज्य संकाय के संकायाध्यक्ष व ऐसोसियेट प्रोफेसर के पद से व महाविद्यालय के प्राचार्य पद से अवकाश प्राप्त हैं तथा स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार है।

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