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पाक-चीन दोस्ती और कांग्रेस का भ्रम

राहुल गांधी को पाकिस्तान के प्रति प्रेम दिखाने से पहले जनरल अयूब खान द्वारा 1965 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दिए भाषण को पढ़ या सुन लेना चाहिए जिसमें उसने भारत के खिलाफ एक हजार साल के युद्ध की घोषणा की थी। कश्मीर पर कब्जा करने और पंजाब को एक अलग ’खालिस्तान’ में बदलने के मंसूबे आज भी पाकिस्तानी शासकों के दिल में पल रहे हैं। — विक्रम उपाध्याय

 

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अंग्रेजी में राहुल गांधी खूब बोले। सरकार की ‘बखिया’ उधेड़ते-उधेड़ते देश का भी खूब मजाक बना दिया। जब उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के कारण चीन और पाकिस्तान एक साथ आ मिले हैं। बकौल राहुल गांधी देश के दोनों आक्रामक पड़ोसी को साथ मिलाने में मोदी सरकार ने जो भूमिका निभाई है, वह देश के प्रति अपराध है। राहुल गांधी को ऐसा बोलने के लिए किसने उकसाया या किसने पढ़ाया, यह तो सरकार पता लगाए लेकिन चीन और पाकिस्तान के बारे में जानने वाला कोई भी व्यक्ति यह कह सकता है कि राहुल गांधी, चीन और पाकिस्तान के करीबी होने के कारणों को बिल्कुल नहीं जानते। चीन और पाकिस्तान की दोस्ती की कहानी वहां से शुरू होती है, जहां से भारत और चीन के बीच दुश्मनी। इधर, चीन ने 1962 में हम पर युद्ध थोपा और उधर पाकिस्तान ने चीन के साथ पींगे बढ़ानी शुरू कर दी।

यूं तो चीन और पाकिस्तान के बीच औपचारिक संबंध 21 मई 1951 को तब शुरू हुआ जब दोनों ने एक-दूसरे के साथ राजनयिक ताल्लुकात स्थापित किए। इसके सात साल बाद ही पाकिस्तान के मिलिट्री शासक याह्या खान ने जब सत्ता संभाली तो उसने सबसे पहले चीन के साथ नये संबंध स्थापित करने पर जोर दिया। उसने तब चीन के प्रधानमंत्री को लिखा था- जिस दिन हमारा संबंध औपचारिक रूप से स्थापित हुआ वह इतिहास का एक महत्वपूर्ण क्षण रहा है। हमारे दो देशों के नेतृत्व और सरकारों ने हमारे संबंधों को बढ़ावा देने और उन्हें मजबूत करने के लिए अथक प्रयास किए हैं।’’ तब देश में नेहरू की सरकार थी और उन्हें संभवतः पता नहीं चला कि अमेरिका के कैंप में बैठा पाकिस्तान चीन को मनाने में लगा है। दरअसल, 1951 में पाकिस्तान कम्युनिस्ट चीन (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना या पीआरसी) को मान्यता देने वाला पहला मुस्लिम देश बना। पाकिस्तान पहला मुस्लिम देश बना जिसने चीन गणराज्य (आरओसी) से अलग हुए ताइवान पर चीन के कब्जे को सही ठहराया और आज के चीन के साथ दोस्ती गांठनी शुरू की।

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान का चीन के साथ विवाद नहीं था। अयूब खान ने तो चीन के साथ सीमा विवाद का मुद्दा जोर से उठाते हुए चीन की तत्कालीन सरकार की मुखालफत भी की थी। लेकिन याह्या खान के कभी बेहद करीबी रहे जुल्फिकार अली भुट्टो ने चीन के साथ सीमा विवाद सुलझा कर नए संबंध स्थापित करने पर जोर दिया और अंततः भारत की कीमत पर चीन ने पाकिस्तान से समझौता कर लिया। मार्च 1963 में भुट्टो ने चीन का दौरा किया और ’सीमा समझौता’ पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में चीन ने पाकिस्तान को 750 वर्ग मील विवादित जमीन दी, जबकि उसी क्षेत्र का 2,050 वर्ग मील पाकिस्तान ने चीन को दे दिया। पाकिस्तान ने चीन के साथ इस दोस्ती की शुरुआत अमेरिका की नाराजगी मोल लेकर भी की।

