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स्थिर विकास के साथ भविष्य की तैयारी

By Dr. Dhanpat Ram Agarwal • 20-02-2026
स्थिर विकास के साथ भविष्य की तैयारी

बजट 2026-27 यह संकेत देता है कि भारत विकास को केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि संरचनात्मक स्थिरता के साथ देख रहा है। - डॉ. धनपतराम अग्रवाल

 

विश्व अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है, जिसमें आर्थिक स्थिरता और अनिश्चितता साथ-साथ चल रही हैं। भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक व्यापार संरचना में परिवर्तन, ऊर्जा कीमतों की अस्थिरता, मुद्रा उतार-चढ़ाव और तीव्र तकनीकी बदलाव ने विकास के पारंपरिक ढाँचों को चुनौती दी है। इस पृष्ठभूमि में भारत का बजट 2026-27 केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक दृष्टि का परिचायक है। यह बजट इस बात का संकेत देता है कि भारत वैश्विक अस्थिरता के बीच अपनी विकास यात्रा को स्थिर और संरचनात्मक आधार पर आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 इस व्यापक तस्वीर को और स्पष्ट करता है। सर्वेक्षण बताता है कि वैश्विक विकास दर अपेक्षाकृत धीमी होने के बावजूद भारत अपनी आंतरिक मांग, निवेश और सेवा क्षेत्र की ताकत के कारण मजबूत हुआ है। लगभग सात प्रतिशत की वृद्धि दर यह संकेत देती है कि भारत केवल चक्रीय उछाल का लाभ नहीं उठा रहा, बल्कि एक दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में अग्रसर है। परंतु उच्च वृद्धि अपने साथ नई जिम्मेदारियाँ और चुनौतियाँ भी लेकर आती है - विशेष रूप से रोजगार, बाह्य क्षेत्र संतुलन, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार संबंधों के संदर्भ में।

बजट 2026-27 का केंद्रीय विचार निवेश आधारित विकास है। सरकार ने पूंजीगत व्यय को उच्च स्तर पर बनाए रखकर स्पष्ट किया है कि दीर्घकालिक उत्पादक क्षमता का निर्माण प्राथमिकता है। परिवहन, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा और डिजिटल अवसंरचना में निवेश केवल वर्तमान आर्थिक गतिविधि को गति नहीं देता, बल्कि भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी मजबूत करता है। राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने का प्रयास यह दर्शाता है कि विकास और वित्तीय अनुशासन को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना जा रहा है। यह संतुलन आर्थिक विश्वसनीयता को बढ़ाता है और निजी निवेश को प्रोत्साहित करता है।

कृषि क्षेत्र की भूमिका इस आर्थिक ढांचे में केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक स्थिरता और ग्रामीण आय का आधार भी है। बजट में मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण पर दिया गया जोर यह संकेत देता है कि कृषि को पारंपरिक उत्पादन मॉडल से आगे ले जाकर आय उन्मुख गतिविधि के रूप में देखा जा रहा है। जब किसान केवल कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय प्रसंस्कृत और उच्च मूल्य वाले उत्पादों की ओर बढ़ते हैं, तो आय स्थिरता और ग्रामीण रोजगार दोनों में सुधार होता है। यह परिवर्तन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास में भी योगदान देता है।

विनिर्माण और एमएसएमई क्षेत्र आर्थिक संरचना का वह हिस्सा हैं जहाँ विकास का सीधा संबंध रोजगार से जुड़ता है। औद्योगिक ढांचे में निवेश, तकनीकी उन्नयन और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखला में मजबूत स्थान दिला सकता है। एमएसएमई क्षेत्र का महत्व केवल उत्पादन में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक गतिशीलता में भी है। छोटे उद्योग स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधि को बढ़ाते हैं और व्यापक रोजगार सृजन का माध्यम बनते हैं। इस दृष्टि से बजट का औद्योगिक फोकस दीर्घकालिक सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।

