रुपये का वर्तमान उतार-चढ़ाव भारत की विकास गाथा में बाधा नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिवेश की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ता रहेगा और आने वाले वर्षों में विश्व अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत भूमिका निभाएगा। - दुलीचंद कालीरमन
भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। बीते कुछ वर्षों में वैश्विक महामारी, युद्ध, महंगाई और वित्तीय अस्थिरता जैसी चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक विकास दर 6 से 8 प्रतिशत के बीच बनी रही है। यह दर न केवल विकसित देशों से अधिक है, बल्कि अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भी बेहतर मानी जाती है। इसके समानांतर एक और आर्थिक तथ्य लगातार चर्चा में रहता है-अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का गिरता हुआ मूल्य जो 91 के स्तर को पार कर गया है। आम नागरिकों, विद्यार्थियों और निवेशकों के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब भारत इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, तब उसकी मुद्रा कमजोर क्यों हो रही है। क्या यह भारत की आर्थिक सेहत पर प्रश्नचिह्न लगाता है, या इसके पीछे कोई व्यापक वैश्विक कारण छिपा है?
किसी भी देश की मुद्रा का मूल्य अंतरराष्ट्रीय विदेशी मुद्रा बाजार में मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होता है। जब डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत घटती है, तो इसे रुपये का अवमूल्यन कहा जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पहले जहाँ एक डॉलर खरीदने के लिए कम रुपये लगते थे, अब उतने ही डॉलर के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। रुपये के मूल्य में गिरावट के पीछे कई आर्थिक कारण होते हैं। भारत कच्चे तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक सामान और मशीनरी का बड़ा आयातक है। जब आयात अधिक होता है, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और परिणामस्वरूप रुपये पर दबाव आता है। इसके अतिरिक्त, अमेरिका द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने पर वैश्विक निवेश डॉलर की ओर आकर्षित होता है, जिससे भारत जैसे उभरते देशों की मुद्राएँ कमजोर पड़ती हैं।
डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत के निर्धारण में विदेशी निवेश की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। जब विदेशी निवेशक भारत में निवेश बढ़ाते हैं, तो डॉलर का प्रवाह देश में आता है और रुपया मजबूत होता है। इसके विपरीत, जब वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण निवेशक अपना पैसा बाहर निकालते हैं, तो रुपये पर गिरावट का दबाव बढ़ जाता है। हालांकि यह समझना आवश्यक है कि मुद्रा का कमजोर होना हमेशा आर्थिक कमजोरी का संकेत नहीं होता। कई बार यह वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम होता है, न कि घरेलू अर्थव्यवस्था की विफलता का।
यदि भारत की विकास दर पर नज़र डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के कई मजबूत आधार हैं। भारत की बड़ी और युवा आबादी घरेलू खपत को मजबूत बनाए रखती है। उपभोग में निरंतर वृद्धि से उद्योगों और सेवाओं को बढ़ावा मिलता है। डिजिटल अर्थव्यवस्था का तेज़ विस्तार-जैसे यूपीआई, ऑनलाइन भुगतान, स्टार्टअप्स और ई-कॉमर्स, ने आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा दी है। सरकार द्वारा सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और बुनियादी ढांचे में किए जा रहे बड़े निवेश ने रोजगार और उत्पादन को गति दी है। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी, बीपीओ, वित्तीय सेवाएँ और पर्यटन जैसे सेवा क्षेत्र भारत की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि जीडीपी ग्रोथ और मुद्रा मूल्य हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते। जीडीपी विकास दर मुख्य रूप से घरेलू उत्पादन, सेवाओं और निवेश को दर्शाती है, जबकि मुद्रा का मूल्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पूँजी प्रवाह और वैश्विक वित्तीय बाजारों से जुड़ा होता है। भारत का जीडीपी इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि देश के भीतर आर्थिक गतिविधियाँ तेज़ हैं, लेकिन रुपये का मूल्य इसलिए दबाव में है क्योंकि वैश्विक स्तर पर डॉलर की मांग मजबूत बनी हुई है। अमेरिकी डॉलर आज भी दुनिया की सबसे प्रमुख रिज़र्व करेंसी है, और संकट के समय निवेशक इसे सुरक्षित विकल्प मानते हैं।
गिरते रुपये का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर पड़ता है। एक ओर आयातित वस्तुएँ महंगी हो जाती हैं। पेट्रोल-डीजल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाइयों की कीमतें बढ़ने से आम आदमी पर बोझ पड़ता है। आयातित महंगाई घरेलू महंगाई को भी बढ़ा सकती है, जिससे सरकार और रिज़र्व बैंक के सामने चुनौती खड़ी होती है। विदेश यात्रा और विदेश में शिक्षा प्राप्त करना भी महंगा हो जाता है। दूसरी ओर, कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए लाभकारी सिद्ध होता है। आईटी सेवाएँ, फार्मा, टेक्सटाइल और अन्य निर्यात आधारित उद्योग डॉलर में कमाई करते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ती है।
गिरते रुपये का विकास दर पर प्रभाव पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। कुछ परिस्थितियों में यह विकास को सहारा भी देता है। निर्यात सस्ता होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ सकती है। विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार अपेक्षाकृत सस्ता लगता है, जिससे लंबी अवधि में निवेश आकर्षित हो सकता है। हालांकि यदि रुपये की गिरावट बहुत तेज़ और अनियंत्रित हो जाए, तो इससे महंगाई बढ़ सकती है और विकास दर पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
भारत की आर्थिक यात्रा को व्यापक दृष्टिकोण से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि रुपये का धीरे-धीरे कमजोर होना कोई नई या असामान्य घटना नहीं है। पिछले तीन दशकों में भारत ने निरंतर आर्थिक प्रगति की है, जबकि इसी दौरान रुपये का मूल्य भी धीरे-धीरे गिरता रहा है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की मुद्राएँ भी अपने विकास के दौर में लंबे समय तक डॉलर के मुकाबले कमजोर रहीं, लेकिन उनकी अर्थव्यवस्थाएँ लगातार मजबूत होती गईं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मजबूत अर्थव्यवस्था का अर्थ हमेशा मजबूत मुद्रा नहीं होता।
अंततः यह कहा जा सकता है कि रुपये की गिरती कीमत और भारत की तेज़ विकास दर को विरोधाभास के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के दो अलग-अलग पहलुओं के रूप में देखना चाहिए। भारत की असली ताकत उसके बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन, तकनीकी प्रगति और उद्यमशीलता में निहित है। यदि सरकार निर्यात को बढ़ावा देने, आयात पर निर्भरता कम करने, महंगाई को नियंत्रित रखने और विदेशी निवेश को आकर्षित करने की दिशा में निरंतर प्रयास करती रहती है, तो रुपये में स्थिरता आएगी। इस प्रकार, रुपये का वर्तमान उतार-चढ़ाव भारत की विकास गाथा में बाधा नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिवेश की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ता रहेगा और आने वाले वर्षों में विश्व अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत भूमिका निभाएगा।

