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ट्रंप के टैरिफ झटके पर न्यायिक रोकः अमेरिका-भारत आर्थिक संबंधों के लिए क्या है मायने?

By Super • 20 Feb 2026
ट्रंप के टैरिफ झटके पर न्यायिक रोकः अमेरिका-भारत आर्थिक संबंधों के लिए क्या है मायने?

संयुक्त राज्य अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय ने 6-3 के बहुमत वाले ऐतिहासिक फैसले में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा आपातकालीन प्रावधानों के तहत लगाए गए व्यापक टैरिफ को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मौजूदा कानून राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल के नाम पर असीमित और व्यापक टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता। इस फैसले ने ट्रंप प्रशासन की आक्रामक टैरिफ नीति पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमा लगा दी है और वैश्विक व्यापार वार्ताओं में एक नई अनिश्चितता भी पैदा कर दी है। भारत के लिए यह फैसला एक नाजुक समय पर आया है। हाल के महीनों में बढ़ते टैरिफ खतरों के बीच नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच एक अंतरिम व्यापार व्यवस्था के लिए प्रारंभिक ढांचे पर सहमति बनने की खबरें सामने आई थीं। लेकिन अमेरिकी प्रशासन की ओर से बार-बार बदलते संकेतों और परस्पर विरोधी बयानों ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी। भारत में भी इस बात को लेकर आलोचना हुई कि ऐसी अनिश्चित परिस्थितियों में व्यापार समझौते की जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत ने कथित तौर पर आगे की वार्ताओं को फिलहाल टाल दिया है, ताकि नई परिस्थितियों का आकलन किया जा सके। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही आक्रामक टैरिफ वृद्धि अमेरिकी व्यापार नीति की पहचान बन गई थी। समर्थकों का तर्क था कि यह नीति दशकों से जारी औद्योगिक गिरावट को रोकने और घरेलू उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए आवश्यक है। आलोचकों का मानना था कि व्यापक संरक्षणवाद अंततः आर्थिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के राजनीतिक समर्थकों के कुछ वर्गों में भी इस नीति की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे थे। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय तक एक उच्च लागत लेकिन अत्यंत प्रतिस्पर्धी औद्योगिक अर्थव्यवस्था रहा है। बीसवीं सदी के अधिकांश समय में ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, वस्त्र और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक उत्पादन में उसकी अग्रणी भूमिका रही। उस दौर में टैरिफ घरेलू उद्योग को सुरक्षा देने के साथ-साथ संघीय सरकार के लिए राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी थे। समय के साथ, विशेषकर वैश्वीकरण के दौर में, अमेरिकी नीति निर्माताओं ने आयात शुल्क को धीरे-धीरे कम करना शुरू किया ताकि उपभोक्ताओं को सस्ते आयात उपलब्ध हो सकें। 1995 में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के बाद व्यापार बाधाओं में कमी को संस्थागत रूप मिला और यह प्रवृत्ति और गहरी हो गई। इसका परिणाम एक संरचनात्मक परिवर्तन के रूप में सामने आया। सस्ते आयातों से अमेरिकी उपभोक्ताओं को लाभ तो मिला, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार घटने लगा। हालांकि कहानी यहाँ पूरी नहीं होती। जैसे-जैसे निम्न-स्तरीय औद्योगिक उत्पादन एशिया और अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित हुआ, अमेरिका ने उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों, फार्मास्यूटिकल्स, उन्नत रक्षा प्रणालियों, बौद्धिक संपदा, वित्तीय सेवाओं और अंतरिक्ष तकनीक जैसे क्षेत्रों में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली।

1999 में यूरो के आगमन के बाद भी वैश्विक आरक्षित मुद्रा के रूप में अमरीकी डॉलर की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत के आसपास बनी रही। यह इस बात का संकेत है कि अमेरिकी आर्थिक शक्ति केवल पारंपरिक विनिर्माण पर आधारित नहीं थी, बल्कि तकनीकी और वित्तीय प्रभुत्व पर भी टिकी हुई थी। दूसरे शब्दों में, अमेरिका का औद्योगिक ढांचा पूरी तरह ढहा नहीं, बल्कि उसने वैश्विक अर्थव्यवस्था के उच्चतम स्तरों पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि ऊँचे टैरिफ से एक ओर संघीय राजस्व में वृद्धि होगी और दूसरी ओर घरेलू उद्योगों को संरक्षण मिलेगा। 2025 में टैरिफ से प्राप्त राजस्व लगभग 287 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया, जबकि पहले यह 70 से 80 अरब डॉलर के बीच रहता था। फिर भी कुल संघीय राजस्व में इसकी हिस्सेदारी केवल 4 से 5 प्रतिशत के आसपास ही रही, जबकि ऐतिहासिक रूप से यह लगभग 2 प्रतिशत रही है। लेकिन संघीय आय का अधिकांश हिस्सा आज भी आयकर और पेरोल कर से ही आता है। टैरिफ का व्यापक आर्थिक प्रभाव हालांकि अधिक स्पष्ट रहा है। आयात शुल्क वस्तुतः आयातित वस्तुओं पर लगाया गया एक प्रकार का उपभोग कर होता है, इसका सीधा बोझ विदेशी निर्यातकों पर नहीं, बल्कि घरेलू आयातकों और अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है। आयात महंगे होने से क्रय शक्ति कम होती है, महंगाई का दबाव बढ़ता है और मौद्रिक नीति के लिए नई चुनौतियां पैदा होती हैं। ऐसे वातावरण में ब्याज दरों में संभावित वृद्धि आर्थिक गतिविधियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। दशकों तक अमेरिकी बाजार तक खुली पहुंच ने दुनिया भर के देशों के साथ राजनीतिक और व्यावसायिक सद्भाव को बढ़ावा दिया। जो देश अमेरिका को निर्यात करते थे, वे अक्सर अमेरिकी कंपनियों को अपने बाजारों में निवेश और व्यापार के अवसर भी देते थे। इससे मुनाफा, रॉयल्टी और कर राजस्व के रूप में अमेरिका को भी लाभ मिलता था। उच्च टैरिफ इस व्यवस्था की दिशा को उलट देते हैं। आर्थिक परस्पर निर्भरता को मजबूत करने के बजाय वे देशों को अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक व्यापार साझेदार तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी संदर्भ में वैश्विक आर्थिक संरचना में धीरे-धीरे बदलाव के संकेत भी दिखाई देने लगे हैं। व्यापार भुगतान में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग में वृद्धि और ब्रिक्स जैसे समूहों की बढ़ती सक्रियता इस व्यापक पुनर्संतुलन की ओर इशारा करती है। हालांकि डॉलर का प्रभुत्व अभी भी कायम है, लेकिन लगातार व्यापार तनाव दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तनों को तेज कर सकते हैं। सैद्धांतिक रूप से राष्ट्रपति कांग्रेस से व्यापक टैरिफ अधिकार प्राप्त करने के लिए कानून पारित कराने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन बहुमत सीमित है और व्यापार नीति को लेकर आंतरिक मतभेद भी स्पष्ट हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कार्यपालिका की एकतरफा शक्ति पर संस्थागत नियंत्रण स्थापित करता है।

अमरीकी प्रशासन कुछ वैकल्पिक उपायों पर भी विचार कर रहा है, जिनमें सेक्शन 122 के तहत अस्थायी वैश्विक टैरिफ शामिल है। प्रारंभिक प्रस्ताव 10 प्रतिशत का था जिसे बाद में 15 प्रतिशत तक बढ़ाने की बात सामने आई। यदि इसे मौजूदा लगभग 3.3 प्रतिशत के ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ शुल्क के साथ जोड़ा जाए तो कुल प्रभावी टैरिफ लगभग 18 प्रतिशत के आसपास बैठता है। यह पहले के प्रस्तावित 25 प्रतिशत से कम है, लेकिन यदि इसे सभी देशों पर समान रूप से लागू किया जाता है तो भारत जैसे देशों के लिए अपेक्षित विशेष लाभ कम हो सकते हैं। इस नई स्थिति में भारत को अपनी व्यापार रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। यदि भेदभावपूर्ण टैरिफ कानूनी रूप से सीमित हो जाते हैं तो भारत को वार्ता में कुछ अतिरिक्त गुंजाइश मिल सकती है। साथ ही अमेरिकी नीति की अनिश्चितता को देखते हुए सतर्कता भी आवश्यक है। वार्ताओं को फिलहाल स्थगित करना संभवतः पीछे हटना नहीं, बल्कि एक सामरिक विराम है। इस पूरे घटनाक्रम का व्यापक संदेश स्पष्ट है। टैरिफ अल्पकालिक राजनीतिक उपकरण तो हो सकते हैं, लेकिन वे प्रतिस्पर्धात्मकता, नवाचार और दीर्घकालिक औद्योगिक नीति का विकल्प नहीं बन सकते। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह भी दर्शाता है कि आर्थिक राष्ट्रवाद के दौर में भी अमेरिकी शासन प्रणाली में संस्थागत संतुलन और नियंत्रण की भूमिका निर्णायक बनी रहती है।

अब यह देखना बाकी है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले के बाद अपनी रणनीति को संशोधित करता है या टकराव का रास्ता अपनाता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि न्यायपालिका ने कार्यपालिका की व्यापार शक्ति पर एक महत्वपूर्ण सीमा तय कर दी है। भारत के लिए सबसे विवेकपूर्ण रणनीति यही होगी कि वह सतर्कता, लचीलापन और अपने वार्ताकारी हितों की रक्षा के साथ आगे बढ़े।

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