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बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में कहां खड़ा है भारत!

By Vikram Upadhyay • 20 Jul 2021
बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में कहां खड़ा है भारत!

अब कोविड महामारी ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को और बदल दिया है। अब एक तरफ इस महामारी से लड़ने की चुनौती है और दूसरी तरफ अपनी आर्थिक संप्रभुता को मजबूत करने और अपने लिए नए अवसरों की तलाश करना है, क्योंकि अब किसी एक के सुपर पावर बनने या सुपर पावर के पीछे खड़े होने का केवल सवाल नहीं है बल्कि कोरोना से प्रभावित दुनिया के 210 से अधिक राष्ट्रों के अस्तित्व का सवाल है। — विक्रम उपाध्याय

 

कोरोना से पहले ही वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में बदलाव सामने आने लगे थे। चीन की आक्रामक नीति और अमेरिका का कम होता आर्थिक दबदबा इस बदलाव के कारण बने थे। इस में दो राय नहीं कि राष्ट्रपति ट्र्रंप ने इसकी शुरूआत की और बाद में यूरोप और कनाडा भी इसमें शामिल हो गए। आस्ट्रेलिया और जापान ने भी इसमें अपने अपने हिस्से की आहुति डाली थी। सबके लिए एक ही चुनौती थी और वह थी चीन की तेजी से बढ़ रही वैश्विक हिस्सेदारी। अमेरिका ने 2018 में ही चीन के साथ व्यापार युद्ध एक नए स्तर पर पहुंचा दिया था, जिसमें यहां तक की धमकी थी कि ट्रंप प्रशासन अमेरिका में चीन की तमाम निवेश को जब्त कर लेगा और चीन की कंपनियों को वहां व्यापार नहीं करने देगा। आस्ट्रेलिया ने चीन के जासूसों अपने यहां जासूसी करने को मुद्दा बनाया और तमाम तरह की पाबंदियां चीनी कंपनियों पर लगा दी। कनाडा ने चीन की हुवेई कंपनी में वित्तीय मामले की प्रमुख मेंग वानझू को दिसंबर 2018 में गिरफ्तार कर चीन को एक बड़ा झटका दिया था और जापान ने अपने एक टापू को लेकर चीन के सामने अपने लड़ाकू बेड़े खड़े कर दिए थे। यह एक शुरूआत थी जिसे बाद में तब और बल मिला जब 2007 में बने क्वैड (भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान का संगठन) अचानक 2017 में सक्रिय हुआ और 2020 तक इस कदर आक्रामक हुआ कि चीन को युद्ध की धमकी तक देनी पड़ गई।

अब कोविड महामारी ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को और बदल दिया है। अब एक तरफ इस महामारी से लड़ने की चुनौती है और दूसरी तरफ अपनी आर्थिक संप्रभुता को मजबूत करने और अपने लिए नए अवसरों की तलाश करना है, क्योंकि अब किसी एक के सुपर पावर बनने या सुपर पावर के पीछे खड़े होने का केवल सवाल नहीं है बल्कि कोरोना से प्रभावित दुनिया के 210 से अधिक राष्ट्रों के अस्तित्व का सवाल है। इसलिए एक ध्रुवीय व्यवस्था का हामी होना किसी के लिए आसान नहीं है। यह बात केवल सिद्धांत में नहीं है, बल्कि इस पर अमल भी होने लगा है। कभी चीन के लिए इटली बहुत बड़ा व्यापारिक भागीदार था। 2019 में बीआरआई का सदस्य बनने के बाद इटली चीनी एफडीआई का प्रमुख सोर्स बन गया था, लेकिन अब वही इटली यह मान रहा है कि चीन के साथ जाना दशक का सबसे बड़ी भूल थी। अब इटली ने भी इंडो-पैसिफिक जियो गठबंधन के साथ आने का संकेत दे चुका है। इटली ने भारत और जापान के साथ त्रिपक्षीय साझेदारी करने की इच्छा जाहिर की है। इटली के प्रधानमंत्री मारियो ड्रैगी के नेतृत्व वाली इतालवी सरकार ने अपने तत्काल पड़ोस के बाहर फिर से ध्यान देना शुरू कर दिया है। साथ ही, चीन की नीतियों से उत्पन्न जोखिमों पर इटली अधिक मुखर हो गया है।

इस बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में भारत निवेश के लिए एक पसंदीदा गंतव्य के रूप में उभरने की पूरी कोशिश कर रहा है। भारत के पास मानव पूंजी, सामाजिक पूंजी, प्राकृतिक पूंजी और एक बेहतर भौतिक पूंजी है। इसलिए कोविड के बाद की दुनिया में इस क्षेत्र के विकास का आधार भारत हो सकता है। भारत के लिए सुखद बात यह भी है कि अमेरिका का झुकाव एशिया-प्रशांत से हटकर अब इंडो-पैसिफिक हो गया है। यह जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के साथ उसकी क्वाड डिप्लोमेसी को ज्यादा महत्व देना एक बड़ा सबूत है। इसी क्वाड के माध्यम से सुरक्षा वार्ता के कई दौर आयोजित किए जा चुके हैं।  एक दर्जन से अधिक तकनीकी समूहों का गठन किया जा रहा है।

