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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में भारतीय रुपया

By Vinod Johri • 07 Aug 2023
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में भारतीय रुपया

नीति निर्माताओं के लिए यही बेहतर होगा कि वे रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को सतत रखें और वित्तीय बाजारों के विकास तथा अंतर राष्ट्रीय अपेक्षाओं के अनुरूप मजबूत वृहद आर्थिक बुनियाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाए। - विनोद जौहरी

 

वर्तमान में यह चर्चा गंभीर है कि विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में स्थापित होना चाहिए। इसके लिए रिजर्व बैंक ने आवश्यक कदम उठाए है परंतु फिर भी कुछ आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं और उत्साहजनक रूप से प्रयास भी ही रहा है। 

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में रुपए में चालान-प्रक्रिया के लिये भारत की कोशिशों ने हालिया विदेश व्यापार नीति 2023 के साथ गति प्राप्त की है, जो भारतीय रुपए में व्यापार की चालान-प्रक्रिया, भुगतान और निपटान का प्रस्ताव करता है। इस कदम से अन्य लाभों के साथ-साथ लेन-देन की लागत कम होने, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलने और ‘हेजिंग’ व्यय के कम होने की उम्मीद है। रुपया वर्तमान में वैश्विक मुद्रा बाज़ार कारोबार में मात्र 2 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। यह फ्रेमवर्क रूस, सऊदी अरब, नाइजीरिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे व्यापार भागीदारों के लिये विशेष रूप से लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। हालाँकि, इस नीति की प्रभावशीलता अंततः भारत के शुद्ध व्यापार घाटे/अधिशेष और कुल द्विपक्षीय व्यापार की तुलना में रुपए में व्यापार की सीमा जैसे कारकों पर निर्भर करती है।कुल मिलाकर, भारतीय रुपए के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देने के लिये सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक और अन्य हितधारकों की ओर से अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में भारतीय रुपए की मांग को बढ़ावा देने के लिये एक ठोस प्रयास की आवश्यकता होगी।

रुपए का अंतर्राष्ट्रीयकरण मुद्रा रूपांतरण की आवश्यकता को कम कर सकता है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करने वाले व्यक्तियों के लिये लेन-देन की लागत कम हो सकती है। यह विदेशी निवेशकों के लिये भारत में व्यापार करने को और अधिक आकर्षक बना  सकता है और वैश्विक बाज़ारों में भारत के निर्यात को अधिक प्रतिस्पर्द्धी बना सकता है। जब अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में रुपए का व्यापक रूप से उपयोग होगा तो यह मूल्य पारदर्शिता के वृहत स्तर की ओर ले जा सकता है। यह भारतीय कारोबारों को वैश्विक बाज़ार की स्थितियों को बेहतर ढंग से समझने और तदनुसार अपनी मूल्य निर्धारण रणनीतियों को समायोजित करने में सक्षम बना सकता है। रुपए का अंतर्राष्ट्रीयकरण अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन के लिये त्वरित और अधिक कुशल निपटान समय की सुविधा प्रदान कर सकता है। यह सीमा-पार भुगतान से जुड़े समय और लागत को कम करके भारतीय कारोबारों को लाभान्वित कर सकता है।

अंतर्राष्ट्रीयकृत रुपया भारतीय व्यवसायों के लिये अपने वैश्विक समकक्षों के साथ लेन-देन करना सरल एवं सस्ता बनाकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दे सकता है। इससे देश के निर्यात और आर्थिक विकास में वृद्धि हो सकती है।रुपए की व्यापक स्वीकृति और अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में उपयोग की वृद्धि के साथ मुद्रा उतार-चढ़ाव के विरुद्ध हेजिंग की आवश्यकता कम हो सकती है। इससे व्यवसायों और निवेशकों के लिये लागत बचत हो सकती है।