राहुल गांधी ने संसद में यह आरोप लगाया कि मोदी की नीतियों के कारण चीन और पाकिस्तान भारत के खिलाफ एक साथ खड़े हो गए हैं। राहुल गांधी जब महज दो साल के रहे होंगे तब पाकिस्तान के रेडियो और टीवी चैनल पर एक गाना बजाया गया था- ’पाक-चीन दोस्ती वांग वोए, वांग वोए, वांग वोए, वांग वोए। वांग वोए चीनी शब्द है और जिसका अर्थ है- दोस्ती जिंदाबाद, जिंदाबाद, जिंदाबाद, जिंदाबाद।’ 1980 और 1990 के दशक में बीजिंग ने पाकिस्तान को अपने परमाणु हथियार विकसित करने में मदद करने के लिए आपूर्ति और तकनीकी जानकारियां प्रदान की। 1990 के दशक की शुरुआत में चीन ने पाकिस्तान को 30 डी-11 मिसाइलों की आपूर्ति कर वाशिंगटन को भी चैंका दिया। ये मिसाइल परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम थे।

आस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट ने 7 जनवरी 2019 को एक रिपोर्ट में लिखा -1982 की शुरुआत में किए गए एक प्रमुख नीतिगत निर्णय में, चीन ने पाकिस्तान को परमाणु जानकारी देने के लिए एक भरोसेमंद पार्टनर के रूप में चुना और पाकिस्तान का पहला परमाणु-हथियार परीक्षण मई 1990 में चीन द्वारा कर लिया गया। यह चीन का सहयोग था कि 1998 में भारतीय परमाणु परीक्षण के जवाब में पाकिस्तान को केवल दो सप्ताह और तीन दिन लगे। क्या इसके लिए भी राहुल गांधी मोदी या भाजपा को ही जिम्मेदार ठहराएंगे।

क्या राहुल गांधी को नहीं पता कि चीन ने पाकिस्तान के साथ सीपेक जैसी परियोजना क्यों शुरू की। चीन को भारत तक पहुंचने के लिए हिमालयी रास्ता लांघ कर आना आज भी काफी कठिन है। डोकलाम में चीन देख चुका है। उसे पाकिस्तान के रास्ते भारत पहुंचने में आसानी है और इसी कारण से उसने पाकिस्तान का इस्तेमाल करना शुरू किया है।

2003 में, परवेज मुशर्रफ ने चीन का दौरा किया और दोनों देशों ने द्विपक्षीय सहयोग के दिशा-निर्देशों पर संयुक्त घोषणा जारी की, जिसमें पारस्परिक रूप से लाभकारी आर्थिक और व्यापार सहयोग की कामना की गई। 2005 में, चीनी प्रधान मंत्री वेन जियाबाओ ने पाकिस्तान का दौरा किया और दोनों देशों ने मित्रता, सहयोग और अच्छे पड़ोसी संबंधों की संधि पर हस्ताक्षर किए, साथ ही पहले पाकिस्तान-चीन मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर वार्ता शुरू की। इसी यात्रा के दौरान सी पैक (चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर) पर भी बात हुई और इस पर मसौदा तैयार होने लगा।

अपनी दोस्ती को और आगे बढ़ाते हुए पाकिस्तान-चीन ने 2006 में एफटीए पर हस्ताक्षर किए। एक साल बाद ही 2008 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने अक्टूबर में चीन की यात्रा की, तब पाकिस्तान में आर्थिक संकट मंडरा रहा था और चीन ने इसका फायदा उठाया और सीपैक पर पाकिस्तान से मुहायदा कर लिया। इस समझौते के तहत बने ग्वादर बंदरगाह पर आज चीन का पूर्ण नियंत्रण है और बकौल अमेरिका ग्वादर को चीन अपने सैन्य बेस के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी कांग्रेस ने “सैन्य और सुरक्षा विकास“ पर 2020 की अपनी रिपोर्ट में भी यह दावा किया है कि अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार पाकिस्तान उन देशों में है जहां चीन “सैन्य रसद सुविधाओं के लिए अपना बेस बना रहा है। यही नहीं 2011 में पाकिस्तान और चीन के बीच रुपया-युआन स्वैप समझौता हुआ, जिसके माध्यम से दोनों देश स्थानीय मुद्रा में द्विपक्षीय व्यापार के लिए भुगतान करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, जिसे औपचारिक रूप से 2013 में लागू भी कर दिया गया। क्या राहुल गांधी यह नहीं जानते कि इन वर्षों में केंद्र में किसकी सरकार थी।

