swadeshi jagran manch logo

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए डीआरडीओ और एचएएल में सुधार

By Dulichand Kaliraman • 20 Nov 2025
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए डीआरडीओ और एचएएल में सुधार

भविष्य में भारत न केवल रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनेगा अपितु रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित होगा। - दुलीचंद कालीरमन

 

भारत के रक्षा क्षेत्र के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की दिशा में कई संस्थाओं ने योगदान दिया है, जिनमें रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की भूमिका सबसे अधिक उल्लेखनीय रही है। डीआरडीओ ने आधुनिक तकनीक, मिसाइल प्रणाली, राडार, ड्रोन और युद्धक उपकरणों के विकास में भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। वहीं, एचएएल ने लड़ाकू विमानों, हेलिकॉप्टरों और एयरोस्पेस उपकरणों के निर्माण व रखरखाव के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं। इन दोनों संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों से भारत न केवल रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बन रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन कर रहा है।

आज के युद्ध में तकनीकी विकास जिस तीव्र गति से हो रहा है, उसे देखते हुए भारत के सामने भी अपनी सेनाओं को आधुनिक बनाने की चुनौती लगातार बढ़ रही है। उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं से उत्पन्न सुरक्षा खतरों को ध्यान में रखते हुए नई तकनीक, अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों और मारक क्षमताओं का समय पर विकास अत्यंत आवश्यक है। किंतु रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) कई बार समय पर आवश्यक उपकरण और साजो-सामान उपलब्ध कराने में विफल रहे हैं, जिससे इनकी कार्यकुशलता पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। परियोजनाओं में देरी और लागत की वृद्धि से न केवल रक्षा तैयारियों पर असर पड़ता है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता की राह भी कठिन हो जाती है। ऐसे में ज़रूरी है कि इन संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार किए जाएँ, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जाए और वैश्विक रक्षा उद्योग की नवीनतम प्रवृत्तियों के अनुरूप अनुसंधान एवं उत्पादन की गति तेज़ की जाए, ताकि भारतीय सेना भविष्य के युद्धों के लिए पूर्णतः सुसज्जित और सक्षम बन सके।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 2023 में ‘विजय राघवन पैनल’ का गठन किया, ताकि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किया जा सके। इस पैनल का मुख्य लक्ष्य संस्थान की कार्यकुशलता बढ़ाना और रक्षा उत्पादन से जुड़ी देरी को समाप्त करना था। रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए विजय राघवन पैनल ने सुझाव दिए हैं कि डीआरडीओ को अपने अनुसंधान कार्यों में गति लानी होगी, परियोजनाओं का समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित करना होगा तथा रक्षा उद्योग में नवाचार और निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करना होगा। इसके अतिरिक्त, वैश्विक स्तर की तकनीकी प्रवृत्तियों को अपनाकर ही भारत अपनी सेनाओं को आधुनिक और आत्मनिर्भर बना सकता है।

विजय राघवन पैनल के अनुसार रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को अपनी ऊर्जा और संसाधनों को मूल अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) कार्यों पर केंद्रित करना चाहिए। डीआरडीओ वर्तमान में अनुसंधान, विकास और उत्पादनकृतीनों स्तरों पर कार्य कर रहा है, जिससे उसकी दक्षता प्रभावित हो रही है। डीआरडीओ को उत्पादीकरण, उत्पादन चक्र और उत्पाद प्रबंधन जैसे क्षेत्रों से दूरी बनाए रखनी चाहिए, क्योंकि ये जिम्मेदारियाँ निजी क्षेत्र के लिए अधिक उपयुक्त हैं। समिति की इन सिफारिशों का उद्देश्य डीआरडीओ की कार्यक्षमता को बढ़ाना, उसे अनावश्यक जिम्मेदारियों से मुक्त करना और रक्षा क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीक के विकास को गति देना है।

डीआरडीओ के सामने कई गंभीर चुनौतियाँ हैं, जिनके कारण उसकी कार्यकुशलता और साख पर सवाल उठते रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या उसकी परियोजनाओं में देरी है। दिसंबर 2023 में ‘रक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति’ की रिपोर्ट में बताया गया कि 55 मिशन मोड परियोजनाओं में से 23 समय पर पूरी नहीं हो सकीं। इसी तरह, दिसंबर 2022 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि डीआरडीओ की जिन 178 परियोजनाओं की जाँच की गई, उनमें से 67 प्रतिशत निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी नहीं हो पाईं। दूसरी चुनौती अनुसंधान बजट में लगातार गिरावट है, जिसके कारण कई परियोजनाएँ या तो लागत बढ़ने से प्रभावित हुईं या फिर बंद करनी पड़ीं।

इसके अलावा, भारत की बाहरी रक्षा खरीद पर निर्भरता भी चिंताजनक है। वर्तमान स्वदेशीकरण दर को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले 10 वर्षों में भारत 80 से 90 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण प्राप्त कर सकता है, परंतु अभी तक भारत हथियार आयात के मामले में दुनिया में सबसे आगे है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) की रिपोर्ट के अनुसार, 2018-22 के दौरान भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा। यह स्थिति “मेक इन इंडिया“ पहल को बाधित करती है। एक अन्य गंभीर चुनौती गुणवत्ता मानकों की है। अक्सर डीआरडीओ के उत्पाद अपेक्षित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरते। 

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार डीआरडीओ और एचएएल के पुनर्गठन करने की दिशा में ठोस कदम उठा रही है, ताकि परिचालन दक्षता में वृद्धि हो सके और रक्षा उत्पादों की डिलीवरी में तेजी लाई जा सके। यह कदम विशेष रूप से लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में हुई देरी और 2.7 लाख करोड़ रूपये से अधिक के ऑर्डर बैकलॉग को देखते हुए आवश्यक हो गया है। प्रस्तावित बदलावों में एच.ए.एल को स्वतंत्र इकाइयों में विभाजित करना शामिल है, जहाँ प्रत्येक इकाई अलग-अलग एयरोस्पेस विनिर्माण क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल करेगी। इसके साथ ही, सरकार हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के एकाधिकार से आगे बढ़कर निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना चाहती है, ताकि एडवांस्ड मल्टीरोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) जैसी नई परियोजनाओं में निजी कंपनियाँ भी स्वतंत्र रूप से बोली लगा सकें या अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साझेदारी कर सकें।

इसके पुनर्गठन का उद्देश्य मौजूदा परियोजनाओं की डिलीवरी में तेजी लाना और उत्पादन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना है। साथ ही, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की क्षमता को भविष्य की नई परियोजनाओं के लिए भी मुक्त करना है। इसके लिए कंपनी को एक अधिक कॉरपोरेट-शैली के परिचालन मॉडल की ओर ले जाया जा रहा है, जहाँ गति, पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। इस दिशा में सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए मिसाइल एवं गोला-बारूद निर्माण के लिए निजी क्षेत्र को भी लाइसेंस देने का निर्णय लिया है। 

इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि निकट भविष्य में डीआरडीओ और एचएएल की पहचान न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर भी मजबूत होगी। भारत न केवल रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनेगा अपितु रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित होगा।    

More articles by Dulichand Kaliraman