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हर क्षेत्र में बढ़ रही है स्वदेशी की शक्ति

स्वदेशी तकनीक और हमारी युवा मेधा के बदौलत भारत हर दिन प्रगति की नई इबारत लिख रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल में भारत कई और मुकाम हासिल करने में कामयाब होगा। - अनिल तिवारी

 

आत्मनिर्भर बनने के संकल्प पथ पर दौड़ रहे भारत ने हर क्षेत्र में स्वदेशी का झंडा बुलंद किया है। देश में इस्तेमाल होने वाले 99 प्रतिशत मोबाइल भारत अब खुद बना रहा है, वही युद्ध पोत और हल्के लड़ाकू विमान से लेकर घातक ड्रोन तक बनाकर पूरी दुनिया में स्वदेशी का लोहा मनवाया है। अपने स्वदेशी तकनीक के बूते चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरकर भारत ने न सिर्फ पूरी दुनिया को चौंका दिया बल्कि अब रक्षा उत्पादों के निर्यात का आंकड़ा 23 गुना बढ़ाते हुए पहले के 686 करोड़ के मुकाबले वर्ष 2022-23 में 16000 करोड़ से ऊपर का करने में सफलता अर्जित की है।

केंद्र की राजग सरकार के नेतृत्व में देश हर क्षेत्र में स्वदेशी हथियारों उपकरणों और तकनीक के बूते आत्मनिर्भर बनने की राह पर दौड़ रहा है। स्वावलंबी भारत अभियान के जरिए स्वदेशी को मिली तरजीह के कारण ही स्वदेशी हथियारों, मिसाइल, हल्के फाइटर जेट और ड्रोन सिस्टम में दुनिया अब दिलचस्पी दिखा रही है। आज भारत पचासी से अधिक देशों को स्वदेशी हथियार और उपकरण, कलपुर्जे निर्यात कर रहा है। आत्मनिर्भर भारत और स्वावलंबी भारत अभियान की बदौलत हथियारों के आयात पर होने वाले खर्च में भी गिरावट आई है। वर्ष 2018-19 में रक्षा क्षेत्र पर खर्च होने वाले कुल लागत में से 46 प्रतिशत हथियारों और सिस्टम पर खर्च हुआ था। दिसंबर 2022 में यह खर्च गिरकर 35.6 प्रतिशत पर आ गया है।

भारत ने चांद पर कदम रख पूरी दुनिया को एक तरह से चौंका दिया है। शुद्ध स्वदेशी उपकरणों से लैस इसरो का चंद्रयान-3 का सफल प्रक्षेपण कर भारत दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला देश बन चुका है। इसी तरह सूरज को समझने के लिए इसरो ने आदित्य एल-1 का सफलता पूर्वक प्रक्षेपण कर दिया है। यह देश का पहला अंतरिक्ष अभियान है जो सूर्य का अध्ययन करेगा। आदित्य एल-1 सूर्य और पृथ्वी के बीच एक खास बिंदु लैंग्रेज पॉइंट वन जिसे एल-1 कहा जाता है, वहां स्थापित होगा। यानी सूर्य की हर गतिविधि पर नजर रखेगा। सूर्य को समझने के लिए यह यान 15 लाख किलोमीटर की दूरी तय करेगा।

स्वदेशी की बदौलत भारत अंतरिक्ष की दुनिया में भी तेजी से तरक्की कर रहा है। देश का अंतरिक्ष बाजार वर्ष 2040 तक 40 से 100 अरब डॉलर के पार होने की उम्मीद है। अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन कंपनी आर्थर डी लिटिल की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। दुनिया के चार देशों ने छह मसौदे पर इसरो के साथ करार किया है। अंतरराष्ट्रीय मिशन को अंजाम देने से भारत को 14.01 करोड डॉलर का राजस्व मिलने की संभावना है। अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े 100 अधिक स्टार्टअप चल रहे हैं। वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी बढ़कर 10 प्रतिशत तक होने का अनुमान है। वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष में भारत अपना स्पेस स्टेशन निर्मित कर लेगा।