अंतर्राष्ट्रीयकृत रुपया भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विदेशी रिज़र्व रखने की लागत को कम कर सकता है। जब अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में रुपए का व्यापक प्रचलन और उसकी स्वीकृति होगी तो रिजर्व बैंक के लिये अपने कार्यकरण के संचालन हेतु अधिक विदेशी मुद्रा रखने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे लागत में कमी आएगी। भारत में अभी भी पूंजी नियंत्रण की स्थिति है जो भारतीय बाज़ारों में निवेश और व्यापार करने की विदेशियों की क्षमता को सीमित करता है। ये नियंत्रण भारतीय रुपए के लिये अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में व्यापक रूप से उपयोग किये जाने को कठिन बनाते हैं। वैश्विक आरक्षित मुद्रा के रूप में उपयोग की जाने वाली किसी मुद्रा के लिये मुद्रा विनिमय दर स्थिरता एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिये बड़े एवं तरल वित्तीय बाज़ारों का विकास एक पूर्व शर्त है। भारतीय वित्तीय बाज़ार अभी भी विकास की प्रक्रिया में है और इसे वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के साथ और अधिक एकीकृत करने की आवश्यकता है।

जब किसी मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की बात आती है तो मुद्रास्फीति की दर भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। भारतीय रिज़र्व बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में सफल रहा है, लेकिन निम्न मुद्रास्फीति दर विदेशी निवेशकों के लिये मुद्रा को कम आकर्षक बना सकती है।

राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और प्रतिबंध जैसे भू-राजनीतिक कारक मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीयकरण पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। भारत को अन्य देशों के साथ स्थिर संबंध रखने और भू-राजनीतिक संघर्षों में लिप्त होने से बचने की आवश्यकता है, क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में रुपये के उपयोग को प्रभावित कर सकते हैं।

सरकार को दूसरे देशों, विशेष रूप से नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के साथ सीमा-पार व्यापार को अन्य मुद्राओं के बजाय भारतीय रुपए में किये जाने को प्रोत्साहित करना चाहिये। इससे इन देशों में भारतीय रुपए की मांग बढ़ेगी, जिससे इसके अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा मिलेगा। विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिये भारत अपने वित्तीय बाज़ारों, विशेष रूप से बॉण्ड बाज़ार के विकास को बढ़ावा दे सकता है। इससे भारतीय रुपए-मूल्यवर्ग के बॉण्ड की मांग बढ़ेगी और अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में इसके उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार को विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिये पूंजी खाता लेन-देन को और उदार बनाना चाहिये, जिससे अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में भारतीय रुपए की मांग बढ़ेगी। सरकार को द्विपक्षीय मुद्रा विनिमय समझौतों पर हस्ताक्षर करके अपने व्यापारिक भागीदारों को अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में भारतीय रुपए का उपयोग करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। यह अपने पड़ोसी देशों के साथ एक भारतीय रुपया-आधारित व्यापारिक मंच बनाने की संभावना की भी तलाश कर सकती है।

भारतीय रिजर्व बैंक की अंतर-विभागीय समिति ने अन्य देशों में रुपये में लेनदेन को लोकप्रिय बनाने तथा डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए आज कई कदम उठाने की सिफारिश की। श्री राधा श्याम राठो की अध्यक्षता वाली समिति ने रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के तौर पर प्रोत्साहित करने के लिए अल्पावधि, मध्यम अवधि और दीर्घावधि के उपाय सुझाए हैं। समिति ने कहा है कि रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए पूंजी खाता परिवर्तनीयता और पूंजी खाता परिवर्तनीयता के लिए रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण शर्त नहीं है। परिवर्तनीयता का मौजूदा स्तर रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने के लिए काफी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देश सतर्क हो गए हैं और सोचने लगे हैं कि यदि पश्चिमी देश उन पर भी इसी तरह के प्रतिबंध लगाते हैं तो उन्हें कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के वैश्विक घटनाक्रम और व्यापार तथा पूंजी प्रवाह के लिहाज से बाकी दुनिया के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था का जुड़ाव बढ़ने से रुपये समेत कई मुद्राओं के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के लिए बुनियाद तैयार हो गई है। 

भारत ने पूंजी खाता परिवर्तनीयता, वैश्विक मूल्य श्रृंखला के एकीकरण, गिफ्ट सिटी की स्थापना आदि के मामले में सराहनीय प्रगति की है। विदेशी व्यापार के चालान और निपटान के साथ-साथ पूंजी खाता लेनदेन में रुपये का ज्यादा उपयोग होने से रुपये की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी बढ़ती जाएगी। 

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से रिजर्व बैंक ने भी बैंकों को द्विपक्षीय व्यापार भारतीय मुद्रा में करने की इजाजत दे दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रीलंका ने हाल ही में रुपये को विदेशी मुद्रा के रूप में जो मान्यता दी है, उससे रुपये का अंतरराष्ट्रीय दर्जा और भी पुख्ता होता है।

