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राष्ट्रीय संगोष्ठी - हिमालय है तो हम हैं

भगवद् गीता के श्लोक ‘स्थावराणां हिमालयरू’ यानी ‘हिमालय है तो हम हैं’ के बैनर तले आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान विकास की ओट में अनियंत्रित पर्यटन, अवैध निर्माण, अनावश्यक सड़के, रेल और बांध परियोजनाओं के चलते हिमालय क्षेत्र के समक्ष उत्पन्न संकटों से निपटने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय हिमालयी क्षेत्र संगठन बनाने पर जोर देते हुए सरकार से हिमालयी राज्यों को हरित बोनस देने की मांग की गई।

दिनांक 26 नवंबर 2025 को दिल्ली स्थित हैबिटेट सेंटर में आयोजित संगोष्ठी में पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी, डॉक्टर कर्ण सिंह, गोविंदाचार्य, डॉ. कृष्ण गोपाल जी, अश्वनी चौबे सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्ध पारिस्थितिकी विद्वान, वरिष्ठ नौकरशाह, सामाजिक कार्यकर्ता पत्रकार तथा गणमान्य लोगों ने हिस्सा लिया। सत्रों में विभक्त संगोष्ठी का संचालन स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय सह-संयोजक डॉ. अश्वनी महाजन ने किया। सत्र का संचालन करते हुए डॉ. महाजन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण आसन्न विपदा के बीच हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन, भू धंसाव, आए दिन बादल का फटना और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं हर साल तीव्रता के साथ बढ़ रही हैं। ऐसे में जरूरी है कि राष्ट्र रक्षक हिमालय की सुरक्षा के लिए ठोस कार्यक्रम के साथ समय रहते समाधान की रूपरेखा तैयार की जाए।

संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का आरंभ विशिष्ट अतिथियों के दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। हिमालय क्षेत्र से आयी महिला हिमालय प्रहरियों के दल ने अपनी लोक भाषा में हिमालय गीत प्रस्तुत किया। गीत प्रस्तुति के बाद पिछले 20 वर्षों से गंगा हिमालय पर सक्रिय संगठन गंगा आह्वान के मल्लिका भनोट ने कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए हिमालय क्षेत्र की चिंताजनक स्थिति पर प्रकाश डाला। पूर्व में किए गए प्रयासों का ब्योरा देते हुए तेजी से लुप्त हो रही गंगा नदी के साथ उप हिमालयी मैदानों की रक्षा सुरक्षा के लिए त्वरित कदम उठाने की मांग की।

प्रथम सत्र में अपनी बात रखते हुए शशि शेखर ने कहा कि दुनिया के सबसे जवान पहाड़ हिमालय को केवल संरक्षण की नहीं बल्कि इसके पुनर्निर्माण पर भी काम करने की जरूरत है। आज जिस तरह बे रोक-टोक हिमालय क्षेत्र में प्रगति के नाम पर तोड़फोड़ की जा रही है वह हिमालय के स्वास्थ्य के लिए कतई ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस तरह भूटान की सरकार ने अपने संविधान में 75 प्रतिशत प्राकृतिक जंगल रहने देने का प्रावधान किया है उसी तर्ज पर भारत सरकार को भी हिमालय क्षेत्र की रक्षा के लिए कानून में प्रावधान करना चाहिए।

रवि चोपड़ा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि मौसम चक्र बदल रहा है झील टूट रहे हैं। आबाद गति से आवाज आई के कारण वहां के पारिस्थितिकी तंत्र में लगातार नकारात्मक स्थितियां उत्पन्न हो रही है। शेरों के लिए आवश्यक ठंड भी उपलब्ध नहीं है। फसलों की पैदावार पर सीधा असर पड़ रहा है। हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के कारण हर समय तबाही का खतरा बना हुआ है। उन्होंने कहा कि हमें हिमालय को बचाने के लिए वैज्ञानिक इंजीनियर से ज्यादा आम आदमी को साथ लाने की जरूरत है। 

इस क्रम में नवीन जुयाल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हिमालय को व्यापार का अड्डा बनाया जा रहा है। उपभोग आधारित विकास मॉडल के कारण लाभ कमाने के चक्कर में लालची लोगों द्वारा हिमालय की प्राकृतिक धरोहर को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिस हिसाब से ग्लेशियर सुख रहे हैं उसे भविष्य का संकट स्पष्ट रूप से दिख रहा है लेकिन कतिपय लाभ के चक्कर में लोग बड़े संकट को दावत देने से बाज नहीं आ रहे हैं। 

हिमालय क्षेत्र के संकटों को लेकर लंबे समय से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत ध्यानी ने गंगा बचाओ आंदोलन के दौरान गुरदास अग्रवाल और संत निगमानंद के बलिदान को रेखांकित करते हुए कहा कि गंगा है तो जीवन है। उन्होंने कहा कि गंगा की रक्षा तभी हो सकती है जब हम हिमालय की रक्षा सुनिश्चित करेंगे। हिमालय क्षेत्र में बेतहाशा आवाजाही को खतरनाक बताते हुए उन्होंने सरकार से इस पर कड़े प्रतिबंध लगाकर रोके जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि पहले तीर्थाटन के लिए लोग हिमालय क्षेत्र में जाते थे अब वह तीर्थटन पर्यटन में तब्दील हो गया है।

प्रथम सत्र के अंतिम वक्त के रूप में अपनी बात रखते हुए कहा कि आज सरकार ढेर सारा खर्च निर्मल गंगा के नाम पर कर रही है लेकिन सरकार को यह समझना चाहिए की गंगा अगर अविरल होगी तो अपने आप निर्मल हो जाएगी। 

