हाल ही में भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा स्पेशल इंटेंसिव रिलिजन (एसआईआर) की एक प्रक्रिया शुरू की गई, जिसके अंतर्गत अभी तक कई राज्यों में चुनाव से पूर्व इस प्रक्रिया के माध्यम से किसी विदेशी के मतदाता सूची में गलती से शामिल होने, मृत वोटरों के मतदाता सूची से नाम न हटने, किसी वोटर के एक स्थान से ज्यादा स्थानों पर मतदाता सूची में शामिल होने और बार-बार पलायन के कारण मतदाता सूची की कमियों को दुरूस्त करने का काम किया जा रहा है। स्वभाविकतौर पर विदेशियों के नाम मतदाता सूची में होने की स्थिति में, एसआईआर प्रक्रिया के कारण उनके नाम स्वयमेव कट जाते हैं, क्योंकि वे अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाते। हालांकि विपक्षी दलों द्वारा एसआईआर प्रक्रिया की पुरजोर खिलाफत हुई, लेकिन अंतोत्गत्वा सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर प्रक्रिया को संवैधानिक ठहराते हुए विपक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया है। एसआईआर के माध्यम से हालांकि बड़ी संख्या में विदेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची से हटाने का काम तो हुआ है, लेकिन विदेशी घुसपैठियों को देश से बाहर करने का महत्वपूर्ण कार्य अभी बाकी है। पिछले लम्बे समय से भारत के विभिन्न भागों में अवैध बंगलादेशी घुसपैठ का खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया में कहीं भी अवैध विदेशी घुसपैठ को अनुमति नहीं है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया जाता रहा है।
हाल ही में
भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने अवैध घुसपैठ के मामले और जनसांख्यिकी बदलाव (डेमोग्राफिक चेंज) पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। इसके पीछे की पृष्ठभूमि यह मानी जा रही है कि बंगलादेश के साथ सांझी सीमा होने और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा राज्य में बंगलादेशी घुसपैठियों को प्रश्रय देने के कारण पश्चिम बंगाल में बंगलादेशी घुसपैठ की समस्या ने विकराल रूप धारण किया हुआ है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का शासन स्थापित होने के तुरंत बाद इस समिति के गठन के बाद यह स्पष्ट है कि अवैध बंगलादेशी घुसपैठ के खिलाफ अब सरकार सख्त रूख अपनाने वाली है। विपक्षी दल, जब वे सत्ता में थे, तब भी वे इस समस्या का जिक्र तो करते थे, लेकिन समाधान के नाम पर उन्होंने कोई प्रकट प्रयास नहीं किया। वर्तमान सरकार के प्रयासों से वे कभी सहमत नहीं हुए, और आज भी इस मुद्दे के बारे में सरकार के साथ एक राय नहीं रखते। इस मुद्दे को राजनीति के चश्में से न देखकर, देश और समाज के हित के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। समझना होगा कि विदेशी घुसपैठ के मुद्दे के कई पहलू हैं। यह विषय मात्र जनसंख्या परिवर्तन का ही नहीं है। इसके कई दूरगामाी आयाम है, जिन्हें समझने की जरूरत है। बांग्लादेशिओं अवैध घुसपैठ के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रभावों से देश आज जूझ रहा है। हालांकि इसके प्रभाव पूरे देश में एक जैसे नहीं हैं; सीमावर्ती और सघन शहरी इलाक़ों जैसे असम, पश्चिम बंगाल और दिल्ली व मुंबई अवैध घुसपैठ की परिणाम ज़्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यदि घुसपैठ के आर्थिक