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जलवायु परिवर्तन का सामना जरूरी 

Admin November 22, 2021

नैसर्गिक संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग और पर्यावरण से दुश्मनी ज्यादा दिन नहीं चल सकती। भारत ने एक मॉडल दिया हुआ है जो नैसर्गिक संसाधनों का मर्यादा में उपयोग और पर्यावरण के साथ दोस्ती की जीवन पद्धति की बात करता है। आत्मनिर्भरता और संपूर्ण जीवन इसी मॉडल से उभरेगा। — अनिल जवलेकर

 

इसमें कोई शंका नहीं है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है और उसका परिणाम भी दिख रहा है। दुनिया का वैचारिक विश्व अपने तरीके से इस बात की पुष्टि भी कर रहा है। लेकिन सत्ता में बैठे राजकीय क्षेत्र के महामानव अभी भी चर्चा में लगे हुए है और कोई ठोस कार्यवाही करने से बच रहे हैं। 31 अक्तूबर से 12 नवम्बर के दरम्यान फिर एक बार सारे नेतागण चर्चा करने हेतु ग्लासगों (यूके) में जमा हो रहे है और आशा की जा रही है कि इससे कुछ अच्छा निकल आएगा। वैसे यह बात अब स्पष्ट रूप से समझने की है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है और उसका सामना करने की तैयारी कर लेना ही आज की जरूरत है। 

जलवायु परिवर्तन और भारतीय किसान 

यह सही है कि जलवायु परिवर्तन का असर सभी क्षेत्र पर होगा। लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रभाव किसान और उसकी कृषि पर होगा। इसलिए भारत के किसान और उसकी कृषि पर होने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर ही जलवायु परिवर्तन से होने वाले तबाही का सामना करना होगा और उससे बचने के लिए तैयारी भी करनी होगी। सभी जानते है कि दुनिया भर में आँधी, तूफान, जंगलों में आग लगना और अनियमित बारिश होने की वारदातें बढ़ रही है। भारत में भी यह वारदातें बढ़ रही है और इसका प्रभाव किसान और कृषि पर पड़ रहा है। इस साल के मानसून ने जाते-जाते भी भारतीय किसानों को इसकी एक झलक दिखाई है। माना जाता रहा है कि 1850 से 1900 तक तापमान 1.1 डिग्री से बढ़ चुका है और आने वाले 20-30 वर्षों में वह 1.5 डिग्री तक पहुँच जाएगा। और इसी बढ़ते तापमान को रोकने की कोशिश हो रही है। इसलिए बढ़ते तापमान से कृषि को किस तरह बचाया जा सकता है और किसानों की किस तरह मदद की जा सकती है, इस पर सोच विचार की जरूरत है। 

संशोधन और उसकी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी

जलवायु परिवर्तन में तापमान का बढ़ना मुख्य है और बढ़ते तापमान को रोकना ग्लासगों में हो रहे (सीओपी-26) शिखर सम्मेलन में चर्चा का एक अहम मुद्दा है। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि तापमान बढ़ना रुका तो भी बढ़ी हुई गर्मी से होने वाले नुकसान को रोकना मुश्किल होगा। फिर भी दुनिया में संशोधन हो रहा है और ऐसी स्थिति से बचने के उपाय ढूँढे जा रहे है। भारतीय कृषि अनुसंधान करनी वाली संस्थाएँ भी इसमें संशोधन कर रही है। उनका बहुत सारा संशोधन कम समय में ज्यादा उत्पादन देने वाली तथा जलवायु  परिवर्तन का सामना कर पाने वाली फसलों पर हो रहा है। जरूरी है कि जो भी संशोधन हो रहा है और जो भी उपाय निकले, उनको स्वीकारना आवश्यक होगा और उसमें सभी को वैज्ञानिक दृष्टि अपनानी होगी। इसमें सरकार और समाज दोनों को एक दूसरे के साथ चलना होगा, ताकि कम समय में ली जाने वाली और जलवायु परिवर्तन के बदलते समय में मजबूती से खड़ी रहने वाली फसलों को स्वीकारा जा सके। इसलिए संशोधन पर बल देना जितना आवश्यक है, उससे ज्यादा नए संशोधनों को स्वीकारने की जरूरत होगी।

संकट समय की व्यवस्था जरूरी 

हमारी आज की व्यवस्थाएँ संकट आने के बाद मुख्यतः काम में लग जाती है। उसे बदलना होगा। संकट के समय किसान की मदद हो ऐसी योजना और उसकी व्यवस्था स्थिर रूप में कार्यशाली हो यह देखना होगा। किसान की पहली जरूरत बदलते मौसम के निश्चित अनुमान की है। बारिश हो या फिर तूफान कब कहाँ, कितनी तेजी से आ रहा है, इसकी निश्चित जानकारी किसान को मिलना जरूरी है। अभी भी मौसम की जानकारी सटीक नहीं होती। किसान इसके लिए कुछ भी नहीं कर पाता। इसलिए यह जरूरी है कि मौसम का सटीक पूर्वानुमान हो। दूसरी बात विपत्ति व्यवस्था भी किसान के काम आनी चाहिए। अगर खेत में फसल निकाल रखी हो तो किसान को उसको सुरक्षित जगह हटाने या ढ़कने में विपत्ति व्यवस्था का उपयोग होना चाहिए। ऐसे कई प्रकार से कृषि और किसान को मदद करने की व्यवस्था होना जरूरी है, जिससे किसान का या फसल का कम से कम नुकसान हो। तूफान और बारिश जैसे संकट के प्रति किसान निश्चित रहेगा, ऐसी व्यवस्था संकट के प्रभाव को कम कर सकती है, यह समझने की जरूरत है। 

