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भारत-अमेरिका टैंगोः योजना के तहत रणनीतिक भागीदारी

By KK Srivastava • 11 Aug 2023
भारत-अमेरिका टैंगोः योजना के तहत रणनीतिक भागीदारी

अमेरिका के साथ भारत का जुड़ाव गहरा, मजबूत और अधिक व्यापक होता जा रहा है लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता न करने के उद्देष्य पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है। अमेरिका अभी भी एक द्विध्रुवीय दुनिया चाहता है, जिसके साथ भारत सहज नहीं है। - के.के. श्रीवास्तव

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा भारत अमेरिकी संबंधों को प्रगाढ़ता प्रदान करने के मद्देनजर ऐतिहासिक करार दी जा रही है। दरअसल इस दौरान विश्व के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देषों के बीच अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। इनसे यकीनन भारत को खासतौर पर रक्षा क्षेत्र में काफी मजबूती मिल सकेगी। राष्ट्रपति जो बाइडन की ओर से प्रधानमंत्री मोदी के अतिथि सत्कार की वास्तविक मंशा और इस सफल यात्रा से भारत की विकास यात्रा की गति के बारे में लंबे समय तक विष्लेषण किया जाएगा। दोनों देषों के बीच वाणिज्यक, आर्थिक, रणनीतिक तकनीकी और रक्षा हितों के मुद्दों को रेखांकित किया गया। इस यात्रा और इसके नतीजे एक बहुलवादी लोकतांत्रिक समाज के रूप में भारत की नरम शक्ति के अलावा एक उभरती हुई आर्थिक और रणनीतिक शक्ति के रूप में भारत के उत्थान की ओर स्पष्ट संकेत करता है।

लगभग साढे चार मिलियन भारतीयों की आबादी के साथ हमारा प्रवासी समाज अमेरिका में दूसरा सबसे बड़ा आप्रवासी समुदाय है। वैज्ञानिक संस्थानों, सुरक्षा केंद्रों, तकनीकी केंद्रों, राजनीति सरकार और अन्य व्यवसाय में भी भारतीयों ने अमेरिका में अपनी एक स्थाई जगह बना ली है। प्रधानमंत्री की यात्रा से दो बड़े लोकतांत्रिक देषों, उनके लोगों, सरकारों, व्यापार और प्रतिष्ठानों के बीच जुड़ाव के स्तर को और गहरा कर दिया है। टेस्ला, एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसे अमेरिकी कारोबार के शीर्ष लोगों के साथ बैठक में स्वास्थ्य, रक्षा, उच्च स्तरीय विनिर्माण के साथ-साथ तकनीकी और प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए सरकारी और निजी व्यवसाय को लेकर बड़े समझौते हुए। इससे दोनों देषों के बीच गहरे स्तर पर रणनीतिक संरेखण का संकेत मिलता है।

जीई, एचएएल के तेजस विमान के लिए भारत में एंगल्स का उत्पादन करेगा। यह एक प्रमुख रक्षा सौदा है जिसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी शामिल है। माइक्रोन भारत में 2.75 बिलियन डालर की सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण सुविधा के लिए 800 मिलियन डॉलर से अधिक का निवेष भारत में करेगा। यह चीन ताइवान की जोड़ी के लिए वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की दिषा में प्रगति पर किया गया काम है। इसके लिए 60000 भारतीय इंजीनियरों को प्रषिक्षित किया जाएगा। इसी तरह खनिज के क्षेत्र में हुई साझेदारी काटिकल खनिज आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाएगी और उन्हें सुरक्षा प्रदान करेगी। इससे चीनी प्रभुत्व को कम करने में मदद मिलेगी। चीन के प्रभुत्व को आंकते हुए भारत की इंडो-पेसिफिक में एक बड़ी भूमिका है। भारत और अमेरिका दोनों इस बात को भली प्रकार समझते भी हैं। चीन को रोकने के लिए अमेरिका भारत की अनदेखी नहीं कर सकता और लगता है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमेरिका ने यूक्रेन रूस संघर्ष पर भारत और अमेरिका के बीच मतभेदों को भी कम करने का फैसला किया है।