परिणामों की बात करें, तो सबसे पहले तो घुसपैठ भारत के नागरिकों के रोजगार पर प्रहार करती है। भारत पहले से ही एक विशाल जनसंख्या और युवा आबादी वाला देश है। देश के लोगों, खासतौर पर युवाओं को रोजगार मिलने में कठिनाई हो रही है, लेकिन ऐसे में जब बंगलादेशी घुसपैठिए रोजगार पाने की कवायद में सस्ती से सस्ती मजदूरी पर काम करने के लिए तैयार रहते हैं, ऐसे में भारतीय मजदूर रोजगार से बाहर हो जाते हैं। घरेलू काम हो अथवा औद्योगिक रोजगार सभी में बंगलादेशी घुसपैठिए भारत के नागरिकों को रोजगार से बाहर कर रहे हैं। यही नहीं भारत में रोजगार में असंगठित क्षेत्र जिसमें छोटे दुकानदार, रेहड़ी पटरी, खोमचा, कबाड़, निर्माण और बाजारों और मंडियों में भारी मात्रा में रोजगार सृजन होता है। इन सभी स्थानों पर बंगलादेशी घुसपैठिए रोजगार पर कब्जा कर रहे हैं और कई बार तो पूरा सिंडिकेट बनाकर वे काम करते हैं। छोटे दुकानदार और व्यापारियों को इससे भारी नुकसान हो रहा है। यही नहीं चूंकि बंगलादेशी घुसपैठिए असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिससे सरकार को कोई राजस्व नहीं मिलता। इसके साथ ही वे भारत से पैसा कमाकर वे अवैध तरीके से बंगलादेश में भी पैसा भेजते हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। इसके अलावा भारत सरकार देश के गरीब नागरिकों के लिए जो कल्याणकारी योजनायें चलाती है, जिसके तहत मुत रशन, बिजली, पानी और वित्तीय समावेशन (जैसे बैंक खाते) जैसी सुविधाएं दी जाती है, फर्जी दस्तावेजों के दम पर ये घुसपैठिए इन योजनाओं का अनुचित लाभ उठा रहे हैं, जिससे देश के खजाने को हर साल करोड़ों का नुकसान हो रहा है।
नकली आधार, राशन कार्ड और वोटरकार्ड के मामले शासन-प्रशासन और आंतरिक सुरक्षा के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। इससे नागरिकों और गैर-नागरिकों के बीच अंतर कर पाना और भी कठिन हो जाता है। घुसपैठ के कारण हो रहे जनसांख्यिकीय बदलावों के चलते सांस्.तिक या भाषाई असंतुलन उत्पन्न होता है, सीमावर्ती जिलों में यह ज़्यादा दिखाई देता है।संसाधनों (भूमि, रोजगार, कल्याणकारी योजनाएं) के लिए प्रतिस्पर्धा से स्थानीय आबादी और प्रवासी समुदायों के बीच टकराव उत्पन्न होता है। घुसपैठ वाले इलाक़ों में दंगों की आशंकाएँ भी भी ज़्यादा होती हैं। मानव तस्करी, संगठित अपराध, सार्वजनिक भूमि पर अवैध क़ब्ज़े जैसे अपराध भी अक्सर घुसपैठ के साथ जुड़े हुए होते हैं। इस बात के आरोप भी अक्सर लगते रहे हैं कि कुछ राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देते हैं या उसकी अनदेखी कर रहे हैं। इससे राजनीतिक विमर्श में ध्रुवीकरण बढ़ता है और प्रशासन के सामने चुनौतियाँ खड़ी होती हैं। कुछ राजनीतिक दलों द्वारा अल्पसंख्यकों का अनावश्यक तुष्टीकरण भी देखने को मिलता है, जो कुछ धार्मिक समूहों की श्वोट बैंकश् की राजनीति में विश्वास रखते हैं। इस प्रकार स्वच्छ राजनीतिक मूल्यों का क्षरण होता है। अनेक बार चुनाव के नतीजे भी अवैध घुसपैठियों द्वारा प्रभावित होने लगते हैं, जिससे स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आघात पहुंचता है। समझा जा सकता है घुसपैठ की समस्या के निदान हेतु वर्तमान सरकार द्वार किए जाए रहे प्रयास यदि फलीभूत हों तो इससे आर्थिक सामाजिक राजनीतिक ताने बाने पर आ रहे संकट का भी काफ़ी निदान हो पाएगा।

