swadeshi jagran manch logo

प्रासंगिक है युगानुकूल स्वदेशी चिंतन

By Dr. Dhanpat Ram Agarwal • 20 Dec 2025
प्रासंगिक है युगानुकूल स्वदेशी चिंतन

हमें आज के युगानुकूल चिंतन करने की आवश्यकता है। तकनीक और ज्ञान-विज्ञान के आज के युग में व्यावहारिक चिंतन आवश्यक है। हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता सर्वोपरि है। - डॉ. धनपत राम अग्रवाल

 

भारतीय आर्थिक चिंतन सदैव मानव-केंद्रित रहा है। यहाँ अर्थव्यवस्था को केवल धन-उत्पादन की तकनीक या संसाधनों के प्रबंधन का विज्ञान नहीं माना गया, बल्कि मानव जीवन की संपूर्ण साधना के एक अंग के रूप में देखा गया। इसी परंपरा को आधुनिक युग में दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के रूप में पुनर्स्थापित किया। यह दर्शन बताता है कि मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा-इन चारों का एकीकृत व्यक्तित्व है। इसलिए किसी भी आर्थिक मॉडल का उद्देश्य मानव को पूर्णता की दिशा में आगे ले जाना होना चाहिए। उनकी दृष्टि में अर्थशास्त्र केवल “उत्पादन और उपभोग” नहीं है, बल्कि “मानव जीवन और समाज का संतुलित विकास” है।

स्वदेशी इस संतुलन का आधार है। दीनदयाल जी का मानना था कि प्रत्येक समाज का आर्थिक ढांचा उसकी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं के अनुसार होना चाहिए। कोई भी विदेशी मॉडल भारतीय जीवन-पद्धति को जड़ से नहीं समझ सकता। अतः भारतीय अर्थनीति का आधार भारतीयता ही हो सकती है। दीनदयाल जी ने स्पष्ट किया है कि भारत न पश्चिमी पूंजीवाद की नकल करे और न ही साम्यवाद की। दोनों प्रणालियाँ मनुष्य को उसकी संपूर्णता में नहीं देखती। एक उसे उपभोग की मशीन बना देती है और दूसरी उसे उत्पादन का मात्र उपकरण। एकात्म मानववाद इन दोनों अतियों से अलग मध्यम मार्ग नहीं, बल्कि एक मौलिक भारतीय वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है जिसमें विकास का उद्देश्य मानव-कल्याण और समाज का सामंजस्य है।

महात्मा गांधी की स्वदेशी-नीति भी इसी व्यापक मानवीय चेतना से प्रेरित थी। गांधीजी के अनुसार, स्वदेशी केवल अर्थव्यवस्था का उपकरण नहीं, बल्कि “कर्तव्य का रूप” है। स्थानीय आवश्यकताओं को स्थानीय साधनों से पूरा करना न केवल आर्थिक विवेक है, बल्कि सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की रक्षा भी है। गांधी के चरखा, खादी और ग्रामोद्योग के प्रयोग राष्ट्र के आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे समाज का स्वरूप भी प्रस्तुत करते थे जिसमें श्रम को प्रतिष्ठा, उद्यम को स्वतंत्रता और उपभोग में संयम का स्थान हो। दीनदयाल जी ने इस गांधीवादी भावना को स्वीकार करते हुए यह कहा कि स्वदेशी उत्पादन प्रणाली समाज में “एकात्मता” लाती है, जो ग्राम, उद्योग, कृषि, लघु उद्यम और शहरी अर्थतंत्र को एक शृंखला में जोड़ती है।