रिपोर्ट में मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण से आने वाली चुनौतियां भी बताई गई हैं क्योंकि शुरुआत में इसके विनिमय दर में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। इससे मौद्रिक नीति पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि वैश्विक मांग पूरी करने के लिए मुद्रा मुहैया कराने की मजबूरी देश की मौद्रिक नीतियों के साथ टकरा सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी मुद्रा में उतारचढ़ाव का जोखिम कम होने, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों तक बेहतर पहुंच के कारण पूंजी की लागत घटने, विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत कम होने जैसे फायदे मुद्रा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के नुकसानों पर भारी पड़ते हैं।

अल्पकालिक उपाय के तौर पर समिति ने दो साल के भीतर भारतीय रुपये और स्थानीय मुद्राओं में बिल बनाने, निपटाने तथा भुगतान करने के लिए द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था संबंधी प्रस्ताव जांचने के लिए मानक प्रणाली तैयार करने का सुझाव दिया है।इसके अलावा भारत के भीतर तथा बाहर रहने नाले प्रवासियों के लिए (विदेशी बैंकों के नोस्ट्रो खातों के अलावा) रुपया खाते खोलने को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। समिति ने सीमापार लेनदेन के लिये अन्य देशों के साथ भारतीय भुगतान प्रणालियों को एकीकृत करने और वैश्विक स्तर पर पांचों कारोबारी दिन 24 घंटे काम करने वाले भारतीय रुपया बाजार को बढ़ावा देकर वित्तीय बाजारों को मजबूत करने का सुझाव दिया है। समिति ने मध्यम अवधि की रणनीति के तहत दो से पांच साल में मसाला बॉन्ड (विदेशों में रुपये मूल्य में जारी होने वाले बॉन्ड) पर लगने वाला 5 प्रतिशत विदहोल्डिंग टैक्स हटाए जाने की सिफारिश की है। इससे पूंजी की लागत घटेगी। साथ ही सीमापार व्यापारिक लेनदेन के लिये आरटीजीएस के इस्तेमाल पर विचार किया जा सकता है। किसी मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा तभी कहा जा सकता है जब उसका इस्तेमाल जारी करने वाले देश की सीमाओं के परे भी किया जा सकता हो और वह विनिमय के माध्यम के रूप में काम आ सके।  

आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कई देश विदेशी मुद्रा वाला बनना चाहते हैं। कुछ देश इस दिशा में इसलिए भी प्रयास कर रहे हैं कि वे अमेरिकी डॉलर से दूरी बनाना चाहते हैं। आंशिक तौर पर ऐसा भू-राजनीतिक वजहों से है। एक विचार यह भी है कि कि भारत को रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की दिशा में थोड़ा धीमी गति से बढ़ना चाहिए। रिपोर्ट की कुछ अनुशंसाओं से वृहद आर्थिक जोखिम भी बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए रिपोर्ट की एक अनुशंसा यह है कि सभी सरकारी प्रतिभूतियों को पूर्ण पहुंच वाले माध्यम से जारी करना चाहिए और प्रयास किया जाना चाहिए कि सरकारी बॉन्ड को वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में शामिल किया जा सके।  

वास्तव में रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण एक हद तक भारत के पूंजीगत खाते के खुलेपन की क्षमता पर भी निर्भर करता है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि एक मुद्रा का अंतरराष्ट्रीयकरण जोखिम रहित नहीं होता है। वैश्विक बाजारों में अस्थिरता के दौर में रुपये या रुपये आधारित संपत्ति रखने वाले संस्थान उससे मुक्ति पाना चाहेंगे। इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत अब तक पूंजी खाते को लेकर सतर्कता से आगे बढ़ा है।  अमेरिकी डॉलर अभी भी अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन की प्रमुख मुद्रा है क्योंकि उसे एक बड़े, खुले और नकदीकृत बाजार का समर्थन हासिल है। नीति निर्माताओं के लिए यही बेहतर होगा कि वे रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को सतत रखें और वित्तीय बाजारों के विकास तथा अंतर राष्ट्रीय अपेक्षाओं के अनुरूप मजबूत वृहद आर्थिक बुनियाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाए।     ु

लेखक-पूर्व अपर आयकर आयुक्त दिल्ली।

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