प्रधानमंत्री मोदी ने दी सबसे पहले जीत की बधाई
बांग्लादेश में चाहे जो सरकार हो, जैसी भी राजनीतिक परिस्थितियाँ हों, आधा बांग्लादेश भारत में घुसपैठियों के रूप में रहता हैं और पूरे देश में इन घुसपैठियों के विरुद्ध रोष हैं। - विनोद जौहरी
बांग्लादेश में जातीय संसद के लिए 12 फ़रवरी 2026 को संपन्न राष्ट्रीय चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की दो तिहाई बहुमत से विजय और और उसके अध्यक्ष तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावना ने भारत और बांग्लादेश के सम्बन्धों में सकारात्मक परिवर्तन के संकेत दिये हैं। शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी पर प्रतिबंध के कारण बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के दो तिहाई बहुमत की धरातल पर सत्यता संदिग्ध है। भविष्य में भारत और बांग्लादेश के आपसी सम्बन्धों में किस प्रकार सुधार आ सकता है, इसके लिए भारत को बांग्लादेश की आंतरिक राजनीतिक स्थिति और नयी सरकार की चीन, अमेरिका और पाकिस्तान के समन्वय पर दृष्टि रखनी आवश्यक है।
देश भर में कट्टरपंथियों द्वारा प्रदर्शनों के बाद अवामी लीग पार्टी की प्रधानमंत्री शेख हसीना को पदच्युत करने और उनको देश से पलायन को विवश करने के पश्चात मोहम्मद युनूस के 8 अगस्त 2024 को अभीक्षक प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। मोहम्मद युनूस के छोटे से कार्यकाल में बांग्लादेश की राजनीति में जितने नकारात्मक प्रभाव हुए उसने न केवल उस देश की अर्थव्यवस्था को चौपट किया बल्कि भारत के साथ उनका शत्रुतापूर्ण व्यवहर और पाकिस्तान, चीन एवं अमेरिका के साथ मिलकर भारत के विरुद्ध गतिविधियों का चक्रव्युह खड़ा किया। बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की हत्या, उनके घरों और मंदिरों में आगजनी, लूटपाट मोहम्मद युनूस सरकार के परोक्ष और अपरोक्ष समर्थन से होती रहीं। अवामी लीग पार्टी के कार्यकर्ताओं की हत्याएँ भी होती रहीं। पड़ोसी देशों को प्रथम प्राथमिकता देने की विदेश नीति के अनुपालन करने के कारण भारत की ओर से अत्यधिक संयम रखने के बावजूद मोहम्मद युनूस भारत विरोधी गतिविधियों को आगे बढ़ाते रहे और पाकिस्तान के कट्टरपंथी तत्वों के साथ मिलकर भारत की संप्रभुता को भी आहत करने के निष्फल प्रयास करते रहे। भारत की ओर से बांग्लादेश को पारगमन की सुविधाएं रोकने और गंगा नदी बँटवारे के समझौते के पुनरावलोकन करने के प्रयास भी हुए।
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और बांग्लादेश के मीडिया और समाचार पत्रों में बांग्लादेश और भारत के सम्बन्धों का आंकलन भारत के लिए विश्वसनीय आधार नहीं हो सकता और बांग्लादेश के भविष्य का आंकलन करना भी जल्दबाज़ी होगी। मोहम्मद युनूस और तारिक रहमान दोनों बांग्लादेश की मुख्यधारा के राजनीतिक व्यक्ति नहीं हैं और निश्चित रूप से विदेशी हस्तक्षेप की दृष्टि से संवेदनशील हैं। क्योंकि मोहम्मद युनूस राष्ट्रीय चुनावों में भागीदार नहीं थे इसलिए अब उस देश की राजनीति और प्रशासन में उनका कोई प्रभाव नहीं होगा, ऐसा प्रतीत होता है। परंतु जिस प्रकार उन्होने भारत और बांग्लादेश के सम्बन्धों पर कुठराघात किया, विदेशी ताकतों द्वारा उनको दिये गए निर्देशों का पालन उन्होने समयबद्ध सीमा में कर दिया और उनके रोल का पटाक्षेप हो गया। इसकी भरपाई करना बांग्लादेश की नयी सरकार का ही कर्तव्य है।
मोहम्मद युनूस के लगभग अट्ठारह महीनों के कार्यकाल में यह सिद्ध हो गया कि इस्लामिक देशों ने बांग्लादेश की उपद्रवी स्थिति में न कोई रुचि दिखाई और न अपना हाथ बढ़ाया। न किसी इस्लामिक देश ने पदच्युत और अपने प्राण बचाने को विवश शेख हसीना को शरण दी और न ही बांग्लादेश में राष्ट्रीय चुनावों में अवामी लीग पार्टी पर प्रतिबंध हटाने को लेकर कोई प्रतिक्रिया दिखाई। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया अपने हितों को साधता है और उसमें निहितार्थ ताक़तें भी बांग्लादेश की हितैषी नहीं हैं। जो बांग्लादेश की सेना राष्ट्रीय चुनावों में निष्पक्षता का दावा कर रही थी वही सेना और पुलिस मोहम्मद युनूस के कार्यकाल में हिंदुओं पर अत्याचार, हिन्दू मंदिरों और घरों में आगजनी और लूटपाट में मूदर्शक थी। इतिहास साक्षी है कि इस्लामिक देशों में लोकतन्त्र का कोई महत्व नहीं है और चुनावों में विरोधी दलों पर प्रतिबंध के कारण पारदर्शिता नहीं होती इसलिए शासन, प्रशासन, विदेश और रक्षा नीति, अर्थव्यवस्था, अल्पसंख्यकों के साथ दमन कट्टरपंथियों के नियंत्रण में रहता है। आर्थिक रूप से अशक्त होने के कारण इस्लामिक देशों की निर्भरता अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, चीन, अमेरिका और पश्चिमी देशों पर रहती है इसलिए विदेशी ताक़तें वहाँ प्रभावी रहती हैं। बांग्लादेश की यह परिस्थितियाँ निश्चित रूप से भारत सरकार की दृष्टि में होंगी। यही परिद्रश्य सम्पूर्ण मध्यपूर्व एशिया में आच्छादित हैं। क्योंकि विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और अब महाशक्ति के रूप में भारत उभर रहा है, तो उसको रोकने के लिए विश्व की महाशक्तियों को इस्लामिक देश पाकिस्तान, मालदीव और बांग्लादेश ही अनुकूल दिखाई देते हैं और वही उनकी शतरंज की बिसात हैं। ऐसे वैश्विक परिद्रश्य में भारत को अपनी पड़ोसी देशों को प्रथम प्राथमिकता देने की विदेश नीति को पाकिस्तान और बांग्लादेश के परिपेक्ष्य में बदलने पर विचार करने की आवश्यकता है। पड़ोसी देशों को प्रथम प्राथमिकता देने की विदेश नीति श्रीलंका, नेपाल और भूटान के लिए ही सम्यक है।
बांग्लादेश में चाहे जो सरकार हो, जैसी भी राजनीतिक परिस्थितियाँ हों, आधा बांग्लादेश भारत में घुसपैठियों के रूप में रहता हैं और पूरे देश में इन घुसपैठियों के विरुद्ध रोष हैं। वर्तमान में मतदाता गहन परीक्षण में इन घुसपैठियों को हटाने की कार्यवाही प्रगति में है। कानून के अनुसार इन पर भारत छोडने का भी दवाब है। इन घुसपैठियों की बंगाल, असम, त्रिपुरा, मेघालय, बिहार की सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी उपस्थिति और जन सख्या परिवर्तन देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके हैं और इनका अपराध तंत्र, नशीले पदार्थों का व्यापार, देश विरोधी गतिविधियों का जाल पूरे देश में प्रशासन के लिए चिंताजनक है। इनको देश की मतदाता सूचियों से हटाना ही पर्याप्त नहीं बल्कि देश से निकालना अपरिहार्य है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से निकालने की कार्यवाही शीघ्र करने की आवश्यकता है।
पिछले दिनों वक़्त संशोधन के विरोध में बिहार के सीमांचल से सटे मुर्शिदाबाद में अचानक भारी हिंसा, हत्या, आगजनी और उपद्रवों ने यह संकेत दिए हैं कि बांग्लादेश से सटे क्षेत्रों में जहाँ भारी जनसंख्या परिवर्तन, घुसपैठियों के जमाव और धर्मांतरण के फलस्वरूप मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में विभाजनकारी गतिविधियों की आशंका है। ऐसी परिस्थितियों में बांग्लादेश की नई सरकार से सम्बन्धों को सामान्य करना एक बड़ी चुनौती है।
बांग्लादेश के साथ गंगा नदी का बंटवारा भारत के हितों के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण है क्योंकि इस बँटवारे के कारण फरक्का बांध को पूरा जल नहीं मिलता और हूगली नदी में जल कम रहता हैं जिससे बंगाल के किसानों का अहित होता है। भारत के हितों की रक्षा करने के लिए बांग्लादेश के साथ 2026 में समाप्त हो रही गंगा जल संधि पर पुनर्विचार आवश्यक है।
जो देश भारत की सीमा से 95 प्रतिशत बंधा है और जिसका अस्तित्व ही भारत पर निर्भर है उसको भी अपनी राजनीतिक व्यवस्था में भारत को वरीयता देनी चाहिए। वह चाहे कितनी भी विदेशी शक्तियों पर अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करे, उसके लिए भारत से बैर रखना उचित नहीं है।

