बाबू गेनू का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वदेशी केवल वस्तुओं का उपयोग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और राष्ट्रप्रेम की भावना है। - विकास खितौलिया
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े नेताओं और प्रसिद्ध क्रांतिकारियों तक सीमित नहीं है। इस संघर्ष में असंख्य ऐसे साधारण लोग भी थे, जिन्होंने बिना किसी पद, पहचान या स्वार्थ के देष के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इन्हीं गुमनाम लेकिन महान बलिदानियों में एक नाम है स्वदेशी आंदोलन के अमर शहीद बाबू गेनू सैद। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रभक्ति किसी विशेष वर्ग या शिक्षा की मोहताज नहीं होती। यह तो हृदय की वह आग है, जो एक साधारण मजदूर को भी इतिहास में अमर बना देती है। बाबू गेनू भारत में स्वदेशी आंदोलन के लिए प्राण देने वाले पहले व एकमात्र शहीद माने जाते हैं। इसी कारण वह पूज्य बन गए। उन्होंने महात्मा गांधी के स्वदेशी और अहिंसक प्रतिरोध के सिद्धांतों को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि अपने जीवन से उन्हें साकार कर दिया। मात्र 22 वर्ष की आयु में उनका बलिदान यह दर्शाता है कि देशप्रेम की कोई उम्र नहीं होती।
बाबू गेनू का जन्म वर्ष 1908 में महाराष्ट्र के पुणे जिले के महालुंगे पडवल गांव में एक अत्यंत गरीब किसान परिवार में हुआ। उनके पिता ज्ञानोबा आब्टे और माता कोंडाबाई थीं। दो बड़े भाई एक बड़ी बहन के लाडले थे बाबू गेनू। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी, लेकिन जब बाबू मात्र दो वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। यह आघात इकलौता नहीं था, कुछ समय बाद खेती में उपयोग होने वाला बैल भी मर गया। इन घटनाओं ने परिवार की जीविका छीन ली। परिस्थितियों से विवश होकर बाबू की मां कोंडाबाई को गांव छोड़कर मुंबई जाना पड़ा, जहाँ उन्होंने घरेलू सहायिका के रूप में काम करना शुरू किया। बाबू और उनके भाई-बहन प्रारंभ में पड़ोसियों के साथ गांव में ही रहे, लेकिन कुछ वर्षों बाद बाबू और उनकी बहन भी मुंबई आ गए। बहन ने घरों में बर्तन मांजने और सफाई का काम किया। जबकि बाबू की मां एक कपड़ा मिल में मजदूरी। दो अन्य भाई गांव में मजदूरी कर अपना पेट पालते थे। कुल मिलाकर चारों बहन भाई अत्यंत गरीबी में पले बढ़े।
आर्थिक अभावों के कारण बाबू गेनू को औपचारिक शिक्षा का अवसर नहीं मिल सका। वे केवल चौथी कक्षा तक ही पढ़ पाए। छोटी उम्र में ही उन्हें काम पर लगना पड़ा। उनकी मां जिस कपड़ा मिल में काम करती थीं, वहीं बाबू भी बाल मजदूर के रूप में काम करने लगे। इसी दौरान उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। मिल में एक मुस्लिम शिक्षक, जिन्हें बाबू स्नेहपूर्वक “चाचा” कहते थे, ने उनके मन में देशप्रेम के बीज बोए। वे बाबू को भारत के गौरवशाली इतिहास, स्वतंत्रता की आवश्यकता और अंग्रेजी शासन के अन्याय के बारे में बताते थे। बाबू उन्हें गुरु और पिता दोनों का स्थान देते थे। यही संस्कार आगे चलकर उनके बलिदान की नींव बने।
करीब 20 वर्ष की आयु में बाबू गेनू एक कुशल मिलहैंड बन गए और मुंबई के फीनिक्स मिल्स चॉल में रहने लगे, जो आज मुंबई का एक आलीशान व्यावसायिक क्षेत्र है। उनकी मां चाहती थीं कि वे शीघ्र विवाह कर लें, लेकिन बाबू का मन राष्ट्रसेवा में लगा था। उन्होंने विवाह से इंकार कर दिया और तानाजी पाठक के दल में सम्मिलित होकर, स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से जुड़ गए। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड और 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की मृत्यु ने उनके हृदय को झकझोर दिया। महात्मा गांधी जी के प्रति उनमें अगाध श्रद्धा थी। गांधी के अहिंसा, सत्याग्रह और स्वदेशी के विचारों से वे अत्यंत प्रभावित थे। वे कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता बने और कई बार जेल भी गए। नमक आंदोलन के दौरान उन्हें छह महीने की सश्रम कारावास की सजा हुई। जेल से छूटने पर जब वे अपनी मां से मिले, तो लोगों के मुख से अपने पुत्र की वीरता की प्रशंसा सुनकर मां का हृदय गर्व से भर गया। जेल से छूटने के पश्चात गेनू के मन में देश के लिए एक ज्वलंत प्रेम उमड़ रहा था। देश में स्वतन्त्रता का संघर्ष के साथ विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का आंदोलन तेज हो रहा था। 22 वर्षीय बाबू गेनू भी इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे। बाबू गेनू भी अपने साथियों के साथ मिल मजदूरों को एकत्र कर स्वदेशी के महत्व को समझाने लगे।
12 दिसंबर 1930 को शुक्रवार का वह दिन, सुबह के 11 बजे का समय था, यह दिन भारतीय इतिहास में अमर हो गया। मुंबई के कालबादेवी इलाके में एक गोदाम विदेशी कपड़ों से भरा था। उसे दो व्यापारियों ने खरीद लिया। उन्होंने तय किया इसे मुंबई की कोट मार्केट में ले जाएंगे, इसके लिए उन्होंने अंग्रेज पुलिस से सुरक्षा मांगी। तब अंग्रेज पुलिस ने स्वीकृति दे दी। यह सूचना मिलते ही बाबू गेनू ने अपने साथियों को एकत्र करके उस ट्रक को रोकने का निर्णय लिया। हनुमान रोड पर इसे रोकने की योजना बनाई और वहीं सत्याग्रह शुरू हुआ। सत्याग्रह को देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। प्रातः साढ़े सात बजे सत्याग्रही व दर्शक भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। जैसे ही विदेशी कपड़े से लदा ट्रक मिल से बाहर आया। गेनू के संकेत पर घोण्डू रेवणकर ट्रक के आगे लेट गए, इससे ट्रक रुक गया। फिर इसके बाद क्या था ? एक-एक कर 30 स्वयंसेवक ट्रक के सामने लेटते गए, लेकिन पुलिस उन्हें हटाती। वन्दे मातरम् और ‘भारत माता की जय’ के जयघोष लगाकर फिर दुबारा से ट्रक के सामने लेट जाते। बहुत देर तक यह क्रम चलता रहा। पुलिस ने उन सबकी जमकर पिटाई भी की फिर भी उनका हौसला टूटा नहीं। यह देखकर अंग्रेज पुलिस सार्जेण्ट ने चिल्लाकर आन्दोलनकारियों पर ट्रक चढ़ाने को कहा, पर ट्रक का भारतीय चालक इसके लिए तैयार नहीं हुआ। इस पर पुलिस सार्जेण्ट उसे हटाकर स्वयं उसके स्थान पर जा बैठा। अंततः बाबू गेनू स्वयं ट्रक के आगे लेट गए। यह सब देखकर सार्जेण्ट की आँखों में खून उतर आया। उसने ट्रक चालू किया और बाबू गेनू को कुचल दिया। यह दृश्य देखकर पूरा क्षेत्र स्तब्ध रह गया। सड़क पर खून ही खून फैल गया। गेनू का शरीर धरती पर ऐसे पसरा था, मानो कोई छोटा बच्चा अपनी माँ की छाती से लिपटा हो। तत्क्षण उसे अस्पताल ले जाया गया, पर उसके प्राण पखेरू तो पहले ही उड़ चुके थे। इस प्रकार स्वदेशी के लिए बलिदान देने वालों की माला में पहला नाम लिखाकर बाबू गेनू ने स्वयं को अमर कर लिया।
बाबू गेनू की मृत्यु के बाद मुंबई में भारी जन-आक्रोश फैल गया। अगले दिन 13 दिसंबर को उनकी शवयात्रा में हजारों लोग शामिल हुए, पूरा शहर बंद रहा और जगह-जगह विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। उनकी शवयात्रा में महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक थे। बाबू गेनू अमर रहे के नारे गूंजने लगे। प्रमुख समाचार पत्रों में अगले दो दिनों में इस घटना की व्यापक रूप से खबर थी। कस्तूरबा गांधी उनकी मां से मिलने गईं और महात्मा गांधी ने बाबू गेनू को स्वदेशी आंदोलन का साहसी सिपाही बताया। तभी से उनके बलिदान की स्मृति में 12 दिसंबर को स्वदेशी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
स्वदेशी के बलिदानी बाबू गेनू की स्मृति में दिल्ली के आर.के.पुरम्, सेक्टर-8 और 9 के बीच के मार्ग का नाम शहीद बाबू गेनू रोड रखा गया है। वहीं स्वेदशी जागरण मंच का राष्ट्रीय कार्यलय भी मौजूद है। स्वदेशी जागरण मंच के प्रत्येक कार्यक्रम में उनका चित्र अनिवार्य रूप से लगाया जाता है। उनके नाम पर देश के अनेको संस्थानों एवं सड़कों का नामकरण भी हुआ, जिसमें प्रमुख महाराष्ट्र राज्य के बाबू गेनू ग्राउंड (नवी मुंबई), बाबू गेनू चौक (पुणे), बाबू गेनू कहावाडी और महानुगले गाँव में गेनू की मूर्ति लगाई गयी (महालुंगे पडवल, पुणे जिला)। मुंबई के परेल में केईएम अस्पताल के कोने का नाम बाबू गेनू के नाम पर रखा गया है, जिसमें उनकी प्रतिमा प्रमुख रूप में प्रदर्शित है। कालबादेवी की उस गली का नाम उनके नाम पर रखा गया, जहां बाबू गेनू ने अपने प्राण न्यौछावर किए थे। आज यह क्षेत्र लंबे समय से स्वदेशी बाजार का घर है।
स्वदेशी का स्वीकार एवं विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार” बाबू गेनू का नारा उनके जीवन का सार था। बाबू गेनू का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वदेशी केवल वस्तुओं का उपयोग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और राष्ट्रप्रेम की भावना है। जिस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपने प्राण अर्पित किए, उसे जीवित रखना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। एक साधारण मजदूर का यह असाधारण बलिदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।
(लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक)