2014 में जब मोदी की सरकार केंद्र में आई तब तक पाकिस्तान पूरी तरह चीन के पाले में जा चुका था। अमेरिकी अखबार फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान धीरे-धीरे अमेरिकी सैन्य प्रौद्योगिकी पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है और चीन इस अंतर को भर रहा है। रिपोर्ट में ही यह चेतावनी दी गई थी कि कि इस बदलाव के भू-राजनीतिक नतीजे ठीक नहीं रहेंगे। जब 2011 में पाकिस्तानी धरती पर अलकायदा नेता ओसामा बिन लादेन एबटाबाद में मारा गया तो ओबामा प्रशासन पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सजग हुआ। अमेरिकी कांग्रेस ने पाकिस्तान को आठ एफ-16 लड़ाकू विमानों की बिक्री पर रोक लगा दी। इस्लामाबाद को लग गया कि अमेरिका पर अब “उनके सशस्त्र बलों के उन्नत हथियारों के प्राथमिक स्रोत के रूप में भरोसा नहीं किया जा सकता है।“

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार 2010 के बाद पाकिस्तान को अमेरिकी हथियारों का निर्यात कम होने लगा। उस साल अमेरिकी हथियारों की पाकिस्तान द्वारा खरीद 1 बिलियन डॉलर से घटकर सिर्फ 21 मिलियन डॉलर रह गयी। अब चीन पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बन गया है। द फाइनेंशियल टाइम्स का कहना है कि पाकिस्तान दशकों से बीजिंग से हथियार खरीद रहा है। जिसकी शुरुआत भारत के साथ पाकिस्तान के 1965 के युद्ध के बाद ही हो गई थी। अमेरिकी रक्षा अनुसंधान कंपनी जेन के विश्लेषक जॉन ग्रेवेट के अनुसार पिछले एक दशक में चीन ने पाकिस्तान को 2007 के बाद रॉकेट लॉंचर, वायु रक्षा मिसाइल सिस्टम, बीटी-4 टैंक जेएफ-17 लड़ाकू विमान, ड्रोन, हमलावर पनडुब्बियां और गोले बारूद की आपूर्ति की है।

राहुल गांधी ने पाकिस्तान-चीन के बारे में जो कुछ भी कहा उसे खुद अमेरिका गलत ठहरा चुका है। पाकिस्तान में राहुल गांधी के भाषण को केवल मोदी विरोध के रूप में कोट किया जा रहा है। चीन भी यह कहता रहा है कि मोदी के आने के बाद पाकिस्तान में बन रहे सीपैक में रुकावट आ रही हैं और मोदी के नेतृत्व में भारत एक वैकल्पिक रूट खोल रहा है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने खुलेआम यह कहा कि इस क्षेत्र में व्यापार संबंध स्थापित करने के भारत के प्रयास ’भू-राजनीतिक हठ’ है। भारत द्वारा खोले गए अफगानिस्तान-भारत एयर कॉरिडोर और ईरान में चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान और अन्य मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापार विकसित करने में पाकिस्तान को बाईपास करने पर चीन ने चेतावनी दी कि ये प्रयास चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का काउंटर-बैलेंस करने की भारत की रणनीति है। पाकिस्तान के ना चाहने के बाद भी आज भारत ईरान के जरिए अफगानिस्तान को मानवीय सहायता के रूप में दवा और अनाज भेज रहा है। आज पाकिस्तान की मीडिया में भारत की ताकत पर रोज चर्चा होती है। लेकिन राहुल गांधी को भारत एक कमजोर देश दिखता है।

राहुल गांधी को पाकिस्तान के प्रति प्रेम दिखाने से पहले जनरल अयूब खान द्वारा 1965 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दिए भाषण को पढ़ या सुन लेना चाहिए जिसमें उसने भारत के खिलाफ एक हजार साल के युद्ध की घोषणा की थी। कश्मीर पर कब्जा करने और पंजाब को एक अलग ’खालिस्तान’ में बदलने के मंसूबे आज भी पाकिस्तानी शासकों के दिल में पल रहे हैं।       

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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