यदि हम भारतीय परंपरा में और पीछे जाएँ, तो कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को ही राष्ट्रबल का आधार मानता है। कौटिल्य ने स्पष्ट कहा था कि आर्थिक शक्ति ही राजनीतिक और सैन्य शक्ति का मूल है। उनके अनुसार, एक सशक्त राष्ट्र वही है जो अपने संसाधनों का अधिकतम उपयोग स्वयं कर सके और बाहरी निर्भरताओं को न्यूनतम रखे। कौटिल्य की ‘स्वाम्य’, ‘युक्ति’ और ‘वृत्ति’ की संकल्पनाएँ आज भी स्वदेशी उद्योगों, कृषि सुधारों, खनिज संसाधनों के उपयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ती हैं। 

स्वदेशी विचार को दत्तोपंत ठेंगड़ी ने आधुनिक औद्योगिक युग में नए सिरे से रूपायित किया। उन्होंने यह बताया कि यदि आर्थिक नीति केवल बाजार की शक्तियों से संचालित होगी, तो समाज में असमानता, बेरोजगारी और आयात-निर्भरता बढ़ेगी। उनका मत था कि भारत की उन्नति का आधार बड़े उद्योगों के साथ लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, कृषि-आधारित उत्पादन, ग्रामीण उद्यमिता और स्थानीय कौशल का पुनरुत्थान होना चाहिए। ठेंगड़ी का चिंतन दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद का ही अनुप्रयोग था, जहाँ आर्थिक विकास को “राष्ट्र की आत्मा” से अलग नहीं देखा जा सकता।

इन सभी महान चिंतकों की दृष्टियों में एक समान सूत्र है, भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार मानव, समाज और प्रकृति का संतुलन है, न कि केवल पूँजी का विस्तार। इसीलिए एकात्म मानववाद “धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष” की भारतीय चतुष्पदी को अर्थनीति का मार्गदर्शक मानता है। यही कारण है कि दीनदयाल जी के आर्थिक दर्शन में “अंत्योदय”, अंतिम व्यक्ति तक समृद्धि पहुँचाना, विकास का मूल लक्ष्य है। यह लक्ष्य तभी प्राप्त हो सकता है जब अर्थव्यवस्था स्वदेशी संसाधनों, स्थानीय कौशल और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार निर्मित हो।

इस प्रकार स्वदेशी आत्मनिर्भरता का, आत्मसम्मान का और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का महाव्रत है। यह आर्थिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जागरण भी है। गांधी, दीनदयाल, कौटिल्य और ठेंगड़ी - इन सभी की दृष्टि बताती है कि भारत का आर्थिक उत्थान तभी संभव है जब देश अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा, अपनी सामाजिक संरचना, अपनी प्रतिभा और अपने संसाधनों पर आधारित आर्थिक मॉडल अपनाए। यह मॉडल मनुष्य को साधन नहीं, साध्य मानता है। समाज को प्रतिस्पर्धा का मैदान नहीं, सहकार्य का परिवार समझता है और राष्ट्र को केवल राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना मानता है।

स्वदेशी और एकात्म मानववाद का यह संयुक्त अर्थ-दर्शन आज के वैश्वीकरण, आयात-निर्भरता और असमान आर्थिक ढाँचों के समय में और भी प्रासंगिक हो उठा है। यह भारत के लिए केवल नीति नहीं, बल्कि सभ्यतागत दिशा है, जिसके आधार पर राष्ट्र आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकता है, समाज में समरसता ला सकता है, और मानवता को एक वैकल्पिक, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक मानवीय विकास पथ दे सकता है।

अर्थव्यवस्था के तीनों विभाग भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया के ही अंग हैं और तदनुसार कृषि, उद्योग तथा सेवा के विभिन्न क्षेत्र सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में समन्वय तथा परस्पर सहयोग के साथ विकास के पथ की दिशा पर चलते हैं। आज आर्थिक नीतियों के दोष के कारण कृषि क्षेत्र से जुड़े लोग गरीब हैं। आवश्यकता इस बात की है कि कृषक और गावों को स्वावलंबी कैसे बनाया जाए। स्वावलम्बन के लिये कुटीर तथा लघु उद्योग को बढ़ाना और प्रोत्साहित करना आवश्यक है। इसके लिये उनको सस्ते ब्याज दर पर ऋण की व्यवस्था तथा आधुनिक तकनीक की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये। सबसे महत्वपूर्ण बात है उनके उत्पादों की बिक्री की व्यवस्था और यहाँ स्वदेशी भावना का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है। स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता और प्रतियोगात्मकता को वरीयता मिलनी चाहिये। उपभोक्ताओं के बीच स्वदेशी जीवन पद्धति के प्रति जागरूकता को बढ़ाना भी आवश्यक है। 