सेवा क्षेत्र भारत की विकास यात्रा का प्रमुख इंजन बना हुआ है। डिजिटल सेवाएं, वैश्विक क्षमता केंद्र और ज्ञान आधारित उद्योग भारत को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में आगे रखते हैं। सेवा निर्यात देश के बाह्य संतुलन को मजबूत करता है और विदेशी मुद्रा प्रवाह सुनिश्चित करता है। इसी क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उभरता प्रभाव नई संभावनाओं और चुनौतियों दोनों को सामने लाता है। पारंपरिक आईटी सेवाओं पर दबाव पड़ सकता है, परंतु उच्च कौशल आधारित सेवाओं की मांग बढ़ेगी। बजट में डिजिटल कौशल और तकनीकी अवसंरचना पर जोर इस संक्रमण को अवसर में बदलने का प्रयास है।

बाह्य क्षेत्र की स्थिति भारत की समग्र आर्थिक सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक है। माल व्यापार में घाटा संरचनात्मक है, पर सेवा क्षेत्र का अधिशेष इस असंतुलन को काफी हद तक संतुलित करता है। चालू खाता घाटा नियंत्रित स्तर पर बना हुआ है और विदेशी मुद्रा भंडार आर्थिक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। रुपये पर दबाव वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम है, पर निर्यात प्रतिस्पर्धा और घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाकर इस दबाव को कम किया जा सकता है।

मुक्त व्यापार समझौतों की चर्चा इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। अमेरिका और यूरोप के साथ संभावित व्यापारिक साझेदारी भारत के लिए बड़े बाजार और तकनीकी सहयोग के अवसर खोल सकती है। परंतु इन समझौतों का प्रभाव समान रूप से सकारात्मक नहीं होगा। कृषि और छोटे उद्योगों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए उदारीकरण की प्रक्रिया को चरणबद्ध और संतुलित रखना आवश्यक है, ताकि घरेलू उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो सकें।

वैश्विक आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन, ऊर्जा संक्रमण और तकनीकी प्रतिस्पर्धा नई आर्थिक धुरी का निर्माण कर रहे हैं। भारत के लिए यह अवसर है कि वह विनिर्माण, डिजिटल सेवाओं और नवाचार के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत करे। युवा कार्यबल, अवसंरचना विस्तार और तकनीकी अनुकूलन क्षमता भारत की प्रमुख ताकत हैं, पर रोजगार सृजन, व्यापार संतुलन और कौशल उन्नयन जैसी चुनौतियाँ भी सामने हैं।

अंततः बजट 2026-27 यह संकेत देता है कि भारत विकास को केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि संरचनात्मक स्थिरता के साथ देख रहा है। कृषि, उद्योग और सेवा - तीनों क्षेत्रों का संतुलन, निवेश आधारित रणनीति और वैश्विक परिवर्तनों के प्रति सजग दृष्टिकोण भारत को दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती की दिशा में ले जा सकता है। यह यात्रा आसान नहीं है, पर स्पष्ट नीति दिशा और सतत् क्रियान्वयन भारत को अवसरों का लाभ उठाने और चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बना सकते हैं।

इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में भारत की आर्थिक रणनीति का सार यही है - विकास को स्थिरता से जोड़ना, और स्थिरता को भविष्य की तैयारी से।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और केंद्रीय बजट में भारत के बाह्य क्षेत्र की स्थिति पर गंभीर ध्यान दिया गया है। दो प्रमुख संकेतक चिंता के विषय हैंः     1. उच्च व्यापार घाटा, 2. रुपये का क्रमिक अवमूल्यन। इन दोनों को अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के रूप में नहीं, बल्कि विनिर्माण क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरी के रूप में देखा गया है। स्पष्ट है कि भारत की प्रतिस्पर्धात्मक कमजोरी का मूल कारण निम्न अनुसंधान निवेश है।

व्यापार घाटे की संरचना

अनुमानित परिदृश्य (2025-26)

  • वस्तु निर्यातः ्$450 बिलियन
  • वस्तु आयातः ्$700 बिलियन
  • व्यापार घाटाः ्$250 बिलियन

व्यापार घाटा और रुपये का अवमूल्यन केवल आर्थिक संकेतक नहीं हैं - वे भारत की तकनीकी और औद्योगिक संरचना का दर्पण हैं। स्थायी समाधान केवल “मुद्रा प्रबंधन” या “शुल्क नीति” में नहीं, बल्कि अनुसंधान-आधारित स्वदेशी, उच्च-गुणवत्ता और निर्यातोन्मुख विनिर्माण मॉडल में निहित है। यही आत्मनिर्भर और विकसित भारत का वास्तविक आर्थिक आधार होना चाहिये।  

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