अमेरिका के साथ साथ यूरोपीय संघ भी अब नए सिरे से अपने शक्ति संयोजन में लगा है। कभी चीन के साथ पूरी तरह एलायंस में रहने वाले यूरोप के कई देश ऐतिहासिक रूप से चीन से असहमति जता चुके हैं। अब यूरोपीय संघ से निकले के बाद ब्रिटेन भी 2020 से चीन के प्रति उग्र विचार व्यक्त करने लगा है। चाहे वह हांगकांड में नया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने का मामला हो या फिर उईगर मुसलमानों के मानवाधिकार का मामला, ब्रिटेन हर मुकाम पर चीन को घेरने में लगा है।

बदलते आर्थिक परिदृश्य में यह स्पष्ट रूप से देखा जाने लगा है कि दावों के बावजूद चीन विदेशी फर्मों के पलायन का अनुभव कर रहा है। चीन छोड़ने वाली कंपनियों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ ही रही है। रांष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है। इसका असर चीन पर दिखाई दे रहा है। ड्र्रैगन अब घरेलू खपत में वृद्धि करके विदेशी बाजारों पर चीन की निर्भरता को कम करने के प्रयास में है। चीनी अधिकारी इस परिस्थिति को बदलने के लिए खूब हाथ-पांव मार रहे हैं।

वैश्कि अर्थव्यवस्था के स्वरूप और बनावट में बदलाव का सबसे बड़ा कारण बनने जा रहा है जी-7 देशों के निवेश प्रस्ताव। 11 से 13 जून 2021 को इंग्लैंड में आयोजित जी-7 के देशों के लीडर्स समिट स्टेटमेंट में यह घोषणा की गई कि कोविड महामारी के सामाजिक, आर्थिक और वित्तीय प्रभावों का मुकाबला करने के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में 5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की पूंजी लगाई जाएगी। यानी चीन के लिए अब यह बड़ी चुनौती होगी कि वह पहले की तरह अपने निवेश के जरिए छोटे और मझोले देशों पर कर्ज बोझ डालकर उनकी संपत्तियों पर कब्जा करने में सफल आगे भी होता है कि नहीं।

भारत के लिए अमेरिकी नेतृत्व लगातार एक बड़े सहायक के रूप में काम करते आ रहा है। आज अधिकांश यूएस की बड़ी कंपनिया भारत-आधारित क्षमता पर निर्भर हैं। चाहे वह बौद्धिक संपदा हो या डेटा प्रशासन, टैरिफ हो या कराधान, स्थानीय सामग्री की आवश्यकताएं हो या फिर व्यक्तिगत गोपनीयता जैसे डॉटा अमेरिकी कंपनियों को भारत पर पूरा भरोसा है। इसी तरह कई अग्रणी यू.एस. टेक कंपनियां भारत के तेजी से बढ़ते इंटरनेट और ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस में अच्छी स्थिति में हैं।

भारत आरएंडडी, इनोवेशन सेंटर, मशीन लर्निंग, एनालिटिक्स, उत्पाद डिजाइन और परीक्षण, और अन्य क्षेत्रों में विशेष रूप से आईटी और जीवन विज्ञान में मूल्य श्रृंखला को आगे बढ़ा रहा है।

आईटी के बाहर, भारत में काम कर रही अमेरिकी कंपनियों को आमतौर पर चीनी, जापानी, कोरियाई और निश्चित रूप से भारतीय फर्मों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। लेकिन भारत में व्यापार करना अब मुश्किल नहीं होता है।

वैसे चीन भी चुपचाप नहीं बैठा है। वह अमरीका मुखालिफ देशों का एक अलग ब्लॉक बनाने में लगा है। जिसमें चीन के साथ पाकिस्तान, तुर्की, ईरान और रूस प्रमुख रूप से शामिल है। इन देशों के साथ मिलकर वह अमरीका और क्वाड का मुकाबला करना चाहता है। वन बेल्ट वन रोड की परियोजना के साथ ईरान और अफगानिस्तान को भी जोड़ना चाहता है। ईरान को वह 6 बिलियन डॉलर के निवेश का प्रस्ताव दे चुका है और अफगानिस्तान में तालिबानियों के साथ मिलकर भी एक निवेश योजना पर काम कर रहा है। भारत के लिए यह बहुत परेशानी का कारण नहीं है। पाकिस्तान को छोड़कर इनमें से किसी भी देश के साथ भारत के ताल्लुक खराब नहीं है। इसलिए नए बदलते आर्थिक परिदृश्य में भारत एक बेहतर जगह पर खड़ा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।)

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