अत्यंत जरूरी आयातों को छोड़ हमें स्वदेशी तकनीक को और अधिक विकसित करके स्वावलंबी होने की आवश्यकता है। इसके लिये हमारे अनुसंधान क्षेत्र में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। इसमें निजी औद्योगिक क्षेत्र को जिम्मेवारी लेनी चाहिये क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था का तीन चौथाई से ज्यादा हिस्सा निजी क्षेत्र से ही आता है जब कि अनुसंधान का तीन चौथाई से ज्यादा हिस्सा सरकारी संस्थाओं द्वारा किया जाता है। आज का युग बौद्धिक सम्पदा पर आधारित है। अमेरिका और यूरोप की कुल आय का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा सिर्फ पैटेंट और कापी राइट की रॉयल्टीज से आ जाता है जो कि हमारी कुल राष्ट्रीय आय के दोगुना से भी अधिक है। यह मानसिक बदलाव लाना बहुत आवश्यक है। इसका दूरगामी और दीर्घकालीन प्रभाव हमारी कार्यक्षमता को बढ़ाने और हमारे स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने में मिलेगा। धीरे-धीरे मोटर गाड़ी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बन सकेंगे और हमारा न सिर्फ आयात घटेगा बल्कि हम अपना निर्यात भी बढ़ा सकेंगे। हमारे मानव संसाधन की मर्यादा बढ़ेगी और बौद्धिक सम्पदा में हम अग्रणी स्थान प्राप्त कर सकेंगे। अभी हम तकनीक का आयात करते हैं, फिर हम इसका निर्यात करेंगे। अभी हम व्यापार घाटे की स्थिति में हैं और इसकी भरपाई विदेशी ऋण और विदेशी पूँजी से करते हैं, जिसका बोझ बढ़कर 2.5 ट्रिलियन अमरीकी डालर से भी ज्यादा हमारे देश पर है। चीनी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रचार होते हुए भी पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 115 बिलियन अमरीकी डालर का आयात चीन से हुआ है और निर्यात सिर्फ  15 बिलियन अमरीकी डालर और फलतः व्यापार घाटा 100 बिलियन अमरीकी डालर के लगभग हुआ है। इसकी उल्टी गिनती चालू करने की आवश्यकता है, तभी हमारा रुपया अमरीकी डालर की तुलना में मजबूत हो सकेगा। अभी के दिनों में अमेरिका के भारतीय निर्यातों पर आयात कर बढ़ाने से हमारे लघु उद्योगों के लिए एक नई चेतावनी आई है जिसे हमें अवसर में बदलने की आवश्यकता है। स्वावलम्बन और आत्मनिर्भर भारत की पहचान तभी हो सकेगी जब भारत का रुपया अन्तरराष्ट्रीय बाजार में अपना स्थान बना सकेगा। 

स्वदेशी और स्वावलम्बन ही एकमात्र विकल्प है, जो हमारी बौद्धिक क्षमता और हमारी आर्थिक क्षमता को एक प्रखर और समृद्ध राष्ट्र के रूप में दुनिया में अपना खोया हुआ स्थान प्राप्त करा सकता है। हमें आज के युगानुकूल चिंतन करने की आवश्यकता है। तकनीक और ज्ञान-विज्ञान के आज के युग में व्यावहारिक चिंतन आवश्यक है। हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता सर्वोपरि है।    

More articles by Dr. Dhanpat Ram Agarwal