मालूम हो कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत भारत सरकार का लक्ष्य वर्ष 2024-25 तक रक्षा उत्पादन क्षेत्र को 175000 लाख करोड रुपए करना है। वहीं रक्षा निर्यात को बढ़ाते हुए इसी समयावधि में 35000 करोड रुपए से अधिक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। रक्षा मंत्रालय ने 2020 में 101 रक्षा उत्पादों के आयात पर रोक लगाई थी। यह उपकरण अब भारत में ही बन रहे हैं। 3700 रक्षा उत्पाद भारत में निर्मित किये जा रहे हैं। 2024 में और 351 सामानों का निर्माण निर्माण भारत में स्वदेशी तकनीक से होने लगेगा। इसरो नासा द्वारा तैयार निसार उपग्रह से समुद्र स्तर, भूजल, प्राकृतिक आपदा, भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी और पृथ्वी में हर घड़ी हो रहे बदलाव की जानकारी मिलने लगेगी। वर्ष 2024 के अंत तक इस मिशन को अंजाम दिया जाना है। इसरो वर्ष 2024 में गगनयान मानव मिशन को लॉन्च करने की योजना बनाया है। मिशन से पहले रोबोट व्योममित्रा को अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। मिशन के लिए वायुसेना के चार पायलटो की पहचान सुनिश्चित कर ली गई है। भारतीय वायुसेना को इस साल फरवरी में पहला स्वदेशी फाइटर जेट तेजस एम के-1ए मिल सकता है। वायु सेवा को कुल 83 जेट मिलने है। इसके लिए एचएएल से 48000 करोड रुपए का करार भी किया गया है।

देश में 5जी लांच होने के बाद 6जी की तैयारी शुरू हो चुकी है। प्रधानमंत्री ने इंडियन मोबाइल कांग्रेस में कहा था कि भारत की कोशिश सिक्स जी क्षेत्र का लीडर बनने की है।

स्वावलंबी भारत अभियान के कर्ताधर्ताओं का मानना है कि भारत जितनी बड़ी अर्थव्यवस्था है, और यहां की जनसंख्या जितनी है, उसमें देश को आत्मनिर्भर बनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। आज भारत के लिए जो भी आपूर्ति करता हैं, वह हमारी जरूरत को शायद ही पूरा कर सकते हैं। 

दरअसल दूसरे देशों पर निर्भर रहने की कीमत चुकानी पड़ती है जो मौजूदा दौर में हमारे देश के हित में नहीं है। रक्षा, अनाज, कंप्यूटर, मोबाइल, कंज्यूमर ड्यूरेबल है या फिर ऑटोमोबाइल हो, हर तरफ हमें आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है। अब तक भारत जितना भी आत्मनिर्भर बना है वह मात्र असेंबलिंग के क्षेत्र में ज्यादा हुआ है। भारत को अब सही मायने में आत्मनिर्भर बनना है तो उसे कच्चे माल पर चीन या फिर किसी दूसरे देश के ऊपर निर्भरता को घटानी होगी। स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय सह-संयोजक प्रो. अश्वनी महाजन का मानना है कि विगत कुछ वर्षों से कोशिश जरूर हो रही है और इसके नतीजे भी अच्छे आए हैं। लेकिन जरूरी है कि भारत की क्षमता को देखते हुए यहां शोध पर ज्यादा फोकस किया जाए। अभी जितने शोध हो रहे हैं वह ज्यादातर सरकारी संस्थानों या कंपनियों में हो रहे हैं। निजी क्षेत्र की भागीदारी को इसमें बढ़ाया जाना चाहिए। रक्षा मंत्रालय ने इस साल ऐसे सामानों की सूची जारी की है जिनका निर्माण भविष्य में देश में ही हो सकेगा। इसे चरणबद्ध तरीके से उनके आयात पर रोक लगाई जानी चाहिए। रक्षा क्षेत्र से जुड़े सैकड़ो कल पुर्जे देश में बनने लगे हैं। इससे करोड़ों रुपए की बचत हो रही है। हर क्षेत्र के लिए स्वदेशी और आत्मनिर्भरता ही वह कुंजी है जो विश्व पटल पर भारत को आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों में ताकतवर बन सकती है।

गौरतलब है कि नागरिकों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए देश में 160480 हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर का संचालन हो रहा है। शिक्षा का बाजार जो 2020 में 180 अरब डालर था वर्ष 2030 तक 320 अरब डालर होने की संभावना है। मेक इन इंडिया के तहत देश में 34 बंदे भारत ट्रेन चल रही है। केंद्र की योजना है कि वर्ष 2024 तक इनकी संख्या बढ़कर 75 किया जाना है।

स्वदेशी तकनीक और हमारी युवा मेधा के बदौलत भारत हर दिन प्रगति की नई इबारत लिख रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल में भारत कई और मुकाम हासिल करने में कामयाब होगा।               

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