नुकसान की भरपाई पूरी होनी जरूरी 

किसान की फसल जब किसी आँधी-तूफान या बे-मौसम बारिश या कम-ज्यादा ठंड-गरम मौसम की वजह से जाती है तो उस पर  मेहरबानी करने जैसी मदद की जाती है। वह भी देने की कोई निश्चित पॉलिसी नहीं होती या कोई फॉर्मूला भी नहीं होता। इसलिए यह मदद आधी-अधूरी होती है। किसान के पूरे नुकसान की क्षतिपूर्ति पूर्णरूप से होनी चाहिए, ऐसी नीति बनानी होगी। अब जबकि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन से फसल का नुकसान होना तय है, उसकी मदद करने का तरीका भी बदलना होगा। भारत की अब तक की सारी फसल बीमा योजनाएँ भी नाकाम रही है, यह बात भी समझनी पड़ेगी। इसलिए यह जरूरी है कि फसल बीमा योजना को पूर्ण विराम दिया जाए। अब समय आ गया है कि फसल बीमा की जगह कृषि आय बीमा योजना चलाई जाए। फसल और उससे आय का अनुमान लगाना अब मुश्किल नहीं रहा। हर क्षेत्र की कृषि भूमि की उत्पादकता और फसल उत्पादन को नजदीकी कृषि मंडी से जोड़ने से मिलने वाला उचित मूल्य तय किया जा सकता है और आय को अनुमानित किया जा सकता है। यह करने में क्षेत्रीय कृषि विश्वविद्यालय सक्षम है और उन्हें यह जिम्मेदारी दी जा सकती है। किसान की आय और उसकी सुनिश्चिति इस प्रश्न का एक हल हो सकती है। ऐसी ही आय बीमा योजना पर अब विचार होना चाहिए। आय की सुनिश्चिति सरकार और बीमा कंपनी दोनों ने मिलकर करनी चाहिए। यह आवश्यक है कि बीमा कंपनी को इसमें ज्यादा अधिकार न हो। सारी बातें सरकार अपनी तरफ से तय करें। बीमे की रकम भी सरकार अदा करें। बीमा योजना सर्वसमावेशक हो, जिसमें सभी प्रकार से होने वाले नुकसान को शामिल किया जाए। उसी तरह सभी किसान और सभी फसलें भी बीमा योजना में शामिल हो। किसान को इसमें न खिचा जाए। आय तय करने से लेकर नुकसान का अनुमान और बीमे की रकम मिलने तक की  जिम्मेवारी जिला या तालुका स्तर पर कृषि विश्वविद्यालयों को साथ लेकर एक समिति के जरिये होनी चाहिए, जिसमें सभी के प्रतिनिधि शामिल हो।  बीमा प्रीमियम सरकार वहन करे या किसी और तरीके से वसूले, लेकिन किसान को इससे अलग रखे। इसके लिए एक स्थायी फंड का निर्माण भी किया जा सकता है। यह हो सकता है कि किसान से बीमा प्रीमियम मिलने वाले बीमे की रकम से वसूली जाए। बीमा कंपनी का किसान से कोई प्रत्यक्ष संबंध आने की जरूरत नहीं है। तभी यह बीमा योजना सफल हो सकती है। सरकार ने इसकी पूरी जिम्मेवारी लेनी चाहिए और अपनी संस्थाओं तथा विश्वविद्यालयों के जरिये यह योजना अमल में लानी  चाहिए। किसान को अपने आय के बारे में आश्वस्त करना ही इस प्रश्न का सही हल है, यह समझने की आवश्यकता है। सरकार की यह एक प्रमुख जिम्मेवारी भी है। 

आर्थिक विकास मॉडेल पर भी ध्यान दे

वैसे यह बात अब स्पष्ट हो चुकी है कि आज का आर्थिक विकास मॉडल नैसर्गिक संसाधनों के शोषण पर आधारित है और उसकी वजह से अब पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। आज के जलवायु परिवर्तन का जो कारण बताया जा रहा है वह मानवी गतिविधियों से बढ़ने वाले कार्बन विसर्जन का है। उसकी वजह से तापमान बढ़ रहा है और वातावरण में गरमाहट बढ़ रही है। लेकिन इस मॉडल को बदलने की आज भी सार्वजनिक इच्छा नहीं है। हमें यह बात ध्यान रखनी होगी कि नैसर्गिक संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग और पर्यावरण से दुश्मनी ज्यादा दिन नहीं चल सकती। भारत ने एक मॉडल दिया हुआ है जो नैसर्गिक संसाधनों का मर्यादा में उपयोग और पर्यावरण के साथ दोस्ती की जीवन पद्धति की बात करता है। आत्मनिर्भरता और संपूर्ण जीवन इसी मॉडल से उभरेगा। कम से कम भारत उस दिशा की ओर बढ़े तो आने वाले समय में उपयुक्त होगा।          

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