यात्रा के दौरान डब्ल्यूटीओ से संबंधित विवादों का भी समाधान किया गया इनसे भारत के इस्पात, एलमुनियम और नवीकरणीय ऊर्जा उद्योगों में मदद मिलेगी। बेंगलुरु और अहमदाबाद में नए अमेरिकी वाणिज्य दूतावास खोले जाएंगे वही एचआईवी और एल बीजा धारक अब भारत लौटे बिना अमेरिका में ही अपने वीजा का नवीकरण करा सकेंगे। इस यात्रा को लेकर कुछ प्रमुख पष्चिमी देषों ने भारत पर नए राग अलापने भी शुरू कर दिए। निष्चित रूप से भारत द्वारा किलर ड्रोन और वाणिज्यिक विमानों के लिए बड़े पैमाने पर आर्डर अमेरिकी मीडिया, व्यापार और सरकार के हृदय परिवर्तन में एक बड़ा योगदान किया है। किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए यह तथ्य अपरिहार्य होना चाहिए कि नरम और कठोर दोनों शक्तियों ने अपनी अपनी भूमिकाएं निभाई हैं। भारत ने जहां संयम का परिचय दिया है वहीं अमेरिका ने एक तरह से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया का सबसे लोकप्रिय नेता घोषित कर दिया है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की बढ़ती हुई शक्ति मुख्य रूप से द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की अहम कड़ी है। भारतीय बाजार के बढ़ते आकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस प्रकार भारत एकमात्र लोकतांत्रिक राष्ट्र है जो सभी क्षेत्रों वाणिज्य आर्थिक राजनीतिक, प्रभाव, कूटनीति आदि के मोर्चे पर चीनी विस्तारवादी नीतियों और उनके द्वारा की जा रही डिजाइनों से मिलने वाली चुनौतियों का मुकाबला कर सकता है। चीन का सर्कल घरेलू उत्पाद लगभग 30 ट्रिलियन डॉलर का है। वर्तमान अमेरिकी डालर के संदर्भ में भी चीन की अर्थव्यवस्था दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी है। यही वह बिंदु है जहां पहुंचकर अमेरिका के लिए भारत और भारत के लिए अमेरिका का महत्व बढ़ जाता है। बोइंग के साथ इंडिगो और एयर इंडिया के बीच हस्ताक्षरित सैकड़ों वाणिज्यिक विमान सौदों को देखें तो पारस्परिक रूप से लाभप्रद रिष्ते की तस्वीर उभर कर आती है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देष है जो जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आकार का केवल 15 प्रतिशत है लेकिन भारत अमेरिकी योगदान का 60 प्रतिशत (विश्व विकास में) योगदान देता है, क्योंकि भारत की जीडीपी वृद्धि सालाना दर पर अमेरिका की तुलना में लगभग 4 गुना तेज है।

भारत ही एक ऐसा देष है जो हिंद महासागर में चीन के नापाक मंसूबों को नाकाम कर सकता है। भारत की सेना को अमेरिकी पोसीडॉन वायुसेना के विमानों और दलों के आदेष से मजबूत किया जा रहा है जो दुष्मन से निगरानी और हमले में शोर करने में मदद करेंगे। दरअसल अमेरिकी रक्षा उत्पाद निर्माता भारतीय बाजार को लेकर उत्साहित हैं क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा आयातक देष है और इसका रक्षा बजट दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रक्षा बजट है।

दोनों देषों के बीच हुए समझौते और संबंध निहितार्थों के मोर्चे पर ऐतिहासिक हैं। षेष दुनिया इस बारे में सुराग खोज रही है कि अमेरिका भारत के बीच गहरी होती भागीदारी विश्व व्यवस्था को किस तरह से प्रभावित कर सकती है। एक ऐसी व्यवस्था, जो जल्द ही अमेरिका की तुलना में यहां एषियाई प्रभुत्व स्थापित कर सकती है जिसमें भारत और चीन दोनों शामिल है। लोकतंत्र और निरंकुषता के बीच चुनौती स्वाभाविक है, लेकिन रूस के साथ भारत के रिष्ते आडे नहीं आए। इसीलिए दौरे के दौरान फोकस रूस और चीन के बीच नोलिमिट दोस्ती पर ही रहा, जिसका मतलब है कि इंडो-पेसिफिक क्षेत्र को सुरक्षित करना होगा। अमेरिका को भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद या मिसाइल रोधी गोलीबारी की खरीद को दरकिनार करना पड़ा। क्योंकि इंडो पेसिफिक को मजबूत करने के लिए इतिहास की झिझक को बुलाकर दोनों देषों के बीच घनिष्ठ आलिंगन के लिए व्यवहारिकता की पर्याप्त खुराक की आवष्यकता थी।

दोनों देषों द्वारा निर्धारित रणनीति के एजेंडे में निष्चित रूप से वाणिज्यिक समझौते शामिल थे। भारत के आर्थिक उत्थान से विश्व को मदद मिलेगी क्योंकि भारत एक संभावित बाजार उपलब्ध कराएगा। बदले में हमें जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण मिलेगा वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में सहायक के रूप में कार्य करेगा। दोनों देष इस दिषा में लगातार काम कर रहे हैं। यहां दोनों देषों ने समझा है कि शून्य राषि वाला खेल संभव नहीं है, यह पूरी तरह से लेन-देन पर आधारित है।

अमेरिका के साथ भारत का जुड़ाव गहरा, मजबूत और अधिक व्यापक होता जा रहा है लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता न करने के उद्देष्य पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है। अमेरिका अभी भी एक द्विध्रुवीय दुनिया चाहता है, जिसके साथ भारत सहज नहीं है। फिर भी एक तरफ अपनी सीमा और संप्रभुता की रक्षा करने और दूसरी तरफ अपने आर्थिक हितों को बढ़ाने की भारत की इच्छा अमेरिकी हितों के अनुरूप है, वह यह भी जानता है। आषा की जानी चाहिए कि आपसी विश्वास और समायोजन की नई सुबह से दो बड़े लोकतंत्रों का सहजीवी विकास होगा।

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