दूसरे सत्र की अध्यक्षता चुनाव आयोग के सदस्य रह चुके और अशोक लवस्का ने की। इस सत्र में अपनी बात रखते हुए कार्यक्रम के कर्णधार पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि आज सेना के नाम पर हिमालय का विनाश धड़ल्ले से किया जा रहा है, यह न सिर्फ चिंताजनक है बल्कि मानवता के लिए घातक है। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि आज हिमालय क्षेत्र में चार धाम के नाम पर गैर जरूरी चौड़ी सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश में प्राचीन काल से चार धाम की परिकल्पना है। अब यह हिमालय क्षेत्र में नए चार धाम का नामकरण कुछ अत्यंत लालची लोगों के लाभ की लिप्सा का नतीजा है। उन्होंने कहा कि हिमालय क्षेत्र में नए चार धाम की परिकल्पना न सिर्फ गैर जरूरी है बल्कि शास्त्रों और परंपराओं के भी विपरीत है। 

पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ कर्ण सिंह ने हिमालयी क्षेत्र के विनाश की विभीषिका को इंगित करते हुए कहा कि हिमालय का संसार कई देशों तक फैला हुआ है। हिमालय अभी एक जवान होता हुआ पहाड़ है जिसे अभी लाखों करोड़ों वर्षों की यात्रा करनी है। इसकी रक्षा सुरक्षा के लिए हम सभी को मिलजुल कर एक अंतरराष्ट्रीय हिमालय क्षेत्र संगठन बनाना चाहिए। 

उत्तराखंड राज्य के विधायक प्रदीप कुमार टमटा के उद्बोधन के बाद अपनी बात रखते हुए स्वदेशी के प्रबल पक्षधर प्रखर चिंतक गोविंदाचार्य ने गंगा बचाओ आंदोलन में प्राणोत्सर्ग करने वाले प्रोफेसर जीडी अग्रवाल और संत निगमानंद के बलिदान को याद किया और कहा कि आज देश के प्रमुख धामों को को दामों में बदलने की होड़ लगी हुई है। उपभोक्तावादी संस्कृति सिर चढ़कर बोल रही है। कहने के लिए तो लोग पुण्य बटोरने के नाम पर तीर्थ स्थलों की ओर भागे दौड़े जा रहे हैं। ऐसे लोग कितना पुण्य बटोर पा रहे हैं यह तो वही बता सकते हैं लेकिन भौतिक तौर पर भारी मात्रा में वहां कचड़ा छोड़कर भाग जा रहे हैं। लोगों द्वारा फैलाया जा रहा कचरा हिमालय के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही नुकसानदायक है। हमें सोचना होगा कि अगर हिमालय ही नहीं रहेगा तो फिर लोग जाएंगे कहां? श्री गोविंदाचार्य ने कहा की हिमालय की रक्षा सरकार के भरोसे नहीं हो सकती। इसका समाधान भारतीय दार्शनिक और सांस्कृतिक परंपराओं में निहित है जो सामाजिक सांस्कृतिक और पर्यावरणीय सद्भाव की नींव पर टिक है जो न केवल मनुष्यों बलकी सभी प्राणियों के समग्र विकास का दरवाजा खोलता है। उन्होंने कहा कि बाजार की ताकतों ने आध्यात्मिक मूल्यों का दमन कर दिया है। विकास का यह तूफान राष्ट्र की आत्मा, उसकी संस्कृति, सभ्यता, पवित्र गंगा और उसके उद्गम स्थल हिमालय तक को खतरे के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

भोजनोपरान्त आयोजित सत्र में अपनी बात रखते हुए पूर्व मंत्री अश्वनी चौबे ने केदारनाथ धाम में आई आपदा की विस्तार से चर्चा की। मालूम हो कि श्री चौबे उस दौरान पारिवारिक यात्रा पर मौके पर मौजूद रहे थे, और हादसे में कई एक प्रिय परिवारीजनों को खोया था। आपदा के दर्दनाक मंजर को याद करते हुए उन्होंने बताया कि मृत्यु उनके सामने कैसे-कैसे भयावह दृश्य उपस्थित कर गई। उन्होंने कहा कि उनके परिवार धार्मिक उद्देश्य से लेकर यात्रा पर गया था लेकिन उन्होंने वहां पाया की प्रगति के नाम पर उसे दिव्य लोक को शोर शराबे और मनोरंजन के बाजार में षडयंत्र पूर्वक बदला जा रहा है। इस सत्र के दौरान श्री नरेश सिरोही गोपाल आर्य आदि आमंत्रित अतिथियों ने अपनी बात रखते हुए हिमालयी क्षेत्र के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए कार्यक्रमों के सार्थक क्रियान्वयन की वकालत की।

समापन सत्र का महत्वपूर्ण उद्बोधन प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वरिष्ठ विचारक कृष्ण गोपाल ने कहा कि हिमालय क्षेत्र जल संसाधन का प्रमुख स्रोत है यहां से विश्व की अधिकांश नदियां निकलती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण आज दुनिया भर में चिंता है। ऐसे में हमें नागरिक बोध के  साथ अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। हिमालय हमारी सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ अर्थव्यवस्था और मानव विकास से भी गहराई से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी की सार्थकता तभी है जब हम यहां लिए गए निर्णय को जमीनी स्तर पर क्रियान्वित कर हिमालय और गंगा की प्रतिष्ठा कायम रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान अर्पित कर सके।

संगोष्ठी में हिमालय क्षेत्र से आए हिमालय प्रहरियों ने भी अपनी बात रखी। प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का भी उत्तर विद्वान वक्ताओं द्वारा दिया गया। इस दौरान हिमालय क्षेत्र के संरक्षण के पक्ष में एक प्रस्ताव भी पारित किया गया।             

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