नेपाल को अपनी विदेश नीति में बड़े परिवर्तन करने होंगे और भारत को अपने पड़ोसी देशों में नेपाल को सबसे अधिक प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। - विनोद जौहरी
भारत के जनमानस में राजनीतिक, सामरिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल के प्रति विशेष आकर्षण, सद्भाव एवं प्रेम है। भले ही भारत एवं नेपाल अलग राष्ट्र हैं परंतु दोनों देशों के बीच सदियों से रोटी - बेटी का संबंध है जो किसी भी राजनीतिक व्यवस्था से परे है। इसका विशेष कारण नेपाल का वस्तुतः हिंदु राष्ट्र और हिंदु बहुल होना है जहां इक्यासी प्रतिशत जनता हिंदु है। पिछले कुछ समय से वामपंथी शासन और प्रशासन में भ्रष्टाचार, रोजगार - व्यापार में अविकास, युवाशक्ति के प्रति सरकारों की अकर्मण्यता और चीन की नेपाल के शोषणकारी नीतियों के विरोध में विद्रोह के पश्चात नेपाल में चुनावों में शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन हुआ है। पिछले पैंतीस वर्षों से वामपंथी दलों और सहयोगी दलों गठबंधनों के मध्य के पी शर्मा ओली, शेर बहादुर देउबा और पुष्प कमल दहल ’प्रचंड’ के बीच सत्ता झूल रही थी। इस बार राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी ने ’प्रचंड’ बहुमत से कुल 165 में से 125 सीटों पर विजय के साथ वामपंथी शासन तंत्र को उखाड़ फेंका है। यह विजय असाधारण है और जनमानस के वामपंथी राजनीतिक इकोसिस्टम के प्रति विद्रोह को परिलक्षित करता है। विश्व भर में विशेषकर भारत में जितने भी वामपंथी दल हैं वह चीन के समर्थक हैं और चीन का एकमात्र लक्ष्य उस देश के संसाधनों का शोषण और उस देश की अर्थव्यवस्था को चीन - निर्भर बनाना है। वामपंथी दलों और उनके गठबंधनों के शासन का सीधा अर्थ है कि वह देश चीन की सैटेलाइट कालोनी बन कर रह जायेगा। उस की अखंडता और संप्रभुता पर भी भय रहेगा और सत्ता परिवर्तन भी चीन की सहमति से होगा। नेपाल के साथ भी यही हुआ है। नेपाल के लाखों युवा युरोप, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों, आस्ट्रेलिया, मध्यपूर्व देशों, अमेरिका में पलायन करने को विवश हैं। यद्यपि भारत में वह सम्मान और आत्मीयता के साथ रहते हैं और भारत के जनमानस में रचे बसे हैं। कुछ समय पूर्व आस्ट्रेलिया के सिडनी में के मार्ट माल में इंडिया होटल रेस्टोरेंट की स्वामिनी जानकी से भेंट हुई और फिर इस्कॉन मंदिर सिडनी में नेपाली युवाओं और भक्तों से भेंट हुई उसके बाद सिडनी हार्बर के रेस्टोरेंट में नेपाली कर्मियों से भेंट हुई परंतु उन सब के मन में अपने देश से विवशतावश दूर रहने की टीस थी।
जिस देश की कुल तीन करोड़ की जनसंख्या में से भी लाखों युवा देश से पलायन करने को विवश हों, उस देश का भविष्य कितना अंधकारमय हो सकता है यह नेपाल के वामपंथी शासकों ने कभी समझा नहीं। नेपाल में इस बार चुनाव के दौरान युवाओं का बड़े पैमाने पर विदेश जाना एक अहम मुद्दा बनकर उभरा है। देश में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण हर साल बड़ी संख्या में युवा काम की तलाश में खाड़ी देशों, मलेशिया और अन्य देशों का रुख करते हैं। इसका असर नेपाल की अर्थव्यवस्था, समाज और परिवारों पर भी पड़ रहा है।
वर्ष 2022 का काठमांडू मेयर चुनाव निर्दलीय के रूप में जीतकर राजनीति में प्रवेश करने वाले पूर्व रैपर शाह जनवरी में आरएसपी में सम्मिलित हुए और उसके प्रधानमंत्री पद के संभावित प्रत्याशी बन गये। 35 वर्ष के इस राजनीतिज्ञ ने 74 साल के ओली को उनके गढ़ झापा में तकरीबन 50,000 वोटों से पराजित किया। युवाशक्ति ने जब राजनीतिक नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव और ओली-दहल-देउबा की तिकड़ी से निर्णायक छुटकारे की मांग की, तो बालेन्द्र शाह उनके ह््रदय सम्राट बने। आरएसपी की विजय का मापदंड, जिसमें काठमांडू घाटी की सभी 15 सीटों पर भारी विजय है, युवाशक्ति के असंतोष की सशक्त अभिव्यक्ति है। भारत से बालेन्द्र शाह का संबंध गहरा है। उन्होंने स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में एमटेक विश्वैवरैरिया टैक्निकल विश्वविद्यालय वर्ष 2018 में से बंगलौर, कर्नाटक से प्राप्त की।
नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों में बालेन्द्र शाह का प्रधानमंत्री बन गये है। यद्यपि वर्तमान में एकाधिकार और विस्तार के महत्वाकांक्षी देशों को यह सनक सवार है कि विभिन्न देशों में सत्ता परिवर्तन उनकी सहमति से हो भले ही वह राजनैतिक मर्यादा के अंतर्गत नये शासकों का सम्मान करें।
यह निश्चित है कि भारत-नेपाल संबंधों में भारत की प्राथमिकता नेपाल का विकास और संप्रभुता है। नेपाल के लिए भी चीन और अमेरिका से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और हितकारी भारत से मित्रता है। नेपाल के नये प्रधानमंत्री के लिए उनके शासनतंत्र, शिक्षा व्यवस्था, ब्यूरोक्रेसी में वामपंथी प्रभाव एक गंभीर चुनौती है। भारत के लिए भी आवश्यक है कि नेपाल की सुरक्षा के प्रति गंभीर प्रयास किया जाये और नेपाल की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर बने। इसके लिए आवश्यक है कि भारत और नेपाल के उद्योगपति संयुक्त उपक्रम स्थापित करें और आपसी पारगमन में सुविधाजनक व्यवस्था सुनिश्चित की जाये जिसमें भारत विरोधी तत्वों के भारत प्रवेश पर नियंत्रण रहे।
भारत और नेपाल के जनमानस में जितना अधिक संपर्क बढ़ेगा, युवाशक्ति का शिक्षा, खेलों और पर्यटन में आपसी समन्वय स्थापित होगा, सरकार और मंत्री स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा, नेपाल को अपनी आवश्यकताओं के लिए अन्य देशों और वैश्विक संगठनों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। नेपाल को अपनी विदेश नीति में बड़े परिवर्तन करने होंगे और भारत को अपने पड़ोसी देशों में नेपाल को सबसे